महाराष्ट्र में दक्कन के पठारों के बीच एक लग्जरी ट्रेन दौड़ती है ‘डेक्कन क्वीन’ यानी दक्कन की रानी। अंग्रेजों ने मुंबई से पुणे के बीच सफर को आरामदायक और आनंदमयी बनाने के लिए 1 जून 1930 को इसे आरम्भ किया था।
लेकिन क्या आप जानते हैं पहाड़ों के बीच जिस खूबसूरत रेलमार्ग पर होकर यह ट्रेन गुजरती है, उसके बनने के पीछे एक ऐसी दर्दनाक कहानी है, जिसे इतिहास के पन्नों में दबा दिया गया। पहाड़ों के बीच स्थित भोर घाट दर्रा से होकर गुजरने वाली इस रेलवे लाइन का निर्माण कोई साधारण कार्य नहीं था, बल्कि भारतीयों का मौन बलिदान था, जिसने अंग्रेजों के आराम की नींव रखी।
यह बलिदान था उन 24000 भारतीय मजदूरों का, जिन्होंने इस रेलमार्ग को बिछाने के दौरान अपनी जान गंवाई थी। ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में आधुनिक बुनियादी ढांचे (Infrastructure) का विकास हुआ, लेकिन इसके लिए भारतीयों को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। यह विकास जन-कल्याण के लिए नहीं, बल्कि औपनिवेशिक हितों (Colonial Interests) को पूरा करने के लिए किया गया था। यह घटना इसका सटीक उदाहरण है। आइए जानते हैं पूरी कहानी विस्तार से।

भारतीय रेलवे की पहली सुपरफास्ट ट्रेन, दक्कन क्वीन, भोर घाट की सुंदर घाटियों से गुजरती हुई, इमेज सोर्स : blog.indicinspirations.com
यह कहानी है 1853 की। जब अंग्रेजों ने अपनी कमाई बढ़ाने के लिए मुंबई को व्यापार का केंद्र बनाने का निर्णय लिया। जिसके तहत दो रेल मार्ग बनाने का निर्णय लिया गया। एक थुल घाट होते हुए मुंबई को नासिक से जोड़ने वाली रेलवे लाइन और दूसरी मुंबई से भोरे घाट होते हुए पुणे को जोड़ने वाली। रेलवे लाइन बिछाने के कार्य में करीब 42,000 मजदूरों ने काम किया।
21 अप्रैल 1863 तक यह निर्माण काम पूरा हुआ। यह फैसला अंग्रेजों के लिए आर्थिक और रणनीतिक था, लेकिन इसे जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी उन भारतीय मजदूरों ने निभाई, जिनके पास सुरक्षा का कोई विकल्प नहीं था। इन मजदूरों की जिंदगी, काम के दौरान किसी युद्धभूमि से कम नहीं थी। हजारों पुरुष, महिलाएं और बच्चे पहाड़ों को काटने के लिए रस्सी के सहारे लटकते, बिना किसी सुरक्षा किट के। उन्हें नंगे हाथों से छेनी और हथौड़ा चलाना पड़ता।
ब्रिटिश सरकार ने इस रेल परियोजना के निर्माण का कार्य विलियम फेविएल नाम के क्रूर ब्रिटिश ठेकेदार को दिया। इसलिए, क्योंकि उसके पास पहले से ही इंग्लैंड में रेलवे लाइनों को बनाने का अनुभव था। वह इतना क्रूर था कि बिना किसी सुरक्षा उपकरणों के श्रमिकों को पहाड़ों की खुदाई करने पर मजबूर करता। मना करने पर श्रमिकों के साथ अत्याचार करता। काम करने के दौरान जब श्रमिक चोटिल होते तो, उसका उपचार कराने के बजाए उन्हें फिर से काम पर लगा देता।
पहाड़ों के बीच दुर्गम मार्गों पर रेलवे लाइन बिछाने में जुटे भारतीय श्रमिक, इमेज सोर्स- livehistoryindia.com
दिनभर चट्टानों को तोड़ना, मिट्टी ढोना और खतरनाक ढलानों पर काम करना मजदूरों के लिए प्रतिदिन का काम था। जरा सी चूक होने का मतलब था, जान जाना। खतरा सिर्फ एक तरफा नहीं था। वहां पानी की भारी कमी थी, असहनीय गरमी और ऊपर से चट्टान गिरने का भय हर पल बना रहता था।
लेकिन फिर भी ठेकेदार विलियम फेविएल भारतीय मजदूरों से दिन-रात काम लेता। एक साथ करीब 25 हजार मजदूर लगातार काम पर लगे रहते ताकि अंग्रेजों का सपना शीघ्र पूरा हो सके। काम मानसून में ही रुकता, जब तेज बारिश होती।
लेकिन असली त्रासदी सिर्फ कठिन काम और भौगोलिक परिस्थितियां ही नहीं थी, बल्कि वे बीमारियां भी थीं जो इस इलाके में मौत बनकर फैल रही थीं। वर्ष 1859-60 में बरसात के महीने में पहाड़ियों की तलहटी में भरने वाले गंदे पानी से मलेरिया और हैजा जैसी महामारियां फैली। न पीने के लिए साफ पानी, न बीमार मरीजों के उपचार का कोई प्रबंध, रहने की स्थिति तो बहुत ही खराब, जिसके चलते हजारों मजदूरों की जान गई। साथ ही मजदूरों काम करने के दौरान हुई दुर्घटनाओं जैसै पहाड़ खिसकना, रस्सी टूटना, खनन के दौरान ऊपर से पत्थर गिरना आदि में भी हजारों मजदूर मारे गए। इस प्रकार मरने वाले मजदूरों की कुल संख्या करीब 24 हजार तक पहुंच गई थी। यह मौतें अंग्रेजों के लिए सिर्फ आंकड़ा थीं। लेकिन असल में उन हजारों परिवारों के टूटने की कहानियां थीं, जिनका नाम इतिहास में दर्ज तक नहीं हुआ।
24 हजार मजदूरों के बलिदान और करीब 42 हजार मजदूरों की दिन-रात की मेहनत के बाद 21 अप्रैल 1863 को भोर घाट रेलवे लाइन का उद्घाटन हुआ। भारतीय मजदूरों ने दिन-रात अथक मेहनत करके घाट पर 25 सुरंगें, 23 पुल और 60 पुलिया बनाकर रेलवे लाइन बिछाई। इस रेलमार्ग को बंबई के गवर्नर सर बार्टल फ्रेरे ने इंजीनियरिंग का चमत्कार बताया। उद्घाटन के दौरान कई कार्यक्रम हुए। अंग्रेज अधिकारियों ने इसे ब्रिटिश शासन वाले भारत के ‘रेलवे युग’ की शुरुआत बताया। लेकिन उस दिन किसी ने उन भारतीय मजदूरों को याद तक नहीं किया, जिन्होंने अपने प्राणों की आहूति देकर इस दुर्गम रेलमार्ग को बनाया था।
भारतीय मजदूरों का संघर्ष सिर्फ जान पर खेलकर काम करना ही नहीं था, बल्कि इस कठिन काम के बदले मिलने वाली मजदूरी को भी ब्रिटिश ठेकेदार विलियम फेविएल हड़प लेता था। मजदूरों को महीनों तक मजदूरी नहीं मिलती थी और जब मिलती थी, तो वह भी आधी। 1859 में स्थितियां असहनीय हुईं, तो मजदूरों ने विद्रोह किया, जिसे ब्रिटिश सरकार ने क्रूरता के साथ दबा दिया।
वर्षों बाद यही रेलगार्म अंग्रेजों के लिए आराम और ऐश्वर्य का प्रतीक बन गया, जब 1 जून 1930 को इस सुंदर रेलमार्ग से ‘डेक्कन क्वीन’ जैसी ट्रेन चलाई गई। यह ट्रेन सिर्फ इसलिए थी, ताकि अंग्रेज मुंबई से पुणे जाने के लिए इस लग्जरी ट्रेन में बैठकर पहाड़ों की सुंदरता का आनंद ले सकें। लेकिन उन्होंने इस सुंदरता के पीछे छिपी भारतीय मजदूरों की पीड़ा को कभी महसूस नहीं किया।

डक्कन क्वीन से यात्रा, साभार : news18.com
आज जब हम उसी रास्ते से सफर करते हैं, तो हमें सिर्फ हरे-भरे पहाड़, सुरंगें और पुल दिखाई देते हैं। लेकिन सच यह है कि यह रास्ता सिर्फ पत्थरों और लोहे से नहीं बना, बल्कि हजारों भारतीय मजदूरों की कुर्बानी से खड़ा हुआ है। इतिहास ने भले ही उनके नाम भुला दिए हों, लेकिन उनका संघर्ष और बलिदान इस घाट की हर चट्टान में दर्ज है। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि जिस आराम को हम आज सहज मानते हैं, उसके पीछे कभी अनेक लोगों ने अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी थी।

