2 फरवरी को वर्ल्ड वेटलैंड्स डे मनाया जाता है, जो 1971 में वेटलैंड्स पर रामसर कन्वेंशन पर हस्ताक्षर की याद दिलाता है। इस दिन ईरान के रामसर में, दुनिया भर के देशों ने वेटलैंड्स की सुरक्षा के लिए दुनिया की पहली वैश्विक संधि को अपनाया था। ये
वेटलैंड्स ऐसे इकोसिस्टम हैं जो ताजा पानी, खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता, बाढ़ नियंत्रण और जलवायु स्थिरता को प्रदान करते हैं। आज, दुनिया के अधिकांश देश इस फ्रेमवर्क का पालन करते हैं, यह मानते हुए कि सभ्यता खुद ‘स्वस्थ जल इकोसिस्टम’ पर निर्भर करती है।

1971 में रामसर सम्मेलन, फोटो क्रेडिट : ramsar.org
भारत के लिए, वेटलैंड्स कोई आधुनिक पर्यावरणीय खोज नहीं थे, बल्कि सभ्यता की नींव थे। ग्लोबल संधियों से हजारों वर्ष पहले, भारतीय समुदायों ने टैंकों, झीलों, बावड़ियों, नहरों और पवित्र नदियों को इंटीग्रेटेड वॉटर सिस्टम के रूप में अपनाया था। ये वेटलैंड्स इकोलॉजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर, सामाजिक संस्था और धार्मिक स्थान थे, जिन्हें मंदिरों, गांवों और राजाओं द्वारा कृषि समृद्धि और सूखे की समस्या से निपटने के लिए बनाए रखा जाता था।
भारत की जल सभ्यता की सबसे बड़ी ऐतिहासिक पहलों में से एक कल्लनई (ग्रैंड एनिकट) बांध था, जिसे दूसरी शताब्दी ईस्वी के आसपास चोल राजा करिकाल चोल ने तमिलनाडु में कावेरी नदी पर बनवाया था। बड़े-बड़े बिना तराशे पत्थरों से बना यह बांध, नदी के पानी को सिंचाई नहरों की ओर मोड़ता था, जिससे कावेरी डेल्टा दक्षिण एशिया के सबसे उपजाऊ कृषि क्षेत्रों में से एक बन गया। कल्लनई दुनिया की सबसे पुरानी काम करने वाली जल-मोड़ संरचनाओं में से एक है और भारत में लगातार प्रयोग होने वाली सबसे पुरानी संरचना है, जो लगभग दो हजार साल पहले की उन्नत हाइड्रोलिक इंजीनियरिंग को सामने लाती है।

ग्रैंड एनिकट बांध (इनसेट में मूल डिजाइन), फोटो क्रेडिट : graconllc.com
कल्लनई सिर्फ एक बांध नहीं था, बल्कि एक सभ्यतागत प्रणाली थी। इसने बाढ़ को नियंत्रित किया, लाखों किसानों को जीवन दिया और स्थानीय समुदायों द्वारा प्रबंधित तालाबों और नहरों के नेटवर्क को मजबूत सहारा दिया। चोल राज्य ने अत्यधिक संगठित सिंचाई शासन को विकसित किया, जिसमें जल प्रबंधन को ग्राम स्वशासन और मंदिर संस्थानों के साथ जोड़ा। यह विकेन्द्रीकृत पर्यावरण शासन का एक प्रारंभिक मॉडल था, जिसने सदियों तक सभ्यता को बनाए रखा।
वेटलैंड्स को आधुनिक दुनिया में पहचान बीसवीं सदी के आखिर में ही मिली। 1971 के रामसर कन्वेंशन ने वेटलैंड्स के संरक्षण और टिकाऊ प्रयोगों के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग मांगा, और बायोडायवर्सिटी (जैव विविधता संरक्षण) की सुरक्षा, पानी की सुरक्षा और क्लाइमेट रेजिलिएंस (जलवायु लचीलापन) में उनकी भूमिका पर जोर दिया।
भारत 1982 में इस सम्मेलन में शामिल हुआ और आज भारत में दर्जनों रामसर साइट्स हैं, जिन्हें भारत सरकार से मान्यता है। यह उन इकोसिस्टम के बारे में नई जागरुकता को दिखाता है, जिन्हें हजारों सालों से स्थानीय स्तर पर प्रबंधित किया जाता था।
इसलिए 2 फरवरी सिर्फ एक पर्यावरण अवलोकन से कहीं ज्यादा है। यह एक सभ्यतागत सच्चाई का प्रतीक है। कहा जाता है कि ‘जिन समाजों ने पानी पर महारत हासिल की, उन्होंने इतिहास पर महारत हासिल की’।
कल्लानाई की पत्थर की इंजीनियरिंग से लेकर मंदिर के तालाबों और पवित्र नदियों तक, भारत ने आधुनिक विज्ञान द्वारा इसे नाम दिए जाने से बहुत पहले एक वेटलैंड सभ्यता का निर्माण कर चुका था।
आज जैसे-जैसे आधुनिक देश पानी की कमी और जलवायु संकट से जूझ रहे हैं, 2 फरवरी का दिन हमें याद दिलाता है कि पानी के प्रति सस्टेनेबिलिटी, पानी का चिंतन 1971 में पहली बार नहीं हुआ था, इसका अभ्यास भारत में तो हजारों सालों से किया जा रहा था।

