पूर्वोत्तर भारत के राज्य मिजोरम में शांति लाने के लिए एक ऐसा समझौता हुआ, जिसे मिजोरम समझौता के नाम से जाना जाता है, लेकिन इस समझौते के पीछे एक ऐसे भारतीय अधिकारी का दिमाग था, जिसके बारे में लोग बहुत कम जानते हैं। इस अधिकारी का नाम था आरडी प्रधान, जो उस समय भारत के गृह सचिव थे। उन्होंने करीब 20 वर्षों से विद्रोह की आग में झुलस रहे मिजोरम राज्य में विद्रोह को शांत कराकर इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया। गृह सचिव आरडी प्रधान की यह केवल प्रशासनिक सफलता नहीं थी, बल्कि विश्वास, संवाद और संवेदनशीलता की भी गाथा थी, जिसने एक पूरे राज्य को हिंसा से निकालकर शांति की राह पर ला खड़ा किया।
और पढ़ेंAuthor: Akansha T
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आदिवासी कुल्हाड़ियां जिन्होंने 21 ब्रिटिश सैनिकों का शिकार किया : महिलाओं के नेतृत्व में संथाल विद्रोह—फूलो-झानो
साम्राज्य हमेशा अपनी सैन्य शक्ति पर गर्व करते हैं, लेकिन एक ऐसी गर्जना थी जिससे साबित हुआ कि आत्म-सम्मान के सामने वह गर्व कितना तुच्छ है।
1855 में, झारखंड के जंगलों में, बिजली की दो कौंधों की तरह दो युवतियां एक ब्रिटिश सैन्य शिविर की ओर लपकीं। वह शिविर अपनी आधुनिक एनफील्ड राइफलों के दम पर खुद को अजेय मानकर इतरा रहा था। वे ऐसी वीरांगनाएं थीं, जो ऐसे आगे बढ़ीं, मानो स्वयं ‘वन-माता’ ने ही कोई उग्र रूप धारण कर लिया हो। उन दोनों के हाथों में पैनी कुल्हाड़ियां थीं और आंखों में ज्वालामुखी दहक रहे थे। भोर होते-होते, 21 ब्रिटिश सैनिकों के सिर उनके धड़ों से अलग हो चुके थे। युद्ध के विश्व इतिहास में पहले कभी न देखी गई यह ‘नरसंहार-लीला’ किसी और ने नहीं, बल्कि सिदो-कानू की बहनों—फूलो मुर्मू और झानो मुर्मू ने रची थी।
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कोहिनूर की चमक से ज्यादा तेज थी उस महाराजा की बुद्धि, जिन्होंने बिना खून-खराबे के इतिहास को अपने नाम कर लिया
भारत के आंध्रा की कोल्लूर की खान से निकला यह जादुई रत्न, यह पौराणिक रत्न, जिसे तब ‘स्यमंतक मणि’ के नाम से जाना जाता था, कभी तेलंगाना के वारंगल के काकतीय मंदिर की देवी की आंख बना, फिर दिल्ली के सुल्तानों के ताज की शान, और आखिरकार लूट का सबसे बड़ा प्रतीक। यह है कोहिनूर हीरा।
सन् 1739 में जब फारस का आक्रमणकारी नादिर शाह ने भारत पर धावा बोला, तो उसने केवल खजाना ही नहीं, भारत की इस अनमोल शान को भी लूट लिया। उसी ने इसे नाम दिया, कोह-ए-नूर… यानी रोशनी का पर्वत। आइए, हम समय के पहिये को पीछे घुमाते हैं और जानते हैं कि यह हीरा ‘शेर-ए-पंजाब’ महाराजा रणजीत सिंह के पास कैसे पहुंचा। क्या है इसको पंजाब लाने के पीछे की कहानी?

जिस कहानी की हम बात कर रहे हैं…, उस वक्त यह कोहिनूर हीरा अफगान राजा शाह शुजा दुर्रानी के पास था। शाह शुजा दुर्रानी जो कि 1803 में शासक बना, लेकिन सत्ता की भूख ने भाई को ही भाई का दुश्मन बना दिया। शाह शुजा के भाई महमूद शाह दुर्रानी ने उसे 1809 में गद्दी से हटा दिया। अब शाह शुजा के जान के लाले पड़ गए। शाह शुजा अपनी जान बचाने के लिए भाग कर कश्मीर आ पहुंचा, जहां कश्मीर के उस वक्त के गवर्नर अता मोहम्मद खान को उसके पास कोहिनूर हीरा होने का पता लगा, तो उसने लगभग 1812 ई. में कोहिनूर के लालच में शाह शुजा को धोखे से कैद कर लिया। वफा बेगम जो कि अफगान शासक शाह शुजा दुर्रानी की पत्नी थीं, उन्हें अपने पति को कैद से छुड़ाने के लिए ऐसे मददगार की जरूरत थी, जो उनके पति शाह शुजा को कश्मीर के गवर्नर की कैद से छुड़ा सके। और उन दिनों महाराजा रणजीत सिंह की बहादुरी के चर्चे अफगानों से छुपे नहीं थे।

BBC-शाह शुजा
इस दौरान, लाहौर में रणजीत सिंह के भव्य दरबार में एक बेबस महिला के रूप में वफा बेगम मदद के लिए पहुंची। वफा बेगम ने रणजीत सिंह के सामने मदद की गुहार लगाई और वादा किया कि यदि वह उनके पति शाह शुजा को अता मोहम्मद की कैद मुक्त करा देंगे, तो कोहिनूर हीरा वह रणजीत सिंह जी को सौंप देंगी। महाराजा ने सोचा कि यही मौका है भारत की प्रतिष्ठा वापिस लाने का, जिसे विदेशी आक्रमणकारी भारत से छीनकर ले गए थे। रणजीत सिंह ने बिना देर किए इस चुनौती को स्वीकार कर लिया।
साल 1812 की दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड में महाराजा रणजीत सिंह की सेना अफगान वजीर फतेह खान से बात करके पीर पंजाल की बर्फीली पहाड़ियों और कठिन रास्तों से होते हुए, तकरीबन 12,000 सैनिकों के साथ आगे बढ़ी, जिसका नेतृत्व दीवान मोहकम चंद कर रहे थे। फतेह खान, जो कि कश्मीर जैसे समृद्ध प्रांत को हथियाकर कोहिनूर भी अपने कब्जे में लेना चाहता था ने महाराजा रणजीत सिंह से 1812 में गठबंधन किया था।
महाराजा रणजीत सिंह की सेना और वजीर फतेह खान कश्मीर पर आक्रमण की योजना के साथ आगे बढ़े। वजीर फतेह खान ने सिखों का साथ देने का दिखावा किया, जबकि अंदर ही अंदर वह खुद शाह शुजा को पकड़कर कोहिनूर हथियाना चाहता था। लेकिन दीवान मोहकम चंद ने फतेह खान का इरादा भांप लिया। और उसके वहां पहुंचने से पहले ही उन्होंने शेरगढ़ किले पर धावा बोल दिया और जीत का परचम लहरा दिया। अता मोहम्मद खान को पराजित करके शाह शुजा को उसकी कैद से मुक्त कराकर लाहौर ले आए।
आजाद होने के बाद शाह शुजा की नीयत बदल गई। उसने एक हीरा रणजीत सिंह को सौंपा, लेकिन वह नकली निकला। यह साफ था कि उसने असली कोहिनूर छुपा लिया था। रणजीत सिंह ने तुरंत स्थिति की गंभीरता को समझा। अब यह केवल एक सौदे की बात नहीं रह गई थी, बल्कि यह उनके सम्मान और सत्ता का प्रश्न बन चुका था। उन्होंने वफा बेगम और शाह शुजा से अपना वादा पूरा करने की बात कही, लेकिन शाह शुजा को कोई फर्क नहीं पड़ा।
आखिरकार जून 1813 में वह क्षण आया जब रणजीत सिंह ने स्वयं इस समस्या का समाधान निकालने का निश्चय किया। लाहौर की मुबारक हवेली में शाह शुजा और रणजीत सिंह आमने-सामने बैठे। इस बार रणजीत सिंह ने तलवार नहीं, बल्कि अपनी बुद्धि का इस्तेमाल किया। उन्होंने ‘पगड़ी बदल’ (turban exchange Ceremony) की परंपरा का प्रस्ताव रखा। उस समय पगड़ी बदलना भाईचारे और विश्वास का प्रतीक माना जाता था, जिसे ठुकराना लगभग असंभव था। शाह शुजा ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
जैसे ही दोनों ने अपनी पगड़ियां बदलीं, उसी क्षण इतिहास ने करवट ली। कहा जाता है कि शाह शुजा ने असली कोहिनूर अपनी पगड़ी में छुपा रखा था। पगड़ी बदलते ही वह हीरा रणजीत सिंह के हाथों में आ गया। बिना किसी युद्ध, बिना खून-खराबे के, रणजीत सिंह ने दुनिया का सबसे प्रसिद्ध हीरा हासिल कर लिया।
यह केवल एक जीत नहीं थी, बल्कि यह बुद्धिमत्ता, धैर्य और रणनीति की एक अद्भुत मिसाल थी। महाराजा रंजीत सिंह ने इसे अपने आर्मलेट में लगवा लिया और जहां भी जाते अपने साथ ले जाया करते थे।
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राजौरी की वो अनसुनी जंग : कैसे लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे ने मौत के साये में रास्ता बनाकर पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ा!
जम्मू-कश्मीर की दुर्गम पहाड़ियों में एक ऐसे वीर की गाथा गूंजती है, जो अद्भुत साहस, तीक्ष्ण बुद्धि और अटूट संकल्प का प्रतीक है। यह उस वीर भारतीय सैनिक के पराक्रम की कहानी है, जिसने गोलियों की बौछार, बारूदी सुरंगों और हर पल मंडराती मौत के बीच रास्ता बनाया, ताकि राजौरी को पाकिस्तानी सेना से मुक्त करा सके।
1948 के उस कठिन दौर में, जब राजौरी सहित जम्मू-कश्मीर के कई क्षेत्रों में पाकिस्तानी सेना ने घुसपैठ कर वहां अपना कब्जा जमा लिया था, तब एक वीर जवान अपनी टीम के साथ राजौरी से पाकिस्तीनी सेना को खदेड़ने के लिए आगे बढ़ा। यह कोई साधारण मिशन नहीं था, बल्कि समय के विरुद्ध एक दौड़ थी। हर एक मिनट की देरी सैकड़ों जिंदगियों पर भारी पड़ सकती थी। यह वीर सैनिक कोई और नहीं, बल्कि परमवीर चक्र से सम्मानित भारतीय लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे थे।
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एक सिख, एक संन्यासी और एक विक्रेता: 25 साल के नरेंद्र मोदी ने भेष बदलकर कैसे इमरजेंसी का मुकाबला किया और गिरफ्तारी को चकमा दिया
25 और 26 जून, 1975 की दरमियानी रात को, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल (Emergency) की घोषणा करके लोकतंत्र का गला घोंट दिया। कुछ ही घंटों के भीतर, नागरिक स्वतंत्रताएं निलंबित कर दी गईं, पूरे देश में प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी गई और विपक्षी नेताओं को बिना किसी पूर्व सूचना के हिरासत में ले लिया गया।
यह कार्रवाई बहुत तेजी से हुई। तत्कालीन सरकार की कमियों को उजागर करने वाले संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया, बोलने की आजादी पर रोक लगा दी गई और हजारों लोगों को जेल में डाल दिया गया।
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मोगा 1989 : जब आतंक के सामने नहीं झुका भगवा, गोलियों से बड़ा था संकल्प और एकता ने जुल्म को दिया जवाब
मोगा 1989 जून, वो दिन जब पार्क बन गया था रणक्षेत्र और निहत्थे लोग हौसले के साथ गोलियों के सामने खड़े रहे। यह सिर्फ हमला नहीं था, साहस की सबसे बड़ी परीक्षा थी, जहां डर नहीं, बल्कि अंत में संकल्प जीता।
1990 का पंजाब…
एक ऐसा समय, जब हवा भी डरकर बहती थी। गांव हों या शहर, हर तरफ एक ही सवाल था, ‘अगला निशाना कौन?’
लेकिन इसी अंधेरे दौर में, कुछ लोग थे, जो हर सुबह बिना डरे एक मैदान में इकट्ठा होते थे। उनके हाथों में हथियार नहीं, बल्कि मन में अनुशासन और राष्ट्रभक्ति का संकल्प होता था। वे थे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक। आज हम आपको बताएंगे, उस नरसंहार के बारे में जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। 25 जून1989, वो तारीख जब अलगाववादियों ने विदेशी ताकतों के इशारे पर भारत की अखंडता में विश्वास रखने वाले संगठन को डराकर चुप कराना चाहा, पर ये ना हो सका।
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जब 12 साल के केशव ने ठाना, उखाड़ना है अंग्रेजों का झंडा : सीताबर्डी किले तक सुरंग खोदने की हैरान कर देने वाली कहानी!
नागपुर की एक पहाड़ी पर स्थित सीताबर्डी किला, आज भी खामोशी के साथ खड़ा है। उसकी दीवारें भले ही समय की धूल से ढक चुकी हों, लेकिन उसकी मिट्टी में एक ऐसी कहानी दबी है, जिसे इतिहास ने बहुत कम जगह दी। यह कहानी किसी बड़े युद्ध या किसी संगठित विद्रोह की नहीं है।
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भारत का पहला अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट टेस्ट मैच (1932) : जब मैच से एक दिन पहले टीम में खिलाड़ियों ने कर दिया था विद्रोह
भारत अपना पहला अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट टेस्ट मैच खेलने जा रहा था, लेकिन उससे एक रात पहले टीम के अंदर बगावत हो गई! खिलाड़ी अपने ही कप्तान के खिलाफ खड़े हो गए। आखिर ऐसा क्या हुआ कि ऐतिहासिक मैच से पहले टीम टूटने की कगार पर पहुंच गई? आइए जानते हैं कि कैसे राजाओं के दबदबे, गलत परंपराओं में भारत का क्रिकेट खेल जकड़ा हुआ था और इसी जकड़न ने किस तरह से एक सच्चे खिलाड़ी और खेल भावना को दबाने की कोशिश की।
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कैसे गुरु हरगोबिंद साहिब ने खड़ी की सिख सेना और मुगलों को दी सीधी चुनौती? चौंका देने वाली कहानी
11 जून, 1606 का वह ऐतिहासिक दिन था, जब मुगल सम्राट जहांगीर के आदेश पर लाहौर में गुरु अर्जुन देव जी को शहीद कर दिया गया। उस समय गुरु हरगोबिंद साहिब जी मात्र 11 वर्ष के थे। अपने पिता की शहादत के बाद गुरु हरगोबिंद जी ने गुरुगद्दी संभाली। गुरु अर्जुन देव जी की शहादत से पूरे सिख समाज में असुरक्षा की भावना फैल गई थी।
लोगों ने महसूस किया कि क्रूरता के इस दौर में, धर्म की रक्षा के लिए अब भक्ति को शक्ति की ढाल की आवश्यकता है। लोगों के इसी डर को गुरु हरगोबिंद जी ने सिखों की पहली सेना में बदल दिया, जिसमें पेशेवर योद्धा नहीं, बल्कि अपने पंथ की रक्षा के लिए तैयार किए गए सामान्य लोग शामिल हुए। इनमें किसान और संत भी थे। यह सेना ही सिख पंथ की पहली ‘अकाल सेना’ कहलाई, और यही सिख के निर्माण की कहानी है।
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