क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक छोटी बच्ची अपनी मां का चेहरा पहली बार किसी पुरानी तस्वीर में देखती है और उसे पता चलता है कि वह कभी अपनी मां को जान भी नहीं पाई? वैलेरी वेनबर्ग का जीवन ऐसी ही एक दर्दनाक सच्चाई है, जहां बचपन परिवार से छीन लिया गया, भाई-बहन संस्थानों में मर गए, और फिर भी वह जीवित रहीं। यह कहानी ऑस्ट्रेलिया के स्टोलन जेनरेशंस की उस क्रूर नीति की गवाही है जिसने हजारों स्वदेशी बच्चों को उनकी जड़ों से उखाड़ फेंका।
ऑस्ट्रेलिया की “स्टोलन जेनरेशंस” नीति एक क्रूर सरकारी व्यवस्था थी, जिसमें Aboriginal (मूल निवासी) और Torres Strait Islander (टोरेस स्ट्रेट द्वीप वासी) जोकि ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड और पापुआ न्यू गिनी के बीच स्थित द्वीपों के मूल निवासी, एक विशिष्ट मेलनेशियन सांस्कृतिक समूह है। इनके बच्चों को उनके परिवारों, संस्कृति और जड़ों से जबरन अलग कर लिया जाता था। जिन्हें “सभ्य” बनाने और श्वेत समाज में assimilation (समावेशन) के नाम पर संस्थानों, मिशनों या श्वेत परिवारों में रखा जाता था।यह नीति 1910 से 1970 तक चली। विभिन्न राज्य और संघीय कानूनों (जैसे Aborigines Protection Acts) के तहत पुलिस, वेलफेयर अधिकारी और चर्च मिशन बच्चों को छीनते थे।अनुमानित 10% से 33% स्वदेशी बच्चे प्रभावित हुए, जिससे पीढ़ियों में गहरा आघात, सांस्कृतिक नुकसान और ट्रॉमा हुआ।
अब आइए, जानते हैं कि वैलेरी के साथ यह सब कैसे हुआ। बचपन से लेकर आज तक का वह सफर, जो दर्द और संघर्ष से भरा है।
वैलेरी वेनबर्ग की उस समय उम्र थी लगभग 2-3 वर्ष की। ऑस्ट्रेलिया की सरकारी नीतियों के अनुसार, जो एबोरिजिनल (मूल निवासी) बच्चों को उनकी संस्कृति से दूर करके ‘सभ्य’ बनाने का दावा करती थीं, वैलेरी और उनके भाई-बहनों को जबरन उनकी मां से अलग कर लिया गया। यह 1940 के दशक की बात है, जब स्टोलन जेनरेशंस नीति पूरे जोर पर थी।

स्टोलन जेनरेशन से बची वैलेरी वेनबर्ग (Photo Credit: Sarah Collard/The Guardian)
वैलेरी वेनबर्ग को बॉमाडेरी इन्फैंट्स होम (Bomaderry Infants Home) भेज दिया गया, जो न्यू साउथ वेल्स में था। उनके भाई जॉनी को किंचेला बॉय्ज होम (Kinchela Boys Home) भेजा गया और सबसे छोटी बहन डोरोथी भी बॉमाडेरी में ही थी। अलगाव का यह फैसला राज्य के अधिकारियों ने लिया, क्योंकि वे मानते थे कि स्वदेशी बच्चे अपने मां-बाप के साथ रहकर ‘उन्नति’ नहीं कर सकते। वैलेरी को कभी अपनी मां का चेहरा याद नहीं रहा, सिर्फ एक फोटो में देखा, जो उनके बड़े भाई के बिस्तर के नीचे छिपी थी।
जब वैलेरी 9 साल की हुईं, तो उन्हें बॉमाडेरी से ट्रांसफर करके कूटामुंड्रा एबोरिजिनल गर्ल्स होम (Cootamundra Aboriginal Girls Home) भेज दिया गया। यह भी न्यू साउथ वेल्स में ही था, जहां लड़कियों को घरेलू नौकरानी बनाने की ट्रेनिंग दी जाती थी। वैलेरी ने वहां अन्य लड़कियों से गहरी दोस्ती की, लेकिन यह जगह भी एक तरह की कैद थी। उन्हें सिखाया जाता था कि आसपास के फार्म्स पर काम करने के लिए कैसे तैयार हों। इस दौरान वैलेरी को पता चला कि उनके भाई-बहन जॉनी और डोरोथी की मौत हो चुकी है। किंचेला और बॉमाडेरी की कठोर परिस्थितियां, बीमारियां और उपेक्षा ने उनकी जान ले ली। वैलेरी अकेली रह गईं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। यह ट्रांसफर उनके जीवन का दूसरा बड़ा झटका था, जहां बचपन की मासूमियत पूरी तरह छिन गई।
टीनएज में पहुंचते ही वैलेरी को कूटामुंड्रा से निकालकर एक फार्म पर काम करने भेज दिया गया। यह न्यू साउथ वेल्स के ग्रामीण इलाके में था। वहां फर्म के मालिक ने उनका शारीरिक शोषण किया, उन्हें बलात्कार का शिकार बनाया और बड़ी ही निर्दयता से पिटाई भी की। वैलेरी चुप रहीं, क्योंकि शिकायत करने का कोई रास्ता नहीं था। बाद में पुलिस ने उन्हें वहां से निकाला, लेकिन कूटामुंड्रा वापस भेजने की बजाय पैरामाटा गर्ल्स होम (Parramatta Girls Home) भेज दिया गया। यह जगह और भी कठोर थी, जहां अनुशासन के नाम पर दंड पर दंड दिए जाते थे। वैलेरी ने इन सबके बावजूद जीवित रहने की ताकत दिखाई। यह दौर उनके जीवन का सबसे अंधेरा समय था, जहां शारीरिक और मानसिक यातनाएं रोज की बात थीं।
सबसे मार्मिक पल 13 फरवरी 2008 का था, जब वैलेरी कैनबरा में फेडरल पार्लियामेंट में मौजूद थीं। तत्कालीन प्रधानमंत्री केविन रुड ने स्टोलन जेनरेशंस से देश की ओर से राष्ट्रीय माफी (National Apology) मांगी। रुड के शब्द ‘I apologise on behalf of the nation’ सुनकर वैलेरी का शरीर और दिल कांप उठा। यह माफी उनके लिए सालों के दर्द की मान्यता थी। वैलेरी ने कहा कि यह उनके पूरे शरीर में उतर गया। यह वह पल था, जब वैलेरी को लगा कि उनका दर्द अंत में सुना ही गया।
वैलेरी वेनबर्ग की कहानी स्टोलन जेनरेशंस के उस अन्याय की जीती-जागती मिसाल है, जो आज भी ऑस्ट्रेलिया के इतिहास में एक काला धब्बा है। फरवरी 2026 में, अपोलॉजी की 18वीं वर्षगांठ पर, वैलेरी कैनबरा में 100 अन्य बच गए लोगों के साथ इकट्ठा हुईं। हीलिंग फाउंडेशन के कार्यक्रम में उन्होंने अपनी कहानी साझा की। यह कहानी हमें सिखाती है कि सरकारी नीतियां कितना गहरा आघात पहुंचा सकती हैं, परिवार बिखर जाते हैं, बचपन छिन जाता है और पीढ़ियां प्रभावित होती हैं।
वैलेरी की जिंदगी बताती है कि ताकत और जीवटता से इंसान कितना कुछ सह सकता है। आज, जब दुनिया स्वदेशी अधिकारों की बात करती है, वैलेरी जैसे उत्तरजीवियों की आवाज हमें याद दिलाती है कि माफी सिर्फ शुरुआत है, असली हीलिंग और न्याय अभी बाकी है। उनकी कहानी न केवल दर्द की है, बल्कि उम्मीद की भी कि टूटे हुए लोग भी खड़े हो सकते हैं और दुनिया को अपनी पीड़ा बता सकते हैं।

