RIN Mutiny 1946 : कैसे एक नौसैनिक ने ब्रिटिश सत्ता को दी थी चुनौती। जानिए, बी.सी. दत्ता की कहानी

Balai Chandra Dutt

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वर्ष 1946 के फरवरी महीने में रॉयल इंडियन नेवी (Royal Indian Navy- RIN) के सैकड़ों नाविक जिन्हें रेटिंग्स कहा जाता था, ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आवाज बुलंद की थी। इस आग की पहली चिंगारी एक 23 वर्षीय युवा सैनिक ने भड़काई थी। उनका नाम था, बलाई चंद्र दत्ता (बी.सी. दत्ता)। वह नौसेना के प्रशिक्षण केंद्र एचएमआईएस तलवार (HMIS Talwar) में लीडिंग टेलीग्राफिस्ट (सीनियर टेलीग्राफ ऑपरेटर) थे।

फरवरी 1946 के आरम्भ में दत्ता जोकि नैवी के प्रशिक्षण केंद्र एचएमआईएस तलवार (HMIS Talwar) बाम्बे (अब मुंबई) में लीडिंग टेलीग्राफिस्ट (सीनियर टेलीग्राफ ऑपरेटर) के पद पर तैनात थे। उन्होंने जहाज की दीवारों पर राष्ट्रवादी नारे लिखे।

लेकिन पहरेदारी कर रहे संतरियों ने उन्हें पकड़ लिया। बी.सी. दत्ता के हाथों पर गोंद लगा हुआ और जेब में बोतल और पर्चे मिले। एचएमआईएस तलवार के कमांडर फ्रेडेरिक किंग (Commander Frederick King) ने इन नारों पर आपत्ति जाहिर की और जांच आरम्भ किया। ऐसे में जब दत्ता के लॉकर की तलाशी ली गई, तो एक डायरी, राष्ट्रवादी किताबें, आजाद हिन्द आर्मी रिलीफ फंड की रसीदें मिली। कमांडर किंग ने उन्हें एकांत कारावास (Solitary Confinement) में डाल दिया। उनकी गिरफ्तारी की खबर पूरे जहाज पर फैल गई और रेटिंग्स का गुस्सा भड़क उठा।

गिरफ्तारी के बाद 18 फरवरी को रेटिंग्स की हंगर स्ट्राइक शुरू हुई। दत्ता की गिरफ्तारी और कमांडर किंग की गालियां (‘sons of bitches’, ‘sons of coolies’) इस स्ट्राइक के मुख्य कारण बने। इसके अलावा और भी कारण थे जिनमें खराब खाना, रहने की खराब स्थिति, नस्लीय भेदभाव और अपमान, कम वेतन और अन्य सुविधा आदि शामिल थे।

विद्रोह तेजी से 78 जहाजों और 20 तटीय स्थानों तक फैल गया। लेकिन 23 फरवरी को सरदार पटेल और अन्य बड़े नेताओं के इस आश्वासन पर कि ‘कोई उत्पीड़न नहीं’ होगा, नेवी स्ट्राइक कमेटी ने सरेंडर कर दिया।

सरेंडर के महज कुछ घंटों बाद दत्ता को ‘Disgracefully discharged from His Majesty’s service’ का टैग देकर बर्खास्त कर दिया गया। उन्हें मुलुंड डिटेंशन कैंप में भेज दिया गया, जहां हालात जेल से भी बदतर थे। इसके अलावा 476 रेटिंग्स को भी बर्खास्त किया गया।

RIN Mutiny Commission of Enquiry की सुनवाई कराची के मुस्लिम हॉस्टल में 27 मई से 1 जून तक चली। बी.सी. दत्ता को मुख्य गवाह बनाकर बुलाया गया। कमीशन के सामने उन्होंने अपना पक्ष उन्होंने पूरी ईमानदारी के साथ रखा। उन्होंने बताया कि किस तरह से उनके साथ भेदभाव किया जाता है। जून 1946 की गवाही ने सच्चाई तो उजागर कर दी, लेकिन न्याय नहीं मिला। 

कमीशन की रिपोर्ट का सारांश 20 जनवरी 1947 को गजट में आया, लेकिन पूर्ण 600 पृष्ठों की रिपोर्ट आज भी पूरी तरह सार्वजनिक नहीं है। आज 8 दशक से भी ज्यादा समय के बाद भी यह टीस आज भी जिंदा है। 

भारत और पाकिस्तान के स्वतंत्र होने के बाद नौसेना का भी बंटवारा किया गया, लेकिन इस प्रक्रिया में उच्च पदों पर ब्रिटिश अधिकारियों का वर्चस्व बना रहा। भारतीय नौसेना की कमान वाइस एडमिरल विलियम एडवर्ड पैरी के हाथों में रही। जिन नाविकों को पहले सेवा से हटाया गया था, उन्हें किसी प्रकार की माफी या पुनर्विचार का लाभ नहीं मिला। हालांकि सरदार पटेल सहित कई नेताओं ने आश्वासन दिए थे, परंतु वे जमीन पर पूरे होते नजर नहीं आए। और तो और, इस मामले में जब रेटिंग्स को राजनैतिक रूप से समर्थन की जरूरत थी, तब महात्मा गांधी ने इस स्ट्राइक को हिंसक कहकर निंदा की थी

सन् 1971 में बी.सी. दत्ता ने अपनी किताब Mutiny of the Innocents में लिखा, “हम RIN म्यूटिनी के रेटिंग्स एक असुविधाजनक राष्ट्रीय स्मृति बन गए हैं।” 

साभार : indianhistorycollective.com

सन् 1923 में जन्मे बी.सी. दत्ता की कहानी एक युवा टेलीग्राफिस्ट के साथ हजारों रेटिंग्स की है, जिन्होंने अपनी जान, नौकरी और भविष्य दांव पर लगाकर ब्रिटिश साम्राज्य को सीधी चुनौती दी। जून 1946 में कमीशन की सुनवाई में दत्ता ने साबित किया था कि आरआईएन म्यूटिनी स्वतंत्रता की लड़ाई का एक महत्वपूर्ण अध्याय था। आज 80 वर्ष बाद भी बी.सी. दत्ता और उनके जैसे साहसी नाविकों की कहानी हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता के लिए संघर्ष में इन साधारण सैनिकों का भी बड़ा योगदान रहा है। इन यादों को भूलना हमारे लिए खतरनाक होगा, क्योंकि इतिहास को सही से याद रखना ही आने वाली पीढ़ियों को सच्ची प्रेरणा दे सकता है।