नाथुला का हीरो : जब कैप्टन डागर चीनी सेना पर बने कहर, पलट दी थी बाजी!

Captain Prithvi Singh Dagar

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11 सितंबर 1967 को भारत-चीन सीमा पर पूर्वी सिक्किम में 4310 मीटर ऊंचाई पर स्थित नाथुला पास (नाथुला दर्रा) पर एक सामान्य दिन अचानक ही युद्ध में बदल गया। सीमा पर कांटेदार तार लगाते समय चीनी सैनिकों ने भारतीय जवानों पर अचानक भारी गोलीबारी शुरू कर दी। इस दौरान 25 वर्षीय कैप्टन पृथ्वी सिंह डागर ने घायल होने के बावजूद दुश्मन पर सीधा हमला कर दिया। 

वर्ष 1967 में कैप्टन पृथ्वी सिंह डागर को नाथुला पास की ऊंचाई पर तैनाती मिली। उस समय भारत-चीन सीमा पर तनाव बढ़ रहा था। 1962 के युद्ध के बाद भारतीय सेना सीमा पर मजबूत स्थिति बनाना चाहती थी। कैप्टन डागर को वायर-लेइंग पार्टी का ऑफिसर इन-चार्ज बनाया गया। उनका काम था, दक्षिण शोल्डर क्षेत्र में कांटेदार तार की बाड़ लगाना ताकि दोनों देशों के सैनिकों के बीच स्पष्ट विभाजन हो सके और रोजमर्रा की छोटी-छोटी झड़पें रुके।

चीनी सैनिक इस बाड़ लगाने का विरोध कर रहे थे। अगस्त 1967 से तनाव बढ़ता गया और 7 सितंबर को छोटी झड़प भी हो चुकी थी। फिर भी भारतीय कमान ने काम जारी रखने का फैसला किया। 11 सितंबर 1967 की सुबह कैप्टन डागर अपने जवानों के साथ काम पर लग गए। इंजीनियर और जवान खुली जगह में बाड़ लगा रहे थे। शुरू में चीनी सैनिकों ने हाथापाई की कोशिश की, लेकिन कैप्टन डागर और उनके सिपाही अडिग रहे। काम जारी रहा। तनाव साफ महसूस हो रहा था। दोनों तरफ के सैनिक महज 20  से 30 मीटर की दूरी पर थे।

अचानक चीनी सेना से सीटी बजने की आवाज आई और उसी के साथ उत्तर शोल्डर से मशीन गन और तोपों से भारी फायरिंग शुरू हो गई। खुली जगह में खड़े भारतीय जवान बिना किसी कवर के सीधे गोलीबारी का शिकार हो रहे थे। 

अब भारत की ओर से मोर्चा सम्भाला गया। हालांकि शुरुआती मिनटों में ही कई जवान बलिदान और घायल हो चुके थे। कैप्टन डागर के हाथ में एक गोली लगी। खून बहने लगा, दर्द असहनीय था। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने जवाबी फायरिंग शुरू कर दी। 

कैप्टन डागर ने अपनी टुकड़ी के सैनिकों के साथ चीनी सेना पर जोरदार हमला बोला और लगभग  50 चीनी सैनिकों को स्वयं मार गिराया। इस दौरान उन्हें कई गोलियां लगीं और वे बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इस संघर्ष में भारत के मुट्ठी भर सैनिकों ने 300 चीनी सैनिकों को ढेर कर दिया। मात्र 25 साल की उम्र में कैप्टन डागर ने देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया। 

इसी लड़ाई में दूसरे वीरों ने भी अद्वितीय साहस दिखाया और चीनी सैनिकों को मुंहतोड़ जवाब दिया। आज भी नाथुला दर्रे में कैप्टन डागर के नाम का डंका बजता है। उनके नाम से डागर द्वार बना हुआ है, जहां उनकी फोटो उनके बलिदान की अमर गाथा का जीता जागता सबूत है।

(Photo Credit: Honorpoint)

1 जून 1942 को दिल्ली के नजफगढ़ के पास मलिकपुर गांव में जन्मे कैप्टन पृथ्वी सिंह डागर की यह कहानी एक जवान अफसर की व्यक्तिगत बहादुरी भर नहीं है, बल्कि 1962 में चीन के धोखे का शिकार होने के बाद भारतीय सेना के वापसी और मनोबल की मिसाल है। 

कैप्टन पृथ्वी सिंह डागर को उनकी असाधारण लीडरशिप और बलिदान के लिए वीर चक्र (मरणोपरांत) प्रदान किया गया। बता दें कि नाथुला दर्रा 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद बंद कर दिया गया था और फिर 44 साल बाद 6 जुलाई 2006 को इसे व्यापार के लिए फिर से खोला गया था।