इस्लाम की मजहबी कट्टरता हमेशा से सामाजिक ताने-बाने के लिए खतरा रही है। इनमें से तीन तलाक भी एक बड़ी समस्या रही। लेकिन 60 के दशक में मुस्लिम समाज से ही इस कुप्रथा के खिलाफ एक ऐसी आवाज उठी, जिसने बड़े-बड़े मौलानाओं और मौलवियों की नींद हराम कर दी थी।
इस आवाज के पीछे थे, हामिद दलवाई। जब भारत में 30 जुलाई 2019 को तीन तलाक के खिलाफ बना कानून, वह हामिद दलवाई के संघर्ष का ही परिणाम था। 1960 के दशक में जब तीन तलाक और उसके बाद होने वाले बहुविवाह व हलाला जैसी प्रथाओं पर सवाल उठाना भी ‘इस्लाम’ के खिलाफ माना जाता था, तब हामिद दलवाई ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष का बिगुल फूंका। यह केवल एक सामाजिक आंदोलन नहीं था, बल्कि उस भय और चुप्पी के खिलाफ विद्रोह था, जिसने लाखों महिलाओं की जिंदगी को बरबाद कर दिया था।

हामिद किदवई, इमेज सोर्स- DNA India
तीन तलाक के खिलाफ हामिद दलवाई के संघर्ष की कहानी प्रारंभ होती है, साल 1960 के दशक से। देश आजादी के बाद नए संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की ओर बढ़ रहा था, लेकिन मुस्लिम महिलाओं की स्थिति तीन तलाक जैसी कुप्रथा के चलते असमान थी। तीन तलाक जैसी पुरुष प्रधान एकतरफा कुप्रथा ने अनगिनत महिलाओं का जीवन असुरक्षित बना दिया था। एक शब्द ‘तलाक’ को तीन बार कहने भर से बोलने से रिश्ते टूट जाते थे, औरतें बेघर हो जाती थीं।
लेकिन इन महिलाओं के लिए कोई भी कानूनी सहायता नहीं थी। मुस्लिम समाज सीना चौड़ा करके इसे अपनी मजहबी परंपरा बताता था। तब इस वातावरण में हामिद दलवाई ने महसूस किया कि यदि इस अन्याय के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठी, तो आने वाली पीढ़ियां भी इसी अंधकार में जीने को मजबूर रहेंगी।
हामिद दलवाई ने केवल लेख लिखकर या भाषण देकर अपने कर्तव्य की पूर्ति नहीं मानी। उन्होंने सीधे संघर्ष का रास्ता चुना। उन्होंने 1965 में सदा-ए-निस्वान नामक संगठन की स्थापना की और तीन तलाक पीड़ित महिलाओं के साथ संपर्क स्थापित करना शुरु किया। 18 अप्रैल 1966 को मुंबई की सड़कों पर वह ऐतिहासिक दृश्य दिखाई दिया, जब हामिद दलवाई सात मुस्लिम महिलाओं को साथ मुंबई की सड़कों पर तीन तलाक के खिलाफ पहली बार विरोध मार्च निकाला। 7 महिलाओं की संख्या भले ही छोटी थी, लेकिन उसका साहस विशाल था। उस समय किसी मुस्लिम महिला का सार्वजनिक रूप से तीन तलाक के खिलाफ खड़ा होना किसी विद्रोह से कम नहीं था। इन महिलाओं ने महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री वसंतराव नाइक को ज्ञापन सौंपकर तीन तलाक, बहुविवाह और हलाला जैसी प्रथाओं पर रोक लगाने की मांग की। यही भारत में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के लिए पहला संगठित आंदोलन था।
इस आंदोलन के पीछे हामिद दलवाई बिल्कुल अकेले खड़े थे। कट्टरपंथी उन्हें ‘मजहब का दुश्मन’ कहकर बदनाम कर रहे थे। उनके खिलाफ कट्टरपंथियों ने हजारों मुस्लिम महिलाओं की रैलियां आयोजित की। साथ ही 1971 में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ प्रोटेक्शन कमेटी का गठन किया। लेकिन दलवाई पीछे नहीं हटे। उन्होंने साफ कहा कि निकाह और तीन तलाक जैसे मुद्दे मजहबी नहीं, बल्कि मानवीय और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े प्रश्न हैं। उन्होंने कट्टरपंथियों से स्पष्ट कहा कि मुस्लिम समाज की प्रगति तब तक संभव नहीं है, जब तक महिलाओं को समान अधिकार न मिले।
हामिद दलवाई की सबसे बड़ी ताकत उनका तर्क और संवैधानिक दृष्टिकोण था। वह जानते थे कि केवल भावनात्मक भाषणों से बदलाव नहीं आएगा। इसलिए उन्होंने मुस्लिम महिलाओं की वास्तविक समस्याओं को समाज के सामने रखा। वह तलाक पीड़ित महिलाओं की बैठकें आयोजित करते थे, उनकी कहानियों को सामने लाते थे और यह बताते थे कि तीन तलाक केवल एक मजहबी कुप्रथा नहीं, बल्कि महिलाओं के साथ होने वाला गंभीर अन्याय है। दलवाई ने यह भी कहा कि केवल तीन तलाक खत्म करना पर्याप्त नहीं होगा, बहुविवाह और हलाला जैसी प्रथाओं पर भी रोक जरूरी है।
इसी सोच को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने 1970 में ‘मुस्लिम सत्यशोधक मंडल’ की स्थापना की। इस संगठन का उद्देश्य मुस्लिम समाज में सामाजिक सुधार और महिलाओं के अधिकारों के लिए जागरुकता फैलाना था। दलवाई गांव-गांव, शहर-शहर जाकर महिलाओं को जागरूक करते। वे मुस्लिम समाज को आधुनिक शिक्षा, वैज्ञानिक सोच और संवैधानिक मूल्यों की ओर ले जाना चाहते थे।
लेकिन इस संघर्ष की कीमत भी उन्हें चुकानी पड़ी। कट्टरपंथियों ने उन्हें लगातार निशाना बनाया। उनकी पत्नी मेहरुन्निसा दलवाई तक का सामाजिक बहिष्कार किया गया। उन्हें सभाओं में बोलने से रोकने के प्रयास हुए। यहां तक कि उनके निधन के बाद भी विरोध कम नहीं हुआ। 3 मई 1977 में जब मात्र 44 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हुई, तब भी कुछ कट्टरपंथी तत्वों ने उनके प्रति अपमानजनक रवैया अपनाया। सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने मृत्यु के बाद अपना अंतिम संस्कार हिंदू परंपरा के अनुसार करने की बात कही थी।
आज जब तीन तलाक पर कानून बन चुका है और तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है, तब यह याद रखना जरूरी है कि इस संघर्ष की नींव दशकों पहले हामिद दलवाई ने रखी थी। उन्होंने उस समय आवाज उठाई, जब ऐसा करना अपने ही समाज के खिलाफ खड़े होने जैसा माना जाता था। उन्होंने दिखाया कि असली सुधार वही है, जो कठिन परिस्थितियों में भी सच का साथ दे।
हामिद दलवाई का आंदोलन केवल तीन तलाक के खिलाफ नहीं था, बल्कि वह महिलाओं की गरिमा, समानता और इंसाफ की लड़ाई था। उन्होंने यह साबित कर दिया कि सामाजिक परिवर्तन हमेशा बड़ी भीड़ से नहीं, बल्कि कुछ साहसी लोगों के संकल्प से शुरू होता है। मुंबई की उस ऐतिहासिक पदयात्रा में शामिल सात महिलाओं के कदम, आने वाले समय की दस्तक था। वही दस्तक, जिसने अंततः पूरे देश से तीन तलाक को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म कर दिया।

