बरगद के पेड़ के नीचे : वह स्कूल जिसने एक साम्राज्य को चुनौती दी

The School Under the Banyan Tree

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20वीं सदी की शुरुआत में, ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली भारतीय युवाओं के दिमाग को अपने हिसाब से ढाल रही थी और उन पर अपना कब्जा जमा रही थी। वे युवाओं का ब्रेनवाश कर रहे थे, उन्हें अपने साम्राज्य की महानता के बारे में पढ़ा रहे थे और अंग्रेजी भाषा तथा उसके मूल्यों को बढ़ावा दे रहे थे। 

उस समय, गोपबंधु दास नाम के एक युवा और दूरदर्शी छात्र ने, जिन्होंने खुद भी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाई की थी, भारतीय समाज की असलियत में कुछ बेहद परेशान करने वाली बातें देखीं। 

उन्हें पता चला कि स्कूलों में अंग्रेजी किताबें, साहित्य, पश्चिमी मूल्य और उनकी श्रेष्ठता के बारे में पढ़ाया जा रहा था, जबकि भारतीय परंपराओं, इतिहास और उनके मूल्यों को बुरा-भला कहकर नीचा दिखाया जा रहा था। इस शिक्षा प्रणाली का मकसद अपनी मातृभूमि भारत की सेवा करना नहीं, बल्कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों का गुलाम बनना था। 

दास ने देखा कि ओडिशा के गांव और वहां के लोगों का जीवन बाढ़ के कारण तबाह हो रहा था। अत्याधिक गरीबी ने लोगों की उम्मीदों को कुचल दिया था और युवाओं के बीच अज्ञानता फैली हुई थी। 

तब दास को अपने भीतर एक गहरी और गंभीर बात का एहसास हुआ कि अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली समाज का भला नहीं कर रही है, बल्कि वह ब्रिटिश प्रशासनिक तंत्र के लिए केवल नौकर पैदा कर रही है। इसके बाद, दास यह समझ गए कि भारत को केवल राजनीतिक आज़ादी की ही नहीं, बल्कि युवाओं के बीच नैतिक और बौद्धिक जागृति के एक नए दौर (पुनर्जागरण) की भी ज़रूरत है


वह बाल गंगाधर तिलक जैसे राष्ट्रवादी विचारों, आदर्शों और व्यक्तित्वों से, साथ ही प्राचीन गुरुकुल परंपरा और प्रणाली से प्रेरित थे। इसलिए, वर्ष 1919 में, दास ने भारत के ओडिशा राज्य के पुरी जिले के सत्यबाड़ी ब्लॉक में स्थित तीर्थस्थल साखीगोपाल में ‘सत्यबाड़ी बना विद्यालय’ नामक एक गुरुकुल-शैली के स्कूल की स्थापना की। इस विद्यालय में किसी भी प्रकार की औपनिवेशिक शैली की वास्तुकला, कठोर बेंच या छत नहीं थी। इसके बजाय, विद्यार्थी एक विशाल बरगद के पेड़ की छांव में बैठकर शिक्षा ग्रहण करते थे। यह केवल शिक्षा प्रदान करने का एक माध्यम ही नहीं था, बल्कि ब्रिटिश-शैली की कॉन्वेंट शिक्षा प्रणाली के विरुद्ध एक विद्रोह भी था।  

उस समय के व्यापक संस्थागत नेटवर्क के विपरीत, यह विद्यालय एक अद्वितीय ‘आदर्श संस्थान’ के रूप में संचालित और पोषित होता रहा। तथापि, इसका प्रभाव पूरे ओडिशा में फैला, जिसका श्रेय स्वयं दास के नेतृत्व में चले ‘सत्यबाड़ी राष्ट्रीय आंदोलन’ को जाता है। इस आंदोलन में उनके अन्य सहयोगियों ने भी उनके विचारों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपने चरमोत्कर्ष के समय, इस विद्यालय में लगभग 100 से 300 विद्यार्थी नामांकित थे, जिनमें से अधिकांश ओडिशा के ग्रामीण क्षेत्रों, विशेष रूप से पुरी जिले के आसपास के इलाकों से आते थे। 

स्कूल का कामकाज बहुत शानदार था। सीमित इंफ्रास्ट्रक्चर और बिना किसी औपनिवेशिक शैली वाली क्लासरूम के, पढ़ाई खुले आसमान के नीचे होती थी। पाठ्यक्रम में, उड़िया भाषा उन्हें भारतीय पहचान से जोड़े रखने के लिए थी, संस्कृत प्राचीन सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने के लिए और अंग्रेजी आधुनिक दुनिया में कदम रखने के एक साधन के तौर पर थी, इसे किसी खास वर्ग की निशानी के तौर पर नहीं देखा जाता था। गणित और विज्ञान तार्किक सोच को बढ़ावा देते थे और इतिहास की कक्षाएं भारत के स्वर्णिम युग, नायकों और विदेशी आक्रमणों के सामने भारत के अडिग साहस की कहानियों से बच्चों की कल्पना शक्ति को जगाती थीं। इस तरह, अप्रत्यक्ष रूप से उनमें आत्म-सम्मान की भावना विकसित हुई और ब्रिटिश शासन की श्रेष्ठता की भावना (superiority complex) टूट गई।  

लेकिन असली शिक्षा तो क्लासरूम के बाहर ही मिलती थी। अनुशासन और सेवा, ये दो ऐसे स्तंभ थे, जिन पर इस स्कूल की नींव रखी गई थी। अपनी शिक्षा के एक हिस्से के तौर पर, छात्रों को कड़ी शारीरिक ट्रेनिंग दी जाती थी, और अलग-अलग गतिविधियों के जरिए उनमें प्रेम और करुणा की भावना जगाई जाती थी। एक बार जब ज़बरदस्त बाढ़ आई, तो छात्रों ने बचाव और पुनर्वास के काम में हाथ बंटाया, उन्होंने क्षतिग्रस्त घरों को दोबारा बनाने में मदद की और इस तरह करुणा का सही अर्थ सीखा। उन्हें बार-बार यह याद दिलाया जाता था कि शिक्षा का एक अहम पहलू ‘सेवा’ भी है। साथ बैठकर भोजन करने से भी जातिगत भेदभाव की दीवारें तोड़ने में मदद मिली। इस तरह, समाज और औपनिवेशिक शासकों द्वारा थोपे गए गहरे भेदभाव और सामाजिक बंटवारे को चुपचाप चुनौती दी गई। स्कूल की हर गतिविधि का मकसद छात्रों के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना था।  

विद्यालय को आर्थिक रूप से कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ा, लेकिन उसे स्थानीय ग्रामीणों से काफी दान, राष्ट्रवादी नेताओं से समर्थन, यहां तक कि शिक्षकों का योगदान और छात्रों से मिलने वाली सीमित फीस भी मिली। जिससे विद्यालय के सुचारू रूप से चलने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

सत्यवादी बन विद्यालय अपनी स्थापना (1919) से लेकर 1920 के दशक की शुरुआत तक चला। हालांकि, आर्थिक कठिनाइयों, राजनीतिक दबावों और संस्थागत चुनौतियों के कारण इसका धीरे-धीरे पतन हो गया, और अंततः 1926 के आसपास यह बंद हो गया। अपने अपेक्षाकृत कम समय के अस्तित्व के बावजूद, इस विद्यालय ने एक अमिट छाप छोड़ी। इसने यह दिखाया कि भारत में शिक्षा की परिकल्पना केवल रोजगार पाने के एक माध्यम के रूप में नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देने और राष्ट्रीय चेतना की भावना को पोषित करने के एक साधन के रूप में की जा सकती है।  

सत्यवादी के विशाल बरगद के पेड़ों की छांव से युवाओं की एक नई पीढ़ी उभरी, जो केवल अधीन होकर नौकरी खोजने वाले नहीं थे, बल्कि ऐसे नागरिक थे, जो सवाल उठाने, योगदान देने और नेतृत्व करने में सक्षम थे। 

सत्यवादी के संस्थापक गोपबंधु दास केवल एक शैक्षणिक संस्थान की स्थापना नहीं कर रहे थे, बल्कि वह एक जन-जागरण का सूत्रपात कर रहे थे। जहां ब्रिटिश संस्थान केवल एकरूपता (conformity) को बढ़ावा दे रहे थे, वहीं गोपबंधु दास स्वतंत्रता की भावना को पोषित कर रहे थे। सांस्कृतिक दमन के माहौल में, उन्होंने आत्म-सम्मान का समर्थन किया और जब गुलामी का ही बोलबाला था, तब उन्होंने ऐसे विचार-विमर्श को प्रोत्साहित किया, जिसने अंततः एक स्वतंत्र भारत के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।