Author: Akansha T

  • वो योद्धा, जिसने अपनी जान देकर महाराणा प्रताप को बचाया! हल्दीघाटी के वीर झाला बीदा की अनसुनी कहानी!

    वो योद्धा, जिसने अपनी जान देकर महाराणा प्रताप को बचाया! हल्दीघाटी के वीर झाला बीदा की अनसुनी कहानी!

    हल्दीघाटी के मैदान में एक वीर ने अपनी वीरता से एक ऐसी रणगाथा लिखी, जो केवल युद्ध कौशल की नहीं, बल्कि अद्वितीय स्वामिभक्ति, साहस और बलिदान की भी पराकाष्ठा है। यह वीरगाथा है उस योद्धा की, जिन्हें इतिहास में झाला बीदा के नाम से जाना जाता है। 

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  • जब रानी लक्ष्मीबाई किले में घिर गई थीं, तब झलकारी देवी ने बचाई थी जान, जानिए बलिदान की अद्भुत कहानी!

    जब रानी लक्ष्मीबाई किले में घिर गई थीं, तब झलकारी देवी ने बचाई थी जान, जानिए बलिदान की अद्भुत कहानी!

    झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की वह अमर सहयोगी, जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर रानी को अंग्रेजों के चंगुल से बचाया, वह नाम है झलकारी बाई। 1858 के मार्च-अप्रैल में जब ब्रिटिश सेना के जनरल सर ह्यू रोज ने झांसी के किले को घेर लिया था, तब स्थिति अत्यंत विकट हो चुकी थी। इस घड़ी में झलकारी बाई ने एक ऐसा साहसिक कदम उठाया, जो इतिहास की किताबों में स्वर्ण अक्षरों से लिखा गया। आइए, जानते हैं कि झलकारी देवी रानी लक्ष्मीबाई के संपर्क में कैसे आईं, उनकी खास बनी और जब रानी पर खतरा मंडराया, तो किस तरह के अपनी जान पर खेलकर कैसे इतिहास रच दिया।

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  • बरगद के पेड़ के नीचे : वह स्कूल जिसने एक साम्राज्य को चुनौती दी

    बरगद के पेड़ के नीचे : वह स्कूल जिसने एक साम्राज्य को चुनौती दी

    20वीं सदी की शुरुआत में, ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली भारतीय युवाओं के दिमाग को अपने हिसाब से ढाल रही थी और उन पर अपना कब्जा जमा रही थी। वे युवाओं का ब्रेनवाश कर रहे थे, उन्हें अपने साम्राज्य की महानता के बारे में पढ़ा रहे थे और अंग्रेजी भाषा तथा उसके मूल्यों को बढ़ावा दे रहे थे। 

    उस समय, गोपबंधु दास नाम के एक युवा और दूरदर्शी छात्र ने, जिन्होंने खुद भी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाई की थी, भारतीय समाज की असलियत में कुछ बेहद परेशान करने वाली बातें देखीं। 

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  • गलवान 2020: नेतृत्व, संयम और कर्नल संतोष बाबू का अंतिम मोर्चा

    गलवान 2020: नेतृत्व, संयम और कर्नल संतोष बाबू का अंतिम मोर्चा

    15 जून 2020 की रात, पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी की बर्फीली ऊंचाइयों पर, समुद्र तल से 4,300 मीटर से भी ज्यादा ऊपर, एक हिंसक झड़प ने भारत-चीन सीमा पर 45 साल से भी ज्यादा समय से चली आ रही शांति को तोड़ दिया, जिसमें कोई जान नहीं गई थी। भारत और चीन ने ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ (LAC) पर शांति बनाए रखने के लिए 1993, 1996 और 2005 में सीमा से जुड़े कई समझौते किए थे।

    1996 के समझौते ने LAC के 2 किलोमीटर के दायरे में बंदूकों और विस्फोटकों के इस्तेमाल पर रोक लगाकर आक्रामकता को कम किया था। नतीजतन, जब हिंसा भड़की, तो बंदूकों का इस्तेमाल नहीं किया गया। इसके बजाय, यह टकराव एक क्रूर ‘हाथापाई’ में बदल गया, जिसमें पत्थरों, खाली हाथों और कीलें लगे तथा कंटीले तारों से लिपटे मध्ययुगीन काल जैसे डंडों का इस्तेमाल किया गया।

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  • गुजरात सल्तनत का क्रूर उदय: क्रूरता के विरुद्ध साहस का प्रतीक वीर हमीरजी गोहिल, सोमनाथ के रक्षक

    गुजरात सल्तनत का क्रूर उदय: क्रूरता के विरुद्ध साहस का प्रतीक वीर हमीरजी गोहिल, सोमनाथ के रक्षक

    गुजरात, जो कभी व्यापार, उपजाऊ जमीन और कुशल कारीगरों के लिए मशहूर था, उसने समृद्धि और संघर्ष, दोनों को अपनी ओर खींचा। इसी पृष्ठभूमि से ज़फर खान मुजफ्फर शाह प्रथम  का उदय हुआ। वह एक ऐसे धर्मांतरित राजपूत के बेटे थे, जिनका दिल्ली के कुलीन वर्ग से संबंध था। 1391 में गवर्नर नियुक्त होने के बाद, उन्होंने दिल्ली की कमजोरी का फ़ायदा उठाया। 1407 में, उन्होंने अपनी आजादी की घोषणा कर दी और हिंसक अभियानों के जरिए गुजरात सल्तनत की नींव रखी। फिर भी, विरोध जारी रहा। सौराष्ट्र में, सोमनाथ के पास, 16 साल के एक किशोर, वीर हमीरजी गोहिल ने उनके खिलाफ खड़े होने का फैसला किया।

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  • क्रांति का बिगुल बनीं एक किताब की कविताएं, जब बाबाराव सावरकर के कविता संग्रह से बौखला गई थी ब्रिटिश सरकार 

    क्रांति का बिगुल बनीं एक किताब की कविताएं, जब बाबाराव सावरकर के कविता संग्रह से बौखला गई थी ब्रिटिश सरकार 

    वर्ष 1907 के आखिरी महीनों में नासिक की गलियों में एक छोटी-सी किताब चुपके-चुपके हाथों-हाथ बंट रही थी। नाम था ‘लघु अभिनव भारत माला’। यह कोई सामान्य कविता-संग्रह नहीं था। यह 18 कविताओं की एक माला थी, जिसे गणेश दामोदर सावरकर यानी बाबाराव सावरकर ने प्रकाशित किया था। सोलापुर के स्वराज्य प्रेस में दिसंबर 1907 में 3000 प्रतियां छपीं और 18 मार्च 1908 को नासिक से आधिकारिक रूप से प्रकाशित हुईं, जिसका उद्देश्य भारत से ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकना था।

    यह पुस्तक ‘अभिनव भारत’ नामक गुप्त क्रांतिकारी संगठन की विचारधारा का आईना थी। बाबाराव और उनके छोटे भाई विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) इस संगठन के प्रमुख स्तंभ थे। संगठन का उद्देश्य था, ब्रिटिश साम्राज्य को जड़ से उखाड़ फेंकना। लेकिन बंदूकों और बमों के साथ-साथ वे शब्दों को भी हथियार बनाना चाहते थे। ‘लघु अभिनव भारत माला’ किताब उसी हथियार का एक रूप थी। कविताएं बाहर से पौराणिक और ऐतिहासिक लगती थीं, जिसमें गणेश, कृष्ण, शिव, शिवाजी और मावलों की कहानियां थीं। लेकिन अंदर से ये ब्रिटिश शासन के विरुद्ध तीखा हमला थीं। 

    ऐसी कविताओं के कुछ उदाहरण यहां दिए गए हैं। पुस्तक की पांचवीं कविता में कृष्ण द्वारा ‘विदेशी राक्षसों’ के वध का उल्लेख है। लेकिन वास्तविकता में यह कविता भारतीयों को ब्रिटिशों के खिलाफ तलवार उठाने के लिए प्रेरित करती थी। इसी तरह, सातवीं कविता में आग्रह किया जा रहा है कि ‘तलवार उठाओ, दासता के राक्षसों का वध करो’, अर्थात नागरिकों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध हथियार उठाने का आह्वान है, न कि स्वतंत्रता के लिए भीख मांगने का। नौवीं कविता एक सीधा प्रश्न उठाती है, ‘किसे बिना युद्ध के स्वतंत्रता मिली?’ यह कविता इस विचार को प्रबल करती है कि यदि स्वराज्य लक्ष्य है, तो ब्रिटिशों से संघर्ष आवश्यक है। इसी प्रकार, सत्रहवीं कविता (चौथी से सातवीं पंक्तियां) में ब्रिटिश शासकों को ‘राक्षस’ बताया गया है और उनके खिलाफ युद्ध का आह्वान किया गया है।

    बाबाराव सावरकर (फोटो क्रेडिट: दिव्य मराठी)

    जब ब्रिटिश शासन को बाबाराव सावरकर की इन गुप्त गतिविधियों का पता चला, तो वे सतर्क हो गए और उनकी गिरफ्तारी का आदेश दिया। 30 मई 1909 को नासिक पुलिस ने बाबाराव को इस पुस्तक के कारण गिरफ्तार कर लिया। उन पर केस चला और 8 जून 1909 नासिक की सत्र अदालत ने उन्हें धारा 124A के तहत दो वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुनाई, और धारा 121 के तहत आजीवन निर्वासन और सारी संपत्ति जब्त करने का आदेश दिया। नासिक के सत्र न्यायाधीश के फैसले के विरुद्ध बाबाराव ने बाम्बे हाईकोर्ट में अपील की। हाईकोर्ट ने इस किताब में कुल 18 कविताओं में से 4 कविताओं को मुख्य आरोपों का आधार बनाया। ये चार कविताएं किताब में नंबर 5, 7, 9 और 17 हैं। जबकि निचली अदालत में पूरी किताब बिना किसी आपत्ति के साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर ली गई थी। हाईकोर्ट ने नासिक सत्र अदालत के फैसले को बरकरार रखा और बाबाराव सावरकर को सेलुलर जेल (अंडमान) भेज दिया गया।

    13 जून 1879 को महाराष्ट्र के नासिक के भगूर गांव में जन्मे गणेश सावरकर ने अपने लेखन, विशेषकर ‘लघु अभिनव भारत माला’ के माध्यम से युवाओं में देशभक्ति और ब्रिटिश सत्ता के अत्याचार के विरुद्ध प्रतिरोध की भावना जगाई। उनका निधन 16 मार्च 1945 को महाराष्ट्र के सांगली में हुआ।

    बाबाराव की इस कहानी से पता चलता है कि साहित्य भी क्रांति का सबसे तेज हथियार बन सकता है। बाबाराव सावरकर ने शब्दों से ऐसी तलवार बनाई, जो ब्रिटिशर्स को सिर से पांव तक डरा गई। यह घटना हमें सिखाती है कि जब अत्याचार चरम पर हो तो एक सच्चा देशभक्त अपनी आवाज को दबने नहीं देता, भले ही उसकी कीमत आजीवन निर्वासन ही क्यों न हो।

  • रॉबेन द्वीप की अंधेरी जेल में कैसे मनाई गई ‘दीवाली’? मंडेला ने खुद बताया सच

    रॉबेन द्वीप की अंधेरी जेल में कैसे मनाई गई ‘दीवाली’? मंडेला ने खुद बताया सच

    रॉबेन द्वीप, दक्षिण अफ्रीका की वह सख्त जेल, जहां नेल्सन मंडेला ने अपने 27 वर्ष की कैद में से 18 साल बिताए। यहां की सलाखों के पीछे जीवन बेहद कठोर था। दिनभर की जीतोड़ मेहनत, सख्त नियम और अकेलेपन की घुटन। लेकिन हर साल दीवाली के आसपास एक अनोखी ज्योति यहां चमक उठती थी। 

    1991 में जेल से छूटने के एक साल बाद, 3 नवंबर को डरबन के सिटी हॉल में दिए गए अपने दीवाली भाषण में मंडेला ने भावुक होकर कहा कि दीवाली मुझे रॉबेन द्वीप पर बिताए दिनों की याद दिलाती है। यह सिर्फ एक स्मृति नहीं थी यह रंगभेद की अंधेरी जेल में प्रकाश, एकता और धार्मिक बहुलवाद की जीवंत मिसाल थी।

    मंडेला ने कहा कि रॉबेन द्वीप पर दीवाली का उत्सव नियमित रूप से मनाया जाता था, जब दुनिया भर के हिंदू दीप जलाकर प्रकाशोत्सव की तैयारी करते, तब जेल में हिंदू पुजारी विशेष अतिथि बनकर आते। मंडेला ने अपने भाषण में इनके नाम स्पष्ट रूप से लिए। केप टाउन से श्री गोवेंदर और प्रिटोरिया से श्री पदयाची, ये पुजारी हिंदू कैदियों के साथ प्रार्थना करने आते और मिठाइयों के पैकेट साथ लाते, जेल की दीवारें भले ही ऊंची हों, लेकिन इन पुजारियों की उपस्थिति कैदियों के लिए उम्मीद की किरण बन जाती। उन्होंने कहा कि हिंदू पुजारी प्रार्थना करते, रामायण की कथाएं सुनाते और दीवाली के प्रतीक अंधकार पर प्रकाश की जीत को जेल की अंधेरी कोठरियों तक पहुंचाते।

    मंडेला ने अपने भाषण में बताया कि जेल अधिकारियों की सोच संकीर्ण थी, वे कहते थे कि ये मिठाई के पैकेट केवल हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए हैं, किसी गैर-हिंदू को छूने की अनुमति नहीं है। लेकिन मंडेला और उनके साथी कैदियों ने इस भेदभाव को चुनौती दी और तर्क दिया कि हिंदू धर्म का दर्शन समूची मानवता के लिए खुला है। इसका आधार संकीर्ण नहीं, बल्कि सार्वभौमिक है, यह सभी को गले लगाता है। कैदियों ने संघर्ष किया, बहस की और अंततः उन्हें जीत भी मिली। इस तरह रॉबेन द्वीप की जेल में दीवाली का उत्सव हिंदुओं तक सीमित नहीं रहा। यह सबके लिए साझा उत्सव बन गया।

    मंडेला ने बताया कि 5000 साल से भी अधिक पुराने इस त्योहार से जुड़ा होना मेरे लिए गर्व की बात है। इस उत्सव में मंडेला अपने भारतीय साथियों के साथ शामिल होते। जिसमें मुख्य रूप से विल्टन मकवाय, अहमद कथराडा, इस्माइल इब्राहिम, बिली नायर, मैक महाराज, इस्सू चिबा, जॉर्ज नायकर के साथ मंडेला दीवाली मनाते थे। इस दौरान प्रार्थना सभाएं होतीं, मिठाइयां बांटी जातीं और एक-दूसरे की संस्कृति को अपनाया जाता। जेल की कठोरता के बीच यह छोटा-सा आयोजन बड़ा संदेश देता था कि धर्म बंटवारे का नहीं, जोड़ने का माध्यम है। कैदी एक-दूसरे की परंपराओं को समझते, सम्मान देते और साथ बैठकर प्रकाश का उत्सव मनाते। दीपक जलाने का प्रतीक यहां जेल की अंधेरी रातों में नई उम्मीद जगाता। 

    मंडेला ने दीवाली को लेकर कहा कि 5000 साल से भी अधिक पुराने इस त्योहार से जुड़ा होना मेरे लिए गर्व की बात है। यह दीवाली उत्सव महज मिठाई बांटने या प्रार्थना तक सीमित नहीं था। यह रंगभेद की नीतियों के खिलाफ एक सूक्ष्म विद्रोह था। दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय खासकर हिंदू लंबे समय से अपार्टहाइड  (Apartheid) यानी रंगभेद कानून का शिकार थे। लेकिन जेल में ये हिंदू पुजारी और कैदी मिलकर साबित कर रहे थे कि संस्कृतियां अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समृद्ध करती हैं। मंडेला ने इस अनुभव को हमेशा याद रखा। उन्होंने अपने भाषण में स्पष्ट रूप से कहा कि 5000 साल पुराने इस दीवाली के त्योहार से जुड़ना उनके लिए गर्व की बात है। 

    रॉबेन द्वीप की इन यादों ने मंडेला की सोच को गहराई दी। जेल की सलाखों के पीछे भी उन्होंने देखा कि कैसे हिंदू साथियों के साथ बिताया हर दीवाली का दिन अनेकता में एकता की नींव रखता है। पुजारियों के आने से न सिर्फ सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता, बल्कि हौसला भी बढ़ता। समाचार मिलते, संघर्ष की कहानियां साझा होतीं और कैदी एक-दूसरे के दर्द को समझते। यह घटना साबित करती है कि अपार्थाइड की अंधेरी ताकतों के खिलाफ दीपावली के प्रकाश की ज्योति कितनी शक्तिशाली हो सकती है। मंडेला और उनके साथियों ने इसे सामूहिक रूप से मनाकर दिखाया कि धर्म, जाति या रंग से ऊपर उठकर मानवता एक हो सकती है।

    आज भी रॉबेन द्वीप की यह दीवाली मनाने की कहानी प्रेरणा देती है। यह हमें याद दिलाती है कि सबसे कठिन परिस्थितियों में भी सहिष्णुता और एकता का दीप जलाया जा सकता है। 

    बता दें कि नेलशन मंडेला ने अपार्थाइड (Apartheid) जोकि दक्षिण अफ्रीका में 1948 से 1994 तक लागू की गई एक कानूनी नस्लभेद प्रणाली थी, के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया। उन्हें इसी के चलते 12 जून 1946 को उम्रकैद की सजा हुई और उन्हें रॉबेन द्वीप (केप टाउन से करीब 12 किमी दूर) भेज दिया गया। वे 27 वर्ष (1964-1990) जेल में रहे, जिसमें 18 वर्ष रॉबेन द्वीप पर गुजरे। 11 फरवरी 1990 को उन्हें रिहा किया गया।

    (यह आर्टिकल नेल्सन मंडेला फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित 3 नवंबर 1991 के मूल भाषण पर आधारित है।)

  • ‘डेक्कन क्वीन’ ट्रेन की चमक के पीछे छिपी 24,000 भारतीय मजदूरों के मौत की दर्दनाक कहानी!

    ‘डेक्कन क्वीन’ ट्रेन की चमक के पीछे छिपी 24,000 भारतीय मजदूरों के मौत की दर्दनाक कहानी!

    महाराष्ट्र में दक्कन के पठारों के बीच एक लग्जरी ट्रेन दौड़ती है ‘डेक्कन क्वीन’ यानी दक्कन की रानी। अंग्रेजों ने मुंबई से पुणे के बीच सफर को आरामदायक और आनंदमयी बनाने के लिए 1 जून 1930 को इसे आरम्भ किया था। 

    लेकिन क्या आप जानते हैं पहाड़ों के बीच जिस खूबसूरत रेलमार्ग पर होकर यह ट्रेन गुजरती है, उसके बनने के पीछे एक ऐसी दर्दनाक कहानी है, जिसे इतिहास के पन्नों में दबा दिया गया। पहाड़ों के बीच स्थित भोर घाट दर्रा से होकर गुजरने वाली इस रेलवे लाइन का निर्माण कोई साधारण कार्य नहीं था, बल्कि भारतीयों का मौन बलिदान था, जिसने अंग्रेजों के आराम की नींव रखी।

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  • बिरसा मुंडा पुण्यतिथि: जब 400 जनजातीय लोगों पर बरसी गोलियां, जानिए डोम्बारी बुरु नरसंहार का छुपाया गया सच!

    बिरसा मुंडा पुण्यतिथि: जब 400 जनजातीय लोगों पर बरसी गोलियां, जानिए डोम्बारी बुरु नरसंहार का छुपाया गया सच!

    झारखंड की पहाड़ियों में एक ऐसी चीखें आज भी गूंजती हैं, जिन्हें इतिहास ने सुनकर भी अनसुना कर दिया। यह चीखें हैं डोम्बारी बुरु नरसंहार में मारे गए, 400 जनजातीय क्रांतिकारियों की। जब दमनकारी ब्रिटिश शासन ने निहत्थे जनजातीय समाज के पुरुषों, बच्चों और महिलाओं पर गोलियों की बरसात की थी। यह कोई साधारण घटना नहीं थी, बल्कि वह क्षण था, जब एक पूरी सभ्यता को कुचलने का प्रयास किया गया। इस विद्रोह की आत्मा थे, बिरसा मुंडा, जिनकी आवाज ‘अबुआ दिशुम अबुआ राज’ (अपना देश, अपना राज) बनकर जंगलों और पहाड़ों में गूंज उठी थी। लेकिन अंग्रेजों को यह इतना खतरनाक लगा कि उन्होंने इसे हमेशा के लिए दबाने का निर्णय लिया। डोम्बारी बुरु की पहाड़ी आज भी उस दिन की गवाही देती है, जब ब्रिटिश सत्ता ने इतिहास का सबसे क्रूरता पूर्ण भयावह रूप दिखाया था।

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  • कच्छ का रण : क्या यह केवल रेगिस्तानी सुंदरता हैया भारत का रणनीतिक ‘शक्तिकेंद्र’?

    कच्छ का रण : क्या यह केवल रेगिस्तानी सुंदरता हैया भारत का रणनीतिक ‘शक्तिकेंद्र’?

    हर साल, जैसे ही 17 जून आता है, हम ‘मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए विश्व दिवस’ जैसे नारे लगाते हैं। जब धरती अपनी ताकत खोकर बंजर जमीन में बदलने लगती है, तो हम चिंतित हो जाते हैं। 

    यह सच है कि हमारे देश में भी, कई इलाके मरुस्थलीकरण की चपेट में आ रहे हैं और बेकार और बंजर जमीन में बदलते जा रहे हैं। लेकिन, हम उन बंजर जमीनों को किस नजर से देख रहे हैं? हम अपनी सूझ-बूझ से उन्हें राष्ट्रीय विकास के लिए कैसे बदल रहे हैं? 

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