The Battle of Colachel: हिंद महासागर की उफनती लहरों पर एक ऐसी कहानी तैरती, है जिसे इतिहास के पन्नों में दबा दिया गया। यह उस हिंदू सम्राट की सच्ची वीरगाथा है, जिसने 18वीं सदी के उस दौर में, जब विदेशी सेनाओं को अजेय माना जाता था, तब यूरोप की सबसे शक्तिशाली समुद्री सेना को घुटनों पर ला दिया था।
यह कहानी है त्रावणकोर के महाराजा मार्तंड वर्मा की, जिन्होंने साल 1741 में हुई कोलाचेल की लड़ाई में डच ईस्ट इंडिया कंपनी को ऐसी शिकस्त दी थी कि जिसकी गूंज पूरे यूरोप में सुनाई दी। साथ ही भारत पर कब्जा करने का डचों का सपना हमेशा-हमेशा के लिए टूट गया। लेकिन दुर्भाग्य से विदेशी मानसिकता से प्रभावित इतिहासकारों ने महाराजा मार्तंड वर्मा की इस विजय को इतिहास में वह स्थान नहीं दिया, जो मिलना चाहिए था।
16वीं सदी में डच ईस्ट इंडिया कंपनी दुनिया की सबसे अमीर और ताकतवर व्यापारिक संस्था मानी जाती थी। जिसकी अपनी नौसेना भी थी, जो पुर्तगाली और ब्रिटिश नौसेना से भी अधिक ताकतवर थी। डच नौसेना के पास, उस दौर के सबसे आधुनिक हथियार थे। मसालों के व्यापार पर डच ईस्ट इंडिया कंपनी का एकाधिकार था। इसलिए केरल की काली मिर्च उसके लिए सोने से भी अधिक मूल्यवान थी। 1740 के दशक में डचों ने समुद्री व्यापार के दम पर एशिया में अपनी विशाल शक्ति स्थापित कर ली थी।
वहीं दूसरी ओर त्रावणकोर एक उभरता हुआ राज्य था, जिसके शासक महाराजा मार्तंड वर्मा अपने राज्य को एकजुट और शक्तिशाली बनाने में लगे थे। उन्होंने अत्तिंगल, क्विलोन और कायमुकुलम जैसी रियासतों को अपने अधीन कर लिया था।

कोलाचेल का युद्ध और महाराजा मार्तंड वर्मा का सांकेतिक चित्र, इमेज सोर्स-TFI Post
उस दौर में महाराजा मार्तंड वर्मा की बढ़ती शक्ति से डच गवर्नर गुस्ताफ विल्लेम वान इम्होफ्फ बुरी तरह से बौखला गया और इसी बौखलाहट में वह मार्तंड वर्मा को धमकी दे बैठा। लेकिन महाराजा मार्तंड वर्मा पर इस धमकी का कोई प्रभाव नहीं पड़ा बल्कि उन्होंने डच गवर्नर से स्पष्ट शब्दों में कहा, ’मैं तुम्हारी किसी भी डच सेना को परास्त कर सकता हूं और आवश्यकता पड़ी, तो यूरोप पर आक्रमण करने का भी विचार कर सकता हूं।’ महाराजा मार्तंड वर्मा के यह केवल शब्द नहीं थे, बल्कि आने वाले इतिहास की चेतावनी थी।
डचों को अब महाराजा मार्तंड वर्मा का विजय अभियान एक चुनौती लगने लगा था। इसी बीच डच गवर्नर इम्होफ्फ ने पराजित राजाओं के साथ मिलकर कुटनीतिक चाल चली। महाराजा मार्तण्ड वर्मा डचों की यह चाल समझ गए थे। उन्होंने अपनी सेना भेजकर मालाबार स्थित डचों के सभी किलों पर कब्जा कर लिया. जिससे गुस्साए डच गवर्नर इम्होफ्फ ने अपनी नौसेना को श्रीलंका से बुला लिया और त्रावणकोर पर हमला करने का आदेश दिया।
26 नवंबर 1740 को डच ईस्ट इंडिया कंपनी की नौसेना आधुनिक तोपों और बंदूकों से लैस सात बड़े युद्धपोतों के साथ कोलाचेल के तट पर पहुंची और समुद्र से लगातार त्रावणकोर पर बमबारी शुरू कर दी। देखते ही देखते नगर में आग और धुएं का भयावह दृश्य फैल गया। डचों को विश्वास था कि पारंपरिक हथियारों से लड़ने वाली त्रावणकोर की सेना उनके सामने अधिक देर टिक नहीं पाएगी।
लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी भूल थी। वह यह नहीं जानते थे कि उनका सामना किसी साधारण राजा से नहीं, बल्कि एक वीर और कुशल रणनीतिकार योद्धा से भी है। मार्तंड वर्मा ने अपनी नीति से युद्ध की दिशा ही बदल दी। उन्होंने नारियल के पेड़ों को काटकर बैलगाड़ियों पर इस तरह रखवाया कि जिससे वह विशाल तोपों की तरह दिखाई दें। यह दृश्य देखकर डच सेना भ्रमित हो गई और आगे बढ़ने का साहस नहीं जुटा पाई।
इसी बीच महाराजा मार्तंड वर्मा अपने दस हजार सैनिकों के साथ डच नौसेना को चारों ओर से घेर लिया। उन्हें स्थानीय मुक्कुवर समुदाय के मछुआरों का भी साथ मिला। जिसके चलते डच नौसेना समुद्र में ही फंस गई और उनकी रसद सामग्री आपूर्ति बाधित हो गई। समुद्र में फंसी डच नौसेना को श्रीलंका और कोच्चि कहीं से भी कोई सहायता न मिल सकी। जिसके चलते विदेशी सेना धीरे-धीरे भय और भूख की गिरफ्त में आने लगी थी।
इसके बाद वह निर्णायक क्षण आया, जिसने इतिहास बदल दिया। त्रावणकोर की सेना ने डचों के हथियारों के गोदाम पर भीषण हमला कर दिया। बारूद के भंडार में विस्फोट हुआ और देखते ही देखते आग की लपटों ने डच शिविर को घेर लिया। कई दिनों तक भयंकर संघर्ष चलता रहा। अंततः 31 जुलाई 1741 को डच सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया। त्रावणकोर की सेना ने हजारों डच सैनिकों को मार गिराया साथ ही बड़ी संख्या में सैनिक घायल हुए। 24 सैन्य अधिकारियों सहित कई डच सैनिकों को बंदी बना लिया गया। कुछ सैनिक बंदरगाह से कोचीन की ओर भाग निकले। इस दौरान त्रावणकोर की सेना 389 बंदूकें और कुछ तोपें भी बरामद की। बंदी डच सैनिकों के साथ डच कमांडर यूस्टेशियस दी लेननोय को महाराजा मार्तंड वर्मा के सामने लाया गया। यह वही डच नौसेना के जवान थे, जो समुद्र में अजेय थे, लेकिन वह अब एक भारतीय राजा के सामने पराजित होकर सिर झुकाए खड़े थे।
कोलाचेल की यह विजय केवल एक युद्ध की जीत नहीं थी, बल्कि भारत में विदेशी साम्राज्यवाद के अहंकार पर सबसे बड़ा प्रहार थी। इस हार के बाद भारत में डच शक्ति समाप्त हो गई। महाराजा मार्तंड वर्मा ने विजय के प्रतीक के रूप में कोलाचेल में विजय स्तंभ का निर्माण करवाया। इस प्रकार साहस और वीरता के साथ राज्य चलाते हुए महाराजा अनिझम थिरुनल मार्तंडा वर्मा का निधन 7 जुलाई 1758 को हुआ।
इतिहास भले ही कोलाचेल युद्ध को उतनी प्रमुखता न दे पाया हो, लेकिन समुद्र की लहरें आज भी गवाही देती हैं कि जब साहस, बुद्धिमत्ता और राष्ट्रभक्ति एक साथ खड़े हो जाएं, तब दुनिया की सबसे बड़ी ताकत को भी धूल चटाई जा सकती है।

