कंचनप्रभा देवी : जब अकेली रानी ने महल का षड्यंत्र कुचलकर पाकिस्तान की चाल नाकाम कर दी

कंचनप्रभा देवी

अगर त्रिपुरा पाकिस्तान का हिस्सा बन जाता, तो आज पूर्वोत्तर की तस्वीर कैसी होती? यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि एक सच्चा मोड़ है भारतीय इतिहास का, जिसे मोड़ने वाली थीं एक युवा रानी कंचनप्रभा देवी। महाराजा बीर बिक्रम किशोर देवबर्मन की अचानक मौत, नाबालिग उत्तराधिकारी, महल के भीतर सत्ता की भूख और बाहर से पाकिस्तान समर्थित षड्यंत्र, सब मिलकर त्रिपुरा को भारत से दूर धकेलने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन रानी ने कहानी ही बदल दी।  

अचानक बदल गई गद्दी और आरम्भ हुआ आंतरिक संघर्ष

वर्ष 1947 में जब देश विभाजन की त्रासदी से जूझ रहा था, उसी वर्ष त्रिपुरा के महाराजा बीर बिक्रम किशोर देवबर्मन की अचानक मृत्यु हो गई, पीछे छोड़कर नाबालिग बेटे कीरित बिक्रम और रानी कंचनप्रभा देवी को। परंपरा के अनुसार शासन की जिम्मेदारी रानी ने रीजेंट के रूप में संभाली, लेकिन यह सत्ता संभालना उतना शाही नहीं था, जितना सुनने में लगता है। 

रानी कंचनप्रभा देवी, फोटो क्रेडिट : wikipedia.org

राजमहल के भीतर ही एक और ताकत जाग रही थी, महाराजा के सौतेले भाई दुर्जय किशोर की, जो खुद गद्दी के सपने देख रहा था। इसी समय, बाहर की दुनिया में मुस्लिम लीग की राजनीति, पूर्वी पाकिस्तान की नजदीकी और सीमावर्ती असुरक्षा ने त्रिपुरा को एक संवेदनशील मोड़ पर ला खड़ा किया, जहां एक छोटी सी चूक पूरे राज्य की दिशा बदल सकती थी।​

महल के भीतर का षड्यंत्र : दुर्जय किशोर और गेडू मियां का खेल

दुर्जय किशोर ने समझ लिया कि अकेली रानी को गिराने के लिए केवल महल की चालें काफी नहीं होंगी, उन्हें बाहरी राजनीतिक ताकत की भी जरूरत है। यहां उनकी मुलाकात हुई स्थानीय प्रभावशाली मुस्लिम व्यापारी और ‘अंजुमन-ए-इस्लामिया’ के नेता अब्दुल बारिक उर्फ गेडू मियां से, जिसे मुस्लिम लीग का समर्थन प्राप्त था और जो त्रिपुरा को पूर्वी पाकिस्तान के साथ जोड़ने के लिए सक्रिय रूप से जमीन तैयार कर रहा था। योजना साफ थी कि त्रिपुरा को भारत में विलय होने से रोकना, पाकिस्तान के साथ जोड़ने की मांग को हवा देना और इस राजनीतिक उथल-पुथल के बीच दुर्जय किशोर की दावेदारी को मजबूत करना, ताकि सत्ता महल के भीतर उनके पक्ष में आ जाए।​ 

धीरे-धीरे यह गठजोड़ रीजेंसी काउंसिल तक पहुंच गया, जहां कुछ मंत्री दुर्जय किशोर और पाकिस्तान समर्थक लॉबी के प्रभाव में आने लगे। अगर यह पूरी तरह सफल हो जाता, तो त्रिपुरा की आधिकारिक आवाज ही भारत में विलय के खिलाफ हो सकती थी और कहानी बिल्कुल अलग दिशा में चली जाती।​

रानी का मास्टरस्ट्रोक : मंत्रियों को बाहर और सीमा को किया बंद

कंचनप्रभा देवी तक जब यह खबर पहुंची कि उनकी ही रीजेंसी काउंसिल के कुछ सदस्य दुर्जय किशोर और गेडू मियां के साथ खड़े हैं, तो उनके सामने दो रास्ते थे, चुप रहकर धीरे-धीरे अपनी ताकत खो देना, या खुले टकराव का खतरा उठाकर सीधे वार करना। उन्होंने दूसरा रास्ता चुना और यही उनका सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ। रानी ने परिषद् के उन मंत्रियों को इस्तीफा देने को मजबूर किया जो पाकिस्तान-समर्थक लॉबी से जुड़े थे, यानी उन्होंने महल के भीतर बैठे षड्यंत्रकारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया।​ इसके बाद उन्होंने उन चुनिंदा व्यक्तियों पर, जो जनता को भड़काने और पाकिस्तान समर्थक माहौल बनाने में सक्रिय थे, त्रिपुरा में प्रवेश और उनके राजनीतिक गतिविधियों पर रोक लगाई। 

दिल्ली तक गूंजी आवाज : सरदार पटेल को सीधा संदेश

रानी जानती थीं कि यह लड़ाई केवल त्रिपुरा की सीमाओं के भीतर नहीं जीती जा सकती, इसलिए उन्होंने अगला कदम उठाया, केंद्र को सीधे भरोसे में लेने का। बंगाल कांग्रेस कमेटी के माध्यम से उन्होंने सरदार वल्लभभाई पटेल तक स्पष्ट संदेश भिजवाया कि त्रिपुरा में पाकिस्तान समर्थक ताकतें सक्रिय हैं, महल के भीतर से भी दबाव है, और यदि तुरंत ध्यान नहीं दिया गया, तो यह रियासत भारत से अलग दिशा में खिसक सकती है।​ 

सरदार पटेल ने इस सूचना को गंभीरता से लिया, असम के गवर्नर अकबर हैदरी को त्रिपुरा की स्थिति पर करीबी नजर रखने के निर्देश दिए गए और सुरक्षा कारणों से कुछ समय के लिए रानी को शिलॉन्ग में भी रखा गया, लेकिन उनके रुख में कोई बदलाव नहीं आया। अंततः लगातार राजनीतिक संवाद, जनता की इच्छा और रानी की स्पष्ट लाइन के चलते 9 सितंबर 1949 को मर्जर एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर हुए और 15 अक्टूबर 1949 को त्रिपुरा आधिकारिक रूप से भारत का हिस्सा बन गया, ठीक उस षड्यंत्र के उलट, जो उसे पाकिस्तान की ओर धकेलने के लिए रची गई थी।​

कंचनप्रभा देवी की कहानी यह बताती है कि इतिहास के बड़े नक्शे पर खींची गई सीमाओं के पीछे अक्सर एक अकेला, मुश्किल फैसला खड़ा होता है, जिसे लेने की हिम्मत हर किसी में नहीं होती। एक युवा विधवा, नाबालिग बेटे की मां, सीमावर्ती रियासत की रीजेंट और अंदर-बाहर दोनों तरफ से घिरा नेतृत्व, यह सब मिलकर उन्हें बहुत कमजोर बना सकते थे, लेकिन उन्होंने सत्ता को पकड़ने के लिए नहीं, राज्य के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए जोखिम उठाया, मंत्रियों को हटाया, षड्यंत्रकारियों को रोका और केंद्र से संवाद का रास्ता चुना।​ 

आज त्रिपुरा भारत के नक्शे का अभिन्न हिस्सा है, तो उसमें सैनिक ताकत, कूटनीति और संविधान के साथ-साथ, एक रानी की राजनीतिक समझ, साहस और समय पर लिया गया फैसला भी शामिल है, जिसे अक्सर मुख्यधारा इतिहास में उतनी जगह नहीं मिलती।