2,525 किमी यात्रा, 5 राज्य, 40 करोड़ लोगों की जीवनरेखा राष्ट्रीय नदी गंगा; जानिए इसके ‘स्व-शुद्धिकरण’ का वैज्ञानिक रहस्य

गंगा भारत की सबसे पवित्र नदी है

गंगा भारत की सबसे पवित्र नदी है, जो गोमुख से निकलकर बंगाल की खाड़ी तक लगभग 2,525 किमी बहती है। यह पांच राज्यों से गुजरते हुए 40 करोड़ लोगों को जीवन, जल और आजीविका देती है। गंगाजल में मौजूद बैक्टीरियोफेज इसे प्राकृतिक रूप से शुद्ध रखते हैं, इसलिए इसे ‘मां गंगा’ कहा जाता है। 4 नवंबर 2008 को इसे राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया। 2025 में महाकुंभ के दौरान गंगा प्रदूषण पर कई भ्रामक रिपोर्टें सामने आईं, जबकि वैज्ञानिक अध्ययन इसके जल की विशिष्ट शुद्धता की पुष्टि करते हैं।

गंगा नदी को राष्ट्रीय नदी का दर्जा कब और क्यों दिया गया?

4 नवंबर 2008 को भारत सरकार ने गंगा नदी को भारत की राष्ट्रीय नदी (National River) घोषित किया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की अध्यक्षता वाली कैबिनेट ने इस ऐतिहासिक फैसले पर मुहर लगाई थी। इसका मुख्य उद्देश्य गंगा एक्शन प्लान (GAP) को गति देना था, जो 1985 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा शुरू हुआ था। GAP का लक्ष्य गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त करना था, लेकिन प्रारंभिक चरणों में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा देने से राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन अथॉरिटी (NGRBA) की स्थापना हुई, जो नदी की सफाई, संरक्षण और प्रबंधन के लिए एक मजबूत ढांचा प्रदान करती है। यह कदम गंगा के पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने और औद्योगिक प्रदूषण, सीवेज और कचरे को रोकने के लिए था।

भारत में यमुना, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, गोदावरी और कावेरी जैसी कई पवित्र नदियाँ हैं लेकिन नेशनल रीवर के लिए गंगा का ही चयन हुआ। गंगा नदी, गंगा डॉल्फिन, घड़ियाल और 140 से ज्यादा मछलियों की प्रजातियों का घर है।

वर्ष 2025 में गंगा नदी के सामने क्या-क्या चुनौतियां थी ?

 वर्ष 2025 की शुरुआत उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ से हुई, जहाँ जनवरी और फरवरी माह में लगभग 66 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने गंगा में स्नान किया। प्रशासन के भरसक प्रयासों के बावजूद इतनी विशाल जनसंख्या द्वारा एक साथ स्नान करना कई मायनों में चुनौतीपूर्ण रहा। इस दौरान गंगा में पूजा-सामग्री, फूल-मालाएँ और प्लास्टिक की वस्तुएँ प्रवाहित होने से कुछ क्षेत्रों में जल की गुणवत्ता प्रभावित हुई।

नमामि गंगे और गंगा स्वच्छता अभियान जैसे कार्यक्रमों के बावजूद, कानपुर, वाराणसी और पटना जैसे शहरों में अब भी बिना उपचार (untreated) औद्योगिक और घरेलू जल का बहाव गंगा में जारी रहा, जो 2025 में भी एक प्रमुख समस्या बनी रही। उदाहरण के लिए, 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रयागराज में प्रतिदिन लगभग 500 MLD सीवेज उत्पन्न होता है, जबकि शहर की उपचार क्षमता मात्र 340 MLD है।

गंगा के तटीय क्षेत्रों में जारी अवैध बालू खनन ने भी नदी की गहराई और जल गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव डाला। उदाहरण स्वरूप, बिजनौर (उत्तर प्रदेश) में दो दिनों की भारी वर्षा के बाद गंगा का प्रवाह लगभग 40,000 से बढ़कर 1.6 लाख क्यूसेक हो गया, जिससे किनारे बसे 25 से अधिक गाँवों में बाढ़ का खतरा उत्पन्न हुआ।

इसी वर्ष हरिद्वार में गंगा तट से पाँच किलोमीटर के दायरे में संचालित 48 स्टोन क्रशर इकाइयों में से 35 को हाईकोर्ट के आदेश पर बंद किया गया, जिससे प्रदूषण नियंत्रण पर ध्यान केंद्रित हुआ।

गंगा के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती उसकी सुरक्षा और संरक्षण योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन की कमी रही। PRS Legislative Research की एक रिपोर्ट के अनुसार, नमामि गंगे मिशन के तहत उपलब्ध बजट का केवल लगभग 69% हिस्सा ही अब तक उपयोग में लाया जा सका है।

 महाकुंभ के दौरान विवाद

महाकुंभ 2025 में गंगा जल गुणवत्ता को लेकर विवाद रहा । सीपीसीबी का शुरूआत रिपोर्ट्स में संगम पर फीकल कोलाइफॉर्म 23,000-49,000 एमपीएन/100 मिली और बीओडी 3.94 mg/L पाया गया, जो स्नान के लिए असुरक्षित था, जिस पर एनजीटी ने चिंता जताई और मृत मछलियां-गंदे ड्रेन की तस्वीरें वायरल हुईं। लेकिन मार्च 2025 को जारी पॉल्यूशन बोर्ड (सीपीसीबी) ने एनजीटी को सौंपी गई नई रिपोर्ट में कहा कि महाकुंभ के दौरान पानी की गुणवत्ता स्नान के लिए योग्य था और फीकल कोलिफॉर्म बैक्टीरिया मानक (500 एमपीएन/100 मिली) के नीचे था। नई रिपोर्ट के अनुसार, महाकुंभ के दौरान गंगा नदी का पानी स्नान के लिए भी उपयुक्त था। बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) भी सामान्य स्तर पर रही।

 गंगा का स्व-शुद्धिकरण: वैज्ञानिक रहस्य

गंगा का पानी सामान्य नदियों से अलग है। साल 1896 में ब्रिटिश वैज्ञानिक अर्नेस्ट हैंकिन ने पाया कि गंगा का पानी चोलरा बैक्टीरिया को तेजी से नष्ट करता है। 1917 में फ्रेंच वैज्ञानिक फेलिक्स डी’हेरेल ने इसे बैक्टीरियोफेज कहा। यानी वह वायरस जो बैक्टीरिया को नष्ट करते हैं। हाल के अध्ययनों में गंगा में 1,100 प्रकार के बैक्टीरियोफेज पाए गए, जो दुनिया की किसी दूसरी मीठे पानी की नदी में नहीं हैं।

वैज्ञानिक अध्ययन: गंगा क्यों है खास?

2025 में पद्मश्री डॉ. अजय कुमार सोनकर के अध्ययन में सिद्ध हुआ कि गंगा के फेज बैक्टीरिया के RNA को हैक कर 100-300 नए फेज बनाते हैं, हानिकारक बैक्टीरिया को चंद मिनटों में नष्ट करते हैं। गंगा का क्षारीय pH (7.5-8.5) और सिलिकेट मिनरल्स फेज की क्षमता बढ़ाते हैं।  2009 के करेंट माइक्रोबायोलॉजी पेपर में E. coli नष्ट होने का प्रमाण मिला।  

वर्ष 2016 में, चंडीगढ़ स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी (IMTECH) के माइक्रोबायोलॉजिस्ट ने गंगा के पानी की विशेषताओं का अध्ययन किया। प्रौद्योगिकी संस्थान के वरिष्ठ प्रधान वैज्ञानिक डॉ. षणमुगम मायिलराज ने बताया कि गंगा नदी में न केवल नए वायरोम पाए गए, बल्कि इसमें अज्ञात दोहरे स्ट्रैंड वाले डीएनए वायरस भी शामिल हैं।

डॉ. मायिलराज और उनकी टीम ने गंगा के पानी और तलछट में, गंगा के प्रदूषण को हटाने में सक्षम, 2025 नए वायरस की पहचान की। पानी में ऑसिलेटोरिफाइक्यूडी, फ्लेवोबैक्टीरिया, स्फिंगोबैक्टीरिया, ए, बीटा और डेल्टाप्रोटियोबैक्टीरिया जैसे कई जीवाणु समूह भी पाए गए। यह अध्ययन हरिद्वार से वाराणसी तक, मानसूनपूर्व और मानसून पश्चात लिए गए नमूनों पर आधारित था।