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  • पोलियो टीकाकरण कार्यकर्ताओं ने भारत को पोलियो-मुक्त बनाकर 4 लाख बच्चों की बचाई जान

    पोलियो टीकाकरण कार्यकर्ताओं ने भारत को पोलियो-मुक्त बनाकर 4 लाख बच्चों की बचाई जान

    24 फरवरी, 2012 का दिन भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जाता है। इसी दिन वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) ने भारत को पोलियो प्रभावित देशों की सूची से हटाया था। 

    लेकिन एक दौर ऐसा भी था, जब हमारे देश में प्रति वर्ष 2 से 4 लाख नए पोलियो के मामले सामने आते थे। WHO ने भारत  को पोलियो मुक्त घोषित करने का फैसला, तब लिया जब 13 जनवरी, 2011 के बाद से भारत में कोई भी वाइल्ड पोलियोवायरस नहीं पाया गया। भारत से पोलियो को जड़ से उखाड़ने में सरकार के साथ-साथ, कई बड़े संगठनों और अनगिनत गुमनाम वैक्सीनेशन वर्कर्स की भूमिका रही। 

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  • वर्ष 1813 : क्लैफम सेक्ट का षड्यंत्र, मिशनरी घुसपैठ और सदा के लिए बदल गई भारत की डेमोग्राफी

    वर्ष 1813 : क्लैफम सेक्ट का षड्यंत्र, मिशनरी घुसपैठ और सदा के लिए बदल गई भारत की डेमोग्राफी

    • हिन्दुओं के सभी देवी-देवता अशुद्ध और पतित
    • इनके लकड़ी और पत्थर के बने देवता, देव नहीं बल्कि राक्षस
    • हिन्दुओं के सभी सिद्धांत और प्रथाएं सिर्फ ढोंग, सब के सब भ्रष्ट
    • इनकी सभी परंपराएं और विश्वास हास्यास्पद और अपमानजनक
    • हिन्दुओं की लोककथाएं और किंवदंतियां सभी कपट से भरे हुए
    • इसीलिए मूर्ति पूजा की समाप्ति हो और यह समाप्ति होगी ईसाई मजहब को फैलाकर, वो भी अंग्रेजी माध्यम से। हिन्दुओं की मुक्ति का एकमात्र उपाय यही है।

    ऊपर कोई कहानी नहीं लिखी गई है। हर एक वाक्य इतिहास में दर्ज है। ऐसा इतिहास, जिसके दम पर भारत में ईसाई मिशनरियों के लिए जमीन तैयार की गई। ऐसा इतिहास, जिसका बीज बोया जैचरी मैकाले और उनके क्लैफम सेक्ट (Clapham Sect) के साथी ईसाइयों ने और फल पाने के लिए दस्तावेज पर मुहर लगाई गई साल 1813 में। 

    भारत में ईसाई मिशनरी क्यों भेजे जाएं, या किस रूप में भेजना चाहिए, वर्ष 1813 में लंदन की संसद में पास किए गए चार्टर एक्ट में सब दर्ज किया गया। आज जिस मैकाले की शिक्षा नीति पर इतनी चर्चा होती है, वो इसे तभी क्रियान्वित कर पाया, क्योंकि कभी उसके पिता जैचरी मैकाले ने हिन्दू घृणा के कारण अंग्रेजियत और ईसाइयत के प्रचार-प्रसार की नींव रखी थी।

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  • जैतो दा मोर्चा, जब 500 निहत्थे सिखों ने ब्रिटिश साम्राज्य को झुका दिया

    जैतो दा मोर्चा, जब 500 निहत्थे सिखों ने ब्रिटिश साम्राज्य को झुका दिया

    21 फरवरी, 1924 को, पंजाब के जैतो शहर के पास, भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में मानव विरोध का सबसे मजबूत पल सामने आया। बिना हथियार वाले सैकड़ों सिख स्वयंसेवक शांति से ब्रिटिश बैरिकेड्स की ओर बढ़े, लड़ने के लिए नहीं, बल्कि प्रार्थना करने के लिए। उनके पास कोई हथियार नहीं था। सिर्फ आस्था, अनुशासन और अपने धार्मिक संस्थानों की इज्तत बचाना उनका ध्येय था। 

    फोटो सोर्स: samvad.in

    जैसे ही सैकड़ों सिख स्वयंसेवक आगे बढ़े, ब्रिटिश सैनिक गोलियां चलाने लगे। कुछ ही मिनटों में, सौ से ज्यादा लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हो गए। फिर भी एक भी प्रदर्शनकारी ने जवाबी हमला नहीं किया। वे न तो भागे और न ही हमला करने का प्रयास किया, वे तो बस आगे बढ़ते रहे।

    यह जैतो मोर्चा था। एक ऐसा आंदोलन, जिसने साबित किया कि नैतिक हिम्मत एक साम्राज्य को भी हिला सकती है।

    गिरफ्तारी की चिंगारी और महाराजा का अपमान

    जैतो मोर्चा की जड़ें 9 जुलाई, 1923 को नाभा के महाराजा रिपुदमन सिंह को अंग्रेजों द्वारा हटाए जाने से जुड़ी थीं। रिपुदमन सिंह सिर्फ एक शासक नहीं थे, उन्होंने सिख सुधार आंदोलनों और राष्ट्रवादी कार्यों को मुखर समर्थन दिया था। उन्होंने ननकाना साहिब हत्याकांड का विरोध करते हुए काली पगड़ी भी पहनी थी।

    उनकी बढ़ती लोकप्रियता और राष्ट्रवादी सोच ने अंग्रेजों को चिंतित कर दिया। इसलिए, 9 जुलाई 1923 को अंग्रेजों ने धोखे से उन्हें गद्दी से हटा दिया। 

    इस नाइंसाफी का विरोध करने के लिए, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने 9 सितंबर 1923 को शांति से ‘नाभा दिवस’ मनाने का ऐलान किया। SGPC ने इस आंदोलन का नेतृत्त्व किया और हर गांव में धार्मिक सभा (दीवान), नगर कीर्तन और अरदास का आह्वान किया। इससे पूरे इलाके में विरोध के लिए जोरदार तैयारियां हुईं।

    अखंड पाठ का अपमान और जबरदस्त रिएक्शन

    SGPC की अपील पर, अलग-अलग जगहों पर प्रोग्राम आरंभ हुए, जिसमें जैतो शहर विरोध का मुख्य केंद्र बना। इस आंदोलन के हिस्से के तौर पर, गुरुद्वारा श्री गंगसर साहिब में एक धार्मिक सभा (दीवान) और एक अखंड पाठ (लगातार प्रार्थना) की योजना बनाई गई थी। 

    लेकिन, 14 सितंबर, 1923 को, ब्रिटिश सेना गुरुद्वारे में घुस गई, सेवादारों को गिरफ्तार कर लिया और प्रार्थना कर रहे ग्रंथी को बलपूर्वक हटा दिया। सिखों के लिए, यह सिर्फ राजनीतिक अत्याचार नहीं था, यह उनके विश्वास पर सीधा हमला था। शुरुआत में, 25 स्वयंसेवकों के ग्रुप प्रतिदिन अकाल तख्त साहिब से जैतो की ओर मार्च करते थे और हर बार गिरफ्तार कर लिए जाते थे।

    500 सिखों के बलिदानी जत्थे

    फोटो स्रोत : sikhnet.com

    आखिरकार, बहुत सोच-विचार के बाद, शिरोमणि कमेटी ने 25 की जगह 500 सिखों के बड़े जत्थों को भेजने का फैसला किया। इस बड़े जत्थे ने 9 फरवरी, 1924 को अकाल तख्त साहिब से अपनी पैदल यात्रा शुरू की और 21 फरवरी, 1924 को जैतो के बॉर्डर पर पहुंचा, जिसका एकमात्र मकसद अखंड पाठ को फिर से आरंभ करना था।

    यह सिर्फ आदमियों का आंदोलन नहीं था। मां-बहनें लंगर चलाती थीं। गांवों ने रहने की जगह और मेडिकल सहायता दी। महिलाएं, आदमियों के कदम से कदम मिलाकर चलती थीं।

    21 फरवरी की खूनी फायरिंग

    अंग्रेजों ने गुरुद्वारा श्री गंगसर साहिब जाने वाली सड़क को कांटेदार तारों और मशीनगनों से पूरी तरह ब्लॉक कर दिया था। जब बलिदानी जत्था श्री टिब्बी साहिब से सिर्फ 150 फीट दूर था, तो एक अंग्रेज अफसर ने उन्हें रोकने की कोशिश की। वे नहीं रुके, शांति से चलते रहे। फिर फायरिंग शुरू हो गई। 5 मिनट में 100 से ज्यादा सिख बलिदानी हो गए, 300 से ज्यादा घायल हो गए। फिर भी आंदोलन नहीं रुका। अगले कुछ महीनों में, 500-500 लोगों के 13 और शहीदी जत्थे जैतो पहुंचे और अपनी मर्जी से गिरफ्तारी स्वीकार कर ली।

    सत्रह शहीदी जत्थे भेजे गए और करीब एक साल दस महीने तक चले हिम्मत वाले संघर्ष के बाद आखिरकार ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा। 7 जुलाई 1925 को ‘सिख गुरुद्वारा बिल’ एकमत से पास हुआ, जिससे पंजाब के गुरुद्वारों को महंतों के कंट्रोल से आजाद करके SGPC और सिख संगत के मैनेजमेंट में लाया गया। बिल पास होने के बाद अगस्त 1925 में सभी सिख कैदियों को रिहा कर दिया गया और यह लंबा आंदोलन भक्ति, आस्था और सामुदायिक एकता की जीत के साथ खत्म हुआ।

  • ईसा मसीह की जगह भगवान लुंगकित्सुंगबा के नाम पर नागालैंड में फैलाया ईसाइयत : 88% ईसाई आबादी के पीछे का सच

    ईसा मसीह की जगह भगवान लुंगकित्सुंगबा के नाम पर नागालैंड में फैलाया ईसाइयत : 88% ईसाई आबादी के पीछे का सच

    नागालैंड में जब पहली बार ईसाई मिशनरी ने धर्मांतरण करवाया, तो ईसा मसीह का जिक्र तक नहीं किया। धर्म परिवर्तन करवाया गया, नागाओं के सबसे बड़े भगवान लुंगकित्सुंगबा (Lungkitsungba) के नाम पर।

    चर्च, मतलब यीशु दा मंदिर, पास्टर को कहो पापा जी, जिंगल बेल्स कुछ और नहीं, ‘येशु दी बल्ले-बल्ले है’, पंजाब में जो आज चल रहा है, नागालैंड में भी बिल्कुल वही सब किया गया था वर्ष 1872 में, 153 साल पहले।

    पंजाबियत का चोला ओढ़कर आज पंजाबी समाज में मिशनरी घुसपैठ कर रहे हैं। इसी पैटर्न पर नागालैंड में नागाओं की आस्था और परंपराओं को साथ रखकर शुरुआती धर्मांतरण किया गया। 

    इन आंकड़ों पर गौर कीजिए : सबसे पहले नागा शख्स के धर्म-परिवर्तन के डेढ़ शताब्दी बाद 2011 की जनगणना के अनुसार वहां की जनसंख्या में 88% ईसाई हैं। 140 वर्ष से कम समय में 1 मात्र ईसाई नागरिक से बढ़कर अब 1739651 अब चर्च की शरण में हैं।

    मेरा यशु यशु’ के वायरल मीम की बाढ़ में बहकर पंजाब की डेमोग्राफी भी 88% ईसाई आबादी वाली न हो जाए, इसके लिए जरूरी है, जानना-समझना नागालैंड की कहानी।

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  • भगवा ध्वज के लिए ईसाई कामगारों ने जब बहाया पसीना : छत्रपति शिवाजी महाराज की दूरदृष्टि से पड़ी स्वदेशी नौसेना की नींव

    भगवा ध्वज के लिए ईसाई कामगारों ने जब बहाया पसीना : छत्रपति शिवाजी महाराज की दूरदृष्टि से पड़ी स्वदेशी नौसेना की नींव

    चारों तरफ समुद्र, बीच में एक किला। 30 फीट ऊंची दीवारों से घिरा यह किला एकदम अभेद्य। और किले को जिस भी ओर से देखें, आपको दिखेगा लहराता भगवा ध्वज

    सिंधुदुर्ग किले पर लहराता भगवा ध्वज (2 वास्तविक तस्वीरों को ChatGPT की मदद से एक बनाया गया)

    क्या हो, अगर आपको यह बताया जाए कि इस भगवे के लिए ईसाई कामगारों ने भी पसीना बहाया था? चौंकना स्वाभाविक है! लेकिन यह ऐसा इतिहास है, जिसे अक्सर छिपा लिया जाता है।

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  • सरायघाट का युद्ध: कैसे अहोम साम्राज्य के नाविकों ने गुप्त रास्तों का प्रयोग करके मुगल सेना को हराया

    सरायघाट का युद्ध: कैसे अहोम साम्राज्य के नाविकों ने गुप्त रास्तों का प्रयोग करके मुगल सेना को हराया

    सरायघाट के युद्ध को अहोम साम्राज्य (1228 CE–1826 CE) के दौरान सबसे ऐतिहासिक घटनाओं में से एक माना जाता है। इस युद्ध ने ब्रह्मपुत्र घाटी और उत्तर-पूर्व भारत के इतिहास को बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। यह युद्ध 18 फरवरी, 1671 को गुवाहाटी के पास सरायघाट में हुआ था। इसे असम और आसपास के इलाकों में फैलने की मुगल साम्राज्य की आखिरी बड़ी कोशिशों में से एक माना जाता है। 

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  • 1857 की क्रांति विफल होने के बाद वासुदेव बलवंत फड़के ने कैसे बनाई देश की पहली अस्थाई सरकार?

    1857 की क्रांति विफल होने के बाद वासुदेव बलवंत फड़के ने कैसे बनाई देश की पहली अस्थाई सरकार?

    क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक व्यक्ति ने 1879 में समानांतर ब्रिटिश सरकार की स्थापना की? उसने यह अद्भुत कार्य कैसे किया?  

    आइए, वासुदेव बलवंत फड़के के जीवन की इस घटना में गहराई से उतरें। यह कोई काल्पनिक कथा नहीं है, न ही अतिश्योक्ति है। यह इतिहास का वह जीवंत अध्याय है, जिसे जान-बूझकर भुला दिया गया। उस अध्याय के नायक थे वासुदेव बलवंत फड़के।

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  • जब 1932  में बिहार के तारापुर में स्वराज के लिए 34 क्रांतिकारी शहीद हुए थे

    जब 1932  में बिहार के तारापुर में स्वराज के लिए 34 क्रांतिकारी शहीद हुए थे

    आपने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के बारे में कई कहानियां सुनी होंगी क्योंकि ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह का एक लंबा इतिहास रहा है। इनमें से कई घटनाएं लोगों को अच्छे से याद हैं। हालांकि, कई ऐसी महत्वपूर्ण घटनाएं भी हैं जिन्हें समय के साथ भुला दिया गया है। 

    ऐसी ही एक घटना बिहार के तारापुर की है। 15 फरवरी, 1932 को, क्रांतिकारियों के एक समूह ने बिहार के तारापुर में पुलिस स्टेशन पर तिरंगा फहराकर सर्वोच्च बलिदान दिया था, जिसमें 34 स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी जान कुर्बान कर दी थी। तारापुर के शहीदों को सम्मान दिलाने की लड़ाई लंबे समय से चल रही है, हालांकि अब उम्मीद है कि इस घटना को राष्ट्रीय पहचान मिलेगी।

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  • तानाजी मालुसरे ने कैसे 50 सैनिकों के साथ मुगलों से जीता सिंहगढ़ का किला?

    तानाजी मालुसरे ने कैसे 50 सैनिकों के साथ मुगलों से जीता सिंहगढ़ का किला?

    इतिहास का एक ऐसा युद्ध, जिसमें सिर्फ 50 मराठा सैनिकों ने 1,800 से अधिक मुगल सैनिकों को खदेड़कर सिंहगढ़ किले (कोंढाणा किले) पर कब्जा किया था। इस युद्ध के नायक थे मराठा सेनापति ‘तानाजी मालुसरे’। यह युद्ध इतना आसान नहीं था। किले की खड़ी चट्टानें, पहाड़ी क्षेत्रों की गहरी खाइयां, अंधेरी रात और सभी बुर्जों पर मुगल सैनिकों का सख्त पहरा। 

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  • श्री गुरुजी गोलवलकर ने भारत पर चीन के हमले के बारे 11 साल पहले ही चेतावनी दे दी थी!

    श्री गुरुजी गोलवलकर ने भारत पर चीन के हमले के बारे 11 साल पहले ही चेतावनी दे दी थी!

    चीनी सैनिकों के भारत की उत्तरी सीमा पार करने से एक दशक से भी पहले, एक चेतावनी जारी की गई थी- साफ तौर पर, सार्वजनिक रूप से और बार-बार। यह चेतावनी सरकार के गलियारों या इंटेलिजेंस एजेंसियों से नहीं आई थी, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति से आई थी, जो तात्कालिक कूटनीति से परे घटनाओं को देख रहा था। यह लेख बताता है कि वह चेतावनी कैसे सामने आई, उसे क्यों नजरअंदाज किया गया, और जब वह सच साबित हुई, तो उसके बाद क्या हुआ।

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