भारत के स्वाधीनता संग्राम का एक चमकता हुआ सूरज, जो पराधीन भारत में भी ‘आजाद’ रहा, लेकिन अपनों के बुने मुखबिरी जाल में ऐसा फंसा, जिससे वह बचकर निकल नहीं सका। इस मुखबिरी की गवाही प्रयागराज का अल्फ्रेड पार्क आज भी दे रहा है।
27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में मात्र 24 साल की आयु में चंद्रशेखर आजाद ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। उनका यह बलिदान सिर्फ संयोग नहीं बल्कि एक विश्वासघात था। जिसके सुराग CID की एक गोपनीय चिट्ठी से जुड़े हैं। जिसमें इलाहाबाद के एक विशेष व्यक्ति के नाम का जिक्र है, जो आज भी पहेली बना हुआ है। यह व्यक्ति अंग्रेजों का मुखबिर था और पुलिस प्रशासन के दबाव में चंद्रशेखर आजाद से जुड़ी हुई जानकारियां उन्हें दे रहा था।

चंद्रशेखर आजाद की वास्तविक फोटो, इमेज सोर्स : bhardwaj blogspot
27 फरवरी 1931 को अपने बलिदान से ठीक 7 दिन पहले, चंद्रशेखर आजाद जवाहरलाल नेहरू से मिलने इलाहाबाद स्थित उनके पैतृक आवास आनंद भवन पहुंचे थे। इस मुलाकात का जिक्र जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा ‘एन ऑटोबायोग्राफी’ में किया है। आत्मकथा के लेख से यह स्पष्ट हो जाता है कि दोनों के बीच हुई बातचीत सार्थक नहीं रही। नेहरू ने इस भेंट का जिक्र करते हुए आजाद और उनके साथियों द्वारा की जाने वाली स्वाधीनता संग्राम की गतिविधियों को ‘आतंक’ से जोड़कर लिखा है। जबकि अप्रत्यक्ष रूप से क्रांतिकारियों की तुलना आतंकियों से की। नेहरू ने अपनी ऑटोबायोग्राफी में इस भेंट का उल्लेख करते हुए, कई बार आतंकवाद और आतंकी शब्द का प्रयोग किया है। भेंट करने का उद्देश्य सफल होते न देख, चंद्रशेखर आजाद नाराज होकर आनंद भवन से लौट आए थे।

नेहरू ने अपनी ऑटोबायोग्राफी में आनंद भवन में चंद्रशेखर ‘आजाद’ से हुई भेंट का जिक्र किया, इमेज सोर्स : आज तक
इसी भेंट के 7 दिन बाद, चंद्रशेखर आजाद साथी क्रांतिकारी सुखदेव राज के साथ इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में बैठकर योजना बना रहे थे। यह पार्क नेहरू के आनंद भवन के पास ही था। दोनों क्रांतिकारी अपने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े कार्यों पर मंत्रणा कर ही रहे थे कि किसी मुखबिर ने इसकी जानकारी ब्रिटिश पुलिस अधिकारी नॉट बावर को दे दी। बावर तुरंत 40 सशस्त्रधारी सिपाहियों के साथ वहां पहुंचा और पार्क को चारों ओर से घेर लिया। आजाद के कहने पर सुखदेव राज वहां से निकलने में सफल रहे। इसके बाद 40 मिनट तक कई राउंड फायरिंग हुई। आजाद के पास मौजूद 6 गोलियों से उन्होंने, 5 ब्रिटिश पुलिसकर्मियों को मार गिराया। लेकिन वह गंभीर रूप से घायल हुए, उन्होंने अंतिम गोली स्वयं को मारकर आजीवन आजाद रहने का संकल्प पूरा किया।

बलिदान के बाद चंद्रशेखर आजाद का चित्र, इमेज सोर्स- bhardwaj blogspot
चंद्रशेखर आजाद के वीरगति प्राप्त होने के बाद ब्रिटिश पुलिस अधिकारी बावर ने अपने बयान में कहा था कि उन्होंने बहादुरी दिखाई थी। लेकिन उनकी यह बहादुरी धोखे की बलि चढ़ गई। आखिर वह कौन था, जिसने आजाद के पार्क में होने की जानकारी अंग्रेजों को दी थी। 10 मार्च 1947 में सेंट्रल इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट में एक गोपनीय चिट्ठी सामने आई थी, जिसमें आजाद की मुखबिरी करने वाले 3 लोगों जिक्र है। जिसमें से 2 मुखबिर सहारनपुर जबकि 1 इलाहाबाद (प्रयागराज) का होने का जिक्र है। यह तीनों कौन थे, अभी तक खुलासा नहीं हो सका। हालांकि आजाद के भतीजे सुजीत आजाद ने नेहरू पर आजाद की हत्या कराने के आरोप लगाए थे। लेकिन इस दावे को लेकर प्रमाण की जरूरत है, जो जांच से ही संभव है।

सीआईडी द्वारा लिखा गया पत्र: इमेज सोर्स- हिंदू पोस्ट
चंद्रशेखर आजाद की मौत के कई रहस्य सीआईडी के फाइलों में दफन हैं। यह फाइल आज भी लखनऊ के सीआईडी कार्यालय में रखी हुई है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस फाइल में उनकी मौत से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें और बयान दर्ज हैं। फाइल की सच्चाई लाने का कई बार प्रयास हुआ, पर कांग्रेस की सरकार ने इसे सार्वजनिक करने से मना कर दिया। इतना ही नहीं, आजादी के बाद एक बार भारत सरकार ने उस फाइल को नष्ट करने के लिए तत्कालीन यूपी के मुख्यमंत्री को आदेश भी दिया था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं कराया था।
अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर इतने बड़े क्रांतिकारी से जुड़ी फाइल को भारत सरकार नष्ट क्यों कराना चाहती थी। यह उसी रहस्य की तरह है जैसे कि आजाद की मुखबिरी करने वाले इलाहाबाद के उस बड़े नेता सहित 3 मुखबिरों का नाम। सीआईडी की इस फाइल से चंद्रशेखर आजाद की मुखबिरी करने वालों की सच्चाई सामने आ सकती है। लेकिन फिलहाल, आजाद के साथ हुआ विश्वासघात स्वाधीनता संग्राम के सबसे मार्मिक रहस्यों में से एक बना हुआ है।

