महाराजा रणजीत सिंह ने बिखरी हुई मिसलों (सवेच्छा से बने स्वतंत्र सिख सैन्य संघ या समूह) को जोड़कर सतलुज से पेशावर तक एक शक्तिशाली साम्राज्य खड़ा किया, जिसकी नींव लाहौर की ऐतिहासिक जीत से पड़ी। लेकिन इस साम्राज्य के पीछे सिख इतिहास की महान योद्धा और रणजीत सिंह की सास रानी सदा कौर की राजनीतिक दूरदर्शिता, कूटनीति और युद्ध कौशल की बड़ी भूमिका थी। यह कहानी केवल लाहौर विजय की नहीं, बल्कि एक सास और दामाद के उस अटूट विश्वास की है जिसने तलवार और बुद्धि के बल पर इतिहास बदल दिया।
18वीं शताब्दी में पंजाब राख और बारूद की गंध से भरा था। औरंगजेब की मौत के बाद 1707 ई. में मुगल साम्राज्य टूटना शुरु हो गया और कई दशकों तक अफगान शासक पंजाब पर लगातार हमले करते रहे। 1793 ई. से 1798 ई. के बीच अफ़ग़ान शासक शाह जमान के निरन्तर आक्रमणों के फलस्वरूप पंजाब में इतनी अराजकता फैल गई।गांव जलते, शहर लूटे जाते और सत्ता हर दिन बदलती दिखाई देती थी। 1798 में लाहौर पर अफगानों का कब्जा हो चुका था । ऐसे समय में सिख मिसलें पंजाब की ढाल बनकर उभरी थीं। बारह बड़ी मिसलें थीं- हर मिसल अपने इलाके की मालिक थी।
दरअसल मिसलें (Misls) ‘सवेच्छा से बने स्वतंत्र सिख सैन्य संघ’ या समूह थे। 18वीं शताब्दी में मुगलों और अफगान आक्रमणकारियों से सिख धर्म और पंजाब की रक्षा करने के लिए 12 मिसलों का गठन किया गया था। इनका काम एकजुट होकर बाहरी दुश्मनों से सिख संप्रभुता (Sovereignty) को बचाए रखना था, जिसने आगे चलकर महाराजा रणजीत सिंह के महान सिख साम्राज्य की नींव रखी। सुकरचकिया मिसल 18वीं शताब्दी के पंजाब में उभरी बारह सिख मिसलों में से सबसे प्रभावशाली और शक्तिशाली मिसल थी।
इनमें से कन्हैया मिसल (States) की एक महिला सदा कौर धीरे-धीरे पूरे पंजाब की राजनीति का केंद्र बन रही थीं। सदा कौर केवल किसी सरदार की पत्नी नहीं थीं। उनके भीतर एक सेनापति की दृष्टि और एक शासक का धैर्य था। 1785 जब उनके पति गुरबख्श सिंह युद्ध में शहीद हुए, तब बहुतों को लगा कि कन्हैया मिसल अब टूट जाएगी। लेकिन अगले ही दिन लोगों ने देखा कि एक महिला घोड़े पर सवार होकर सेना के सामने खड़ी है। उसने पर्दे में रहने से इनकार कर दिया था। उसने तलवार उठा ली थी। सदा कौर ने कन्हैया मिसल की कमान संभाली और 8000 घुड़सवारों की सेना का नेतृत्व करना शुरू किया। पंजाब के मैदानों में अब लोग केवल उनकी सुंदरता की नहीं, बल्कि उनकी रणनीति की चर्चा करने लगे थे।
उधर सुकरचकिया मिसल में एक दुबला-पतला लड़का तेजी से बड़ा हो रहा था। चेहरे पर चेचक के निशान थे, एक आंख की रोशनी जा चुकी थी, लेकिन उसके भीतर आग थी। वह था, रणजीत सिंह। सदा कौर ने बहुत जल्दी पहचान लिया था कि यह लड़का बाकी सरदारों जैसा नहीं है। उसमें केवल लड़ने की शक्ति नहीं, बल्कि पंजाब को जोड़ने का सपना भी था। यही कारण था कि उन्होंने साल 1785 में, अपनी इकलौती बेटी मेहताब कौर का विवाह रणजीत सिंह से तय किया और साल 1786 में विवाह करवा दिया। यह केवल रिश्ता नहीं था, यह पंजाब के भविष्य की नींव थी।
रणजीत सिंह भी सदा कौर का बेहद सम्मान करते थे। वह उन्हें केवल सास नहीं, बल्कि ‘माता जी’ और अपना मार्गदर्शक मानते थे। युद्ध हो या राजनीति, रणजीत सिंह अक्सर सदा कौर की सलाह के बिना कोई बड़ा कदम नहीं उठाते थे। 1792 में जब रणजीत सिंह के पिता महासिंह की मृत्यु हुई, तब रणजीत सिंह अभी केवल 12 साल के ही थे। ऐसे कठिन समय में सदा कौर उनके साथ चट्टान बनकर खड़ी रहीं। उन्होंने उन्हें केवल सेना चलाना नहीं सिखाया, बल्कि यह भी सिखाया कि पंजाब को जीतने से पहले लोगों का विश्वास जीतना जरूरी है।
फिर आया जुलाई 1799 का वो साल, जिसने इतिहास बदल दिया। लाहौर उस समय सरदार चेत सिंह के कमजोर हाथों में था। मिसलों के सरदारों के आपसी संघर्षों ने शहर को असुरक्षित बना दिया था। जनता युद्धों से थक चुकी थी। इसी बीच काबुल के शाह जमान की नजर भी लाहौर पर थी। लेकिन वह जानता था कि लाहौर को संभालना आसान नहीं।
दूसरी ओर रणजीत सिंह के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी सेना की कमी। रणजीत सिंह के पास महज़ 3000 ही सैनिक थे। लाहौर की तरफ बढ़ना, मानो मौत को दावत देना था। उस रात रणजीत सिंह अमृतसर के पास डेरा डाले बैठे थे। चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी। तभी सदा कौर उनके सामने आकर बैठीं। उन्होंने शांत स्वर में पूछा, “कितनी फौज है हमारे पास?”
रणजीत सिंह ने धीमे स्वर में कहा, “सिर्फ 3000। हमारे पास सेना की कमी है।“
तब सदा कौर मुस्कुराईं, “मेरे 2000 घुड़सवार भी जोड़ लो। तो हमारे पास कुल 5000 की सेना काफी हो जाएगी। दोनों मिसलों और कुछ अन्य छोटे समूहों को मिलाकर हमारे पास कुल 25,000 सैनिक हो जाएंगे। इतने काफी हैं, अगर युद्ध तलवार से नहीं, बुद्धि से लड़ा जाए।”
रणजीत सिंह चुप रहे। उन्हें डर था कि जैसे ही सेना आगे बढ़ेगी, दुश्मन चारों तरफ से हमला कर देगा। लेकिन सदा कौर की आंखों में डर नहीं था। उन्होंने कहा, “हम सीधे लाहौर नहीं जाएंगे। पहले अमृतसर चलेंगे। सबको कहो कि हम केवल पवित्र सरोवर में स्नान करने जा रहे हैं।”
और यही हुआ। पूरे पंजाब में खबर फैल गई कि रणजीत सिंह और सदा कौर अमृतसर स्नान करने पहुंचे हैं। दुश्मन निश्चिंत हो गया। लेकिन उसी रात देर तक सदा कौर ने सेनापतियों के साथ योजना बनाई और अंधेरे में सिख सेना लाहौर की ओर बढ़ चली।
6 जुलाई 1799 सुबह जब लाहौर के बाहर घोड़ों की टापें गूंजीं, तब दुश्मन संभल भी नहीं पाया। 25000 सैनिकों की एक मजबूत सेना के साथ रणजीत सिंह 7 जुलाई तक पूरे लाहौर शहर को घेर लिया। सदा कौर ने दिल्ली गेट पर हमला किया, जबकि रणजीत सिंह लाहौर की दीवारों को तोपों से ध्वस्त कर दिया।
शहर की जनता पहले ही रणजीत सिंह के पक्ष में थी। लाहौर के कई दरवाजे बिना संघर्ष के खुल गए। रणजीत सिंह लोहारी दरवाजे की ओर बढ़े, जबकि सदा कौर ने दिल्ली दरवाजे से सेना की कमान संभाली। दोनों की चाल इतनी सुनियोजित थी कि विरोधी घबराकर भागने लगे।
लेकिन असली चुनौती अभी बाकी थी, यानी चेत सिंह का लाहौर किला। किले के भीतर अभी भी प्रतिरोध की संभावना थी। सैनिक हमला करने को तैयार थे, लेकिन सदा कौर जानती थीं कि यदि युद्ध छिड़ा, तो लाहौर खून से भर जाएगा।
तभी उन्होंने ऐसा कदम उठाया, जिसने सभी को स्तब्ध कर दिया। वह अकेली किले के भीतर चली गईं। न कोई हथियार न कोई सैनिक। दरबार में बैठे चेत सिंह ने भी शायद ऐसी निडर महिला पहले कभी नहीं देखी थी। सदा कौर ने शांत स्वर में कहा, “लाहौर अब बदल चुका है। जनता रणजीत सिंह को चाहती है। यदि तुमने युद्ध चुना, तो मौत निश्चित है। लेकिन यदि किला छोड़ दोगे, तो तुम्हारी जागीरें तुम्हारे पास रहेंगी।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। दो घंटे बाद छेत सिंह ने किले की चाबियां रणजीत सिंह के हवाले कर दीं। उस दिन लाहौर बिना बड़े रक्तपात के जीत लिया गया।
जब रणजीत सिंह लाहौर में दाखिल हुए थे, तो लोग उन्हें ‘पंजाब का शेर’ कह रहे थे। लेकिन उस शेर के पीछे एक ऐसी महिला खड़ी थीं, जिसकी बुद्धि ने रास्ता बनाया था। रणजीत सिंह ने कभी सदा कौर के योगदान को कम नहीं आंका। वह जानते थे कि लाहौर की विजय केवल तलवार की जीत नहीं थी, यह रणनीति, धैर्य और विश्वास की जीत थी।
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और उसी दिन पंजाब के भविष्य ने नया रूप लेना शुरू किया। 1801 तक रणजीत सिंह को अपनी मिसलों में सत्ता को सुदृढ़ कर लिया था और 11 अप्रैल 1801 को उन्हें सिख साम्राज्य का प्रथम महाराजा घोषित किया गया।
रानी सदा कौर केवल एक सास नहीं थीं। वह रणजीत सिंह की राजनीतिक गुरु, युद्ध सलाहकार और सबसे बड़ी समर्थक थीं। इतिहास अक्सर सिंहासन पर बैठे राजा को याद रखता है लेकिन कभी-कभी साम्राज्य की असली नींव उस महिला के हाथों से रखी जाती है, जो परदे के पीछे खड़ी होकर पूरे इतिहास की दिशा बदल देती है। और पंजाब के इतिहास में वह नाम हमेशा रहेगा-रानी सदा कौर।

