15 जनजातीय महिला शिक्षिकाएँ: जिन्होंने शिक्षा से बदली जनजातियों की जिंदगी, बन गई हैं प्रेरणा-स्रोत

जनजातीय महिलाओं की मिसाल

जनजातीय समाज का इतिहास हमेशा से ही कठिन और संघर्षपूर्ण रहा है। जहां एक तरफ उन्होंने अंग्रेजों के अत्याचारों से जमकर लोहा लिया, तो वहीं आजादी के बाद भी अपनी ही सरकारों से सौतेलेपन के व्यवहार को झेला। इस सबके बाद भी इन समुदायों ने हार नहीं मानी और जमकर अपनी अस्मिता और रीति-रिवाजों के लिए संघर्ष करते रहे। महिलाओं ने भी यह साबित कर दिखाया है कि वो किसी से कम नही हैं। जनजातीय इलाकों की जनजातीय समाज की महिलाएं न केवल खुद शिक्षित हो रही हैं बल्कि दूसरों के लिए भी सफलता के द्वार खोल रही हैं। ये महिलाएं किसी मिसाल से कम नहीं हैं, जो दूसरों की जिंदगियों को भी रोशन कर रही हैं। 

इस आर्टिकल में ऐसी ही जनजातीय महिला शिक्षिकाओं के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनकी व्यक्तिगत संघर्षपूर्ण यात्रा समाज में जागरुकता ला रही है। उन्होंने साहस, कौशल, बुद्धि और समर्पण के दम पर ये साबित कर दिया है कि अगर सोच लो, तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है। 

1. निशुल्क शिक्षा से जनजातीय समाज का उद्धार करती मालती मुर्मू 

मालती मुर्मू संथाल समुदाय जनजातीय क्षेत्र जिलिंगसेरेंग (जलपाईगुड़ी जिला) पश्चिम बंगाल में रहती हैं। 2020 में शादी कर ससुराल पहुंचने के बाद मालती ने साधारण तरीके से अपना जीवन शुरू किया। वहां उन्होंने शिक्षा की दयनीय हालत देखकर अनौपचारिक शिक्षा देने की शुरुआत की। मालती मुर्मू बिना किसी सरकारी मदद, ब्लैकबोर्ड या स्टाफ के, टिन की छत के नीचे माटी की झोंपड़ी में 45 बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। बिना किसी फीस के मालती उम्मीदों की पाठशाला में बच्चों के सपनों को आकार दे रही हैं। वह अंग्रेजी और बांग्ला भाषा सिखाती हैं। NDTV 

मालती मुर्मू बच्चों को पढ़ाते हुए (सोर्स – NDTV)

2. सोनझरिया मिंज रिकॉर्ड कायम कर दे रही हैं युवाओं के हौसलों को नई उड़ान 

झारखंड के रांची में रहने वाली सोनझरिया मिंज एक भारतीय शिक्षाविद होने के साथ, गणितज्ञ शिक्षक, कंप्यूटर वैज्ञानिक, शोधकर्ता और जनजाति अधिकार कार्यकर्ता हैं। उन्हें 2020 से जून 2023 तक सिदो कान्हू मुर्मू विश्विद्यालय के कुलपति नियुक्त किया गया, इसी के साथ वह कुलपति बनने वाली पहली जनजातीय महिला बन गईं। साल 2025 में उन्हें ट्रांसफॉर्मिंग इंडियंस नॉलेज रिसर्च गवर्नेंस एंड रिमैट्रियेशन पहल के तहत यूनेस्कों का सह अध्यक्ष नियुक्त किया गया। सोनझरिया ने जनजातीय समाज में शिक्षा दिलाने में अहम भूमिका निभाई। 

(The Logical Indian)  

सोनझरिया मिंज द्रौपदी मुर्मू के साथ (सोर्स – The Logical Indian

3. सामाजिक शिक्षा को आगे बढ़ाती टीचर श्रीजीता दास

सामुदायिक शिक्षण केंद्र में बच्चे और उनकी माताएं भाग लेती हुईं (The Indian Express

ओडिशा के सुंदरगढ़ से आने वाली श्रीजीता दास (30) कोरू फाउंडेशन के सहयोग से अनुसूचित समुदायों के बच्चों के जीवन को बेहतर बनाने का काम कर रही हैं। श्रीजीता ने प्रमुख रूप से दूरदराज के गांवों में मुंडा और भुइयां (SC & ST) समुदायों के लिए शिक्षण केंद्र स्थापित किया, यहां बच्चों को अंग्रेजी, उड़िया बोलना सिखाने के साथ-साथ व्यवहारिक शिक्षा भी देती हैं। उनका ये प्रयास कई समुदायों को प्रेरित कर रहा है, साथ ही बच्चों को कुछ नया करने के लिए प्रोत्साहित भी कर रहा है।  (The Indian Express) , news18 India 

4. जनजातीय शिक्षा को नया आकार देने वाली शिक्षिका छतकुंवर 

छतकुंवर छत्तीसगढ़ की कोरबा जनजाति से आती हैं। गरीब परिवार और विशेष जनजाति में जन्म लेने वाली छतकुंवर ने कठिन परिस्थितियों में भी पढ़ाई जारी रखी और पोस्ट ग्रेजुएशन में कंप्यूटर लिया। इसके बाद अपने इस कौशल का प्रयोग करते हुए सहायक शिक्षिका के रूप में पढ़ाना शुरू कर दिया। वह अब बड़े स्तर पर बेटियों और युवाओं को शिक्षा से जोड़ रही हैं। साथ ही पहाड़ी जनजातीय समाज में बदलाव की लौ भी जला रही है। news 18 India 

जनजातीय छात्रों का भविष्य सुधारती छतकुंवर (Souce – news 18 India) 

5. जनजातीय बालिकाओं का जीवन बदलती सुधा 

खंडवा में जॉइनिंग करने पहुंची सुधा (सोर्स – अमर उजाला)  

मध्य प्रदेश के दमोह से आने वाली सुधा जनजातीय समाज के लिए एक आदर्श बन गई हैं। संरपंच के रूप में समाज सेवा करने वाली सुधा का मन हमेशा से ही शिक्षा को बांटने पर रहा। अपनी इस चाह और जुनून के चलते उन्होने सरपंच के पद से इस्तीफा दे दिया और जिले के खालवा ब्लॉक में गुलाई माल आश्रम में प्राथमिक शिक्षा देने का कार्य शुरू कर दिया। शुरुआत में उन्हें बहुत सपोर्ट नहीं मिला, मगर धीरे-धीरे बालिकाओं ने स्कूल जाना शुरू कर दिया। राजनीतिक करियर की शुरुआत के लिए सरपंच का पद एक अहम कड़ी हो सकता है, मगर सुधा ने समाज कल्याण का एक अलग रास्ता चुना। 

6. बूटी देवी शिक्षा से रोशन कर रही जनजातीय बच्चों की जिंदगी 

चित्रकूट में बूटी देवी बदल रही हैं जिंदगी (ETV Bharat)

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट से आने वाली बूटी देवी पूरे देश के लिए एक उदाहरण हैं, जो खुद पढ़ना-लिखना सीखकर प्री-प्राइमेरी की शिक्षिका बनीं। बूटी देवी की शादी 12-13 साली की छोटी सी उम्र में हो गई। इसके बाद खुद के बल पर शिक्षा हासिल की और पढ़ाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उनका काम सबकी नजर में आया, चाइल्ड इंडिया फंड तक पहुंचा, जहां उन्हें प्री-प्राईमेरी टीचर के रूप में नियुक्त किया गया। आज वो बच्चों की जिंदगी सुधारने के साथ महिलाओं की हिम्मत बढ़ाकर और मार्गदर्शक बनकर उनकी जिंदगी सवार रही हैं। 

7. जंगलों से पढ़ाई और जनजातीयों की प्रेरणा बनती बसंती विश्नोई

पश्चिम बंगाल से सिंहभूम के घने जंगलों से जुड़ीं बसंती विश्नोई ने साबित कर दिया कि मन में ललक हो, तो कुछ भी संभव है। उन्होंने मैट्रिक में टॉप कर गांव में ऐसा करने वाली पहली महिला होने का गौरव प्राप्त किया है। वहीं 2023 में बारहवीं भी प्रथम श्रेणी से पास की थी। हिस्ट्री ऑनर्स करने के साथ बसंती अपने गांव के बच्चों को निशुल्क ट्यूशन देती हैं। वो लंबे समय से बिरहोर समाज के बच्चों का भविष्य उज्ज्वल बनाने के साथ देश को आत्मनिर्भर बना रही हैं। बसंती अब तक 9 से ज्यादा बच्चों को स्कूल भेज चुकी हैं। 

8. जनजातीय समाज से देश के सर्वोच्च पदवी तक पहुंचने का सफर 

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (सोर्स – एनडीटीवी)

देश की जनजाति महिलाओं की बात हो और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का नाम न आए, ऐसा नहीं हो सकता। मयूरभंज, ओडिशा से आने वाले प्रेजिडेंट मूर्मू ने करियर की शुरुआत शिक्षिका के रूप में की थी। 1994 से 1997 तक उन्होंने शिक्षण सेवा की, जिसके तहत रायरंगपुर के बच्चों को बिना वेतन लिए पढ़ाया और ईमानदारी, समाज सेवा का परिचय दिया। साल 1997 में नगर पार्षद चुने जाने के बाद द्रौपदी मुर्मू की राजनीतिक यात्रा शुरू हुई और साल 2022 तक देश के सर्वोच्च पद पर पहुंची। NDTV  

 9. संध्या पणमुगम कोविड काल से कर रही हैं शिक्षा में पहल का प्रयास 

कोयंबटूर के पहाड़ी इलाके में जनजातीय समुदाय से आने वाली 20 वर्षीय संध्या पुणमुगम कठिन परिस्थितियों में पढ़ाई करके अपने गांव की स्नातक बनने वाली पहली महिला बनी। कोविड काल के दौरान अपने शुरुआती संघर्षों के बाद शिक्षा की दिशा में काम करना शुरू कर दिया औ निशुल्क शिक्षा का बीड़ा उठाया। उस वक्त स्कूल बंद हो गए थे, कई जगहों पर इंटरनेट की कनेक्टीविटी नहीं थी। 

गांव के बच्चों को पढ़ाने के लिए संध्या को हर दिन तंदुए, हाथियों वाले जंगलों से होकर कई किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता था। इन कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने हार नहीं मानी और लक्ष्य की तरफ डटी रही। 

10. सोनी सोरी ने नक्सल प्रभावी इलाकों में उठाया पढ़ाने का बीड़ा

सोनी सोरी (सोर्स – लिंक)

दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़) की रहने वाली सोनी सोरी प्राथमिक शिक्षिका के रूप में कार्य करने साथ भयंकर नक्सल प्रभावित इलाकों में जाकर शिक्षा दी। महिलाओं के अधिकारों व पुलिसिया अत्याचारों के खिलाफ जमकर अपनी आवाज बुलंद की। 2018 में सोनी को फ्रंट लाइन डिफेंडर्स अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। 

11. कंचन कुबेर शिक्षा से बना रही हैं, कइयों की राह आसान  

छत्तीसगढ़ के सुदूर क्षेत्रों से जनजातीय गांव कोटमेर में 25 वर्षीय कंचन कुबेर कई लोगों की जिंदगी सवार रही हैं। 17 साल की छोटी सी उम्र में शादी होने के बावजूद घर की जिम्मदारियां संभाली और साथ ही लोगों को पढ़ाना शुरू कर दिया। वो घर-घर जाकर अभिभावकों से उनके बच्चों को रोज स्कूल भेजने के लिए कहतीं। उनका यह प्रयास व्यर्थ नहीं गया और कई लोग उनसे प्रेरित हुए। 

12. गांव में महिलाओं को शिक्षा का महत्व समझाती जानकी पटेल 

शिक्षा से लोगों के हौसले बुलंद करती, जानकी की मां का देहांत कम उम्र में ही हो गया था। वहीं जल्दी विवाह के चलते 8वीं तक ही पढ़ पाईं और बीच में पढ़ाई अधूरी छोड़ दी। मगर उन्होंने इस रास्ते को नहीं छोड़ा। वर्तमान में वह स्कूलों की प्रबंधन समिति के साथ जुड़कर (SMC) दोपहर का भोजन और शिक्षा दिलाने में योगदान दे रही हैं। जानकी जहां एक तरफ खेतों में काम  करती हैं, वहीं दूसरी तरफ महिलाओं को शिक्षा के लिए जागरूक भी करती हैं। 

13. लता राठिया बन रही हैं महिला शिक्षा की मिसाल 

कोरबा की लता राठिया की पढ़ाई परिवार ने 8 में ही रोक दी मगर वे उनके मजबूत इरादों को नहीं रोक सके। लता अब महिलाओं को शिक्षा के लिए जागरूक करने के साथ महिलाओं को शिक्षित करने के साथ बच्चों को नियमित पढ़ाई करने के लिए प्रेरित भी कर रही हैं। संसाधनों के अभाव के बावजूद वो लोगों को शिक्षा का महत्व समझा रहीं हैं। Feminism INdia

 14. जनजातीय समुदाय में बदलाव लाने वाली तुलसी मुंडा 

तुलसी मुंडा (सोर्स – Realshepower)

पद्मश्री से सम्मानित तुलसी मुंडा क्योंझर ओडिशा की रहने वाली हैं। उन्होंने जनजातीय समुदायों के जीवन को बदलने का काम किया है और जनजातीय बच्चों के कल्याण हेतु 17 विद्यालयों की स्थापना की है। अब तक तुलसी 25 हजार से ज्यादा बच्चों को शिक्षित कर चुकी हैं। Realshepower

15. जनजातीय शिक्षा को नए आयाम देने वाली बसंती देवी 

बसंती देवी ( सोर्स – The new Indian Express) 

राजस्थान के सिरोही की रहने वाली बसंती देवी का बचपन कठिनाइयों में गुजरा। बचपन में ही अनाथ होने के बाद पांचवीं मुश्किल से पास कर पाईं। पर पढ़ाई का साथ नहीं छोड़ा और बाद में आठवीं, दसवीं, बारहवीं करने के बाद स्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद प्रशिक्षण प्राप्त करके शिक्षक के रूप में कार्य करना शुरू कर दिया। वर्तमान में वह न केवल बच्चों को पढ़ाती हैं, बल्कि व्यस्क और प्रौढ़ों को भी साक्षरता के लिए  प्रेरित करती हैं।