दूध से मीडिया तक: अमूल, साराभाई और खेड़ा की कहानी : भारत का पहला ग्रामीण टीवी प्रोजेक्ट

अद्भुत कहानी खेड़ा संचार परियोजना (केसीपी) के माध्यम से गुजरात, अमूल, विक्रम साराभाई और यहां तक कि चेन्नई को भी जोड़ती है।

इस विश्व टेलीविजन दिवस पर, भारतीय मीडिया इतिहास के एक उल्लेखनीय अध्याय पर पुनर्विचार करना उचित और प्रासंगिक होगा। यह अद्भुत कहानी खेड़ा संचार परियोजना (केसीपी) के माध्यम से गुजरात, अमूल, विक्रम साराभाई और यहां तक कि चेन्नई को भी जोड़ती है। 1970 के दशक के मध्य में शुरू किया गया, ग्रामीण विकास के लिए टेलीविजन के उपयोग का यह भारत में पहला गंभीर प्रयास था।

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यह परियोजना गुजरात के ऐतिहासिक खेड़ा जिले में शुरू हुई थी। यह क्षेत्र पहले से ही भारत के प्रथम गृहमंत्री और लौह पुरुष के नाम से जाने जाने वाले सरदार वल्लभभाई पटेल की जन्मभूमि और सहकारिता के क्षेत्र में एक अद्भुत क्रांति, अमूल डेयरी सहकारी समिति के केंद्र के रूप में जाना जाता है। दूरदर्शी अंतरिक्ष वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई ने इसकी परिकल्पना की थी। इस पहल को संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) द्वारा प्रदान किए गए एक ट्रांसमीटर से समर्थन प्राप्त हुआ। अहमदाबाद स्थित अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (एसएसी) ने इस परियोजना को क्रियान्वित किया। मुख्यधारा के प्रसारण के विपरीत, केसीपी का उद्देश्य टेलीविजन सामग्री निर्माण का विकेंद्रीकरण करना था। इसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना था कि कार्यक्रम सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील, स्थानीय रूप से प्रासंगिक और जमीनी स्तर के सामाजिक-आर्थिक मुद्दों के प्रति संवेदनशील हों।

शुरुआती वर्ष : चतुर मोटा और सीखे गए सबक

ग्रामीण कार्यक्रमों में पहला प्रयोग ‘चतुर मोटा’ नामक कार्यक्रम के रूप में हुआ, जो स्थानीय चरोतारी बोली में सप्ताह में दो बार प्रसारित होने वाला धारावाहिक था। इसमें एक संयुक्त परिवार के मुखिया को युवा पीढ़ी के साथ हास्यपूर्ण ढंग से टकराते हुए दिखाया गया था और साथ ही दहेज कुप्रथा और विधवा विवाह जैसे सामाजिक संदेश भी दिए गए थे। यह कार्यक्रम जल्द ही लोकप्रिय हो गया। हालांकि, रिसर्च से पता चला कि ये मुद्दे खेड़ा के ग्रामीणों के लिए कोई बड़ी चिंता का विषय नहीं थे। इसके बाद निर्माताओं ने मनोरंजन की बजाय विषय-वस्तु के प्रति प्रतिबद्धता दिखाते हुए, धारावाहिक को बंद करने का साहसिक निर्णय लिया। यह शुरुआती चूक अमूल्य साबित हुई, जिसने टीम को यह सिखाया कि ग्रामीण कार्यक्रमों को शहरी धारणाओं के बजाय वास्तविक, जीवंत चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।

वास्तविक मुद्दों की ओर रुख

अगले चरण में धनजी, मकेंजी, मालजी नामक कार्यक्रम शुरू किया गया, जिसमें जातिगत भेदभाव, बंधुआ मजदूरी और मजदूरी शोषण पर चर्चा की गई। हास्य को बनाए रखते हुए और स्थानीय बोली का उपयोग करके, यह श्रृंखला हाशिए के समुदायों के साथ और अधिक गहराई से जुड़ गई। महत्वपूर्ण रूप से, केसीपी ने सहभागी कार्यक्रमों का बीड़ा उठाया। ग्रामीण ही पटकथा लेखक, अभिनेता और आलोचक बन गए। कार्यशालाओं ने स्थानीय प्रतिभाओं को विकसित किया, जिसके परिणामस्वरूप ‘तमारा टीवी मेट तामे लाखो’ (आप अपने टेलीविजन के लिए स्वयं लिखते हैं) जैसी प्रस्तुतियां सामने आईं। इस दृष्टिकोण ने शहरी पूर्वाग्रहों को दरकिनार कर दिया और यह सुनिश्चित किया कि ग्रामीण चिंताओं को आवाज और प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व मिले।

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पोर्टेबल वीडियो उपकरण

1980 के दशक के प्रारंभ में, पोर्टेबल वीडियो उपकरणों ने परियोजना को पूरी तरह बदल दिया। निर्माता खेतों में शिकायतों को रिकॉर्ड कर सकते थे और उन्हें प्रसारित कर सकते थे, जिससे ग्रामीणों और अधिकारियों के बीच सीधा संवाद स्थापित हुआ। इस नए विचार ने स्थानीय समुदायों को सरकारी अधिकारियों को जवाबदेह ठहराने और समस्या समाधान करने में तेजी लाने में सक्षम बनाया। अमूल जैसी संस्थाओं के साथ साझेदारी ने कार्यक्रमों को और समृद्ध बनाया। पशुपालन से जुड़ी प्रथाओं को लोगों तक ठीक से पहुंचाने के लिए ‘भवई’ और ‘कठपुतली’ जैसे लोक प्रारूपों का उपयोग किया गया। मनोवैज्ञानिकों के सुझावों पर आधारित बच्चों के कार्यक्रमों ने आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए कल्पना और शिक्षा का संयोजन किया और परियोजना के विविध दर्शकों के साथ आत्मीयता को दर्शाया।

मान्यता और वैश्विक पुरस्कार

1983 में, ‘खेड़ा संचार परियोजना’ ने ग्रामीण संचार प्रभावशीलता के लिए यूनेस्को पुरस्कार जीता, जिससे भारत के इस प्रयोग को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिली। ई.वी. चिटनिस जैसे विद्वानों ने इसकी रचनात्मकता और प्रभाव का दस्तावेजों में उतारा। इससे यह परियोजना विकास संचार में दुनिया भर में अध्ययन का एक मॉडल बन गई।

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द टर्निंग पॉइंट : पिज ट्रांसमीटर का बंद होना

हालांकि, जल्द ही राजनीति ने इसमें दखल दिया। 25 जुलाई, 1985 को, गुजरात सरकार ने अहमदाबाद में एक उच्च-शक्ति वाला दूरदर्शन ट्रांसमीटर चालू किया। कुछ ही मिनटों में, लोकप्रिय पीज ट्रांसमीटर, जो लगभग एक दशक से केसीपी के स्वतंत्र प्रसारण को प्रसारित कर रहा था, वह बंद हो गया। ग्रामीणों ने इसका कड़ा विरोध किया, भूख हड़ताल की और इसे बंद करने के प्रयासों को रोका। उनका तर्क था कि इन कार्यक्रमों ने उनके जीवन को बदल दिया है। अध्ययनों से पता चला है कि जिन गांवों में टीकाकरण हुआ था, वहां के 96% दर्शक टीकाकरण के लाभों से परिचित थे, जबकि जिन क्षेत्रों में टीकाकरण नहीं हुआ था, वहां केवल 24% दर्शक ही टीकाकरण के लाभों से परिचित थे। यह कमाल प्रसारण का था, जिसने लोगों के जानकार बनाया।

विरोध के बावजूद, सरकार ने घोषणा की कि एक शहरी दूसरे चैनल के लिए ट्रांसमीटर को मद्रास (चेन्नई) स्थानांतरित किया जाएगा। 1990 तक, पीज ट्रांसमीटर को स्थायी रूप से बंद कर दिया गया, जिससे भारत के सबसे महत्वाकांक्षी ग्रामीण संचार प्रयोग का अंत हो गया।

विरासत

यद्यपि अल्पकालिक, खेड़ा संचार परियोजना ने एक स्थायी विरासत छोड़ी। इसने साबित किया कि टेलीविजन केवल मनोरंजन का स्रोत न होकर सहभागी, सांस्कृतिक रूप से प्रासंगिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने वाला हो सकता है। इसने दिखाया कि कैसे ग्रामीण समुदाय निष्क्रिय उपभोक्ता बनने के बजाय सक्रिय रूप से मीडिया का निर्माण कर सकते हैं। इसका प्रभाव अकादमिक हलकों और वैश्विक स्तर पर विकास संचार प्रथाओं में जारी है, जो हमें याद दिलाता है कि तकनीक, जब स्थानीय वास्तविकताओं में जुड़ जाए, तो वह सामाजिक परिवर्तन को गति दे सकती है।