झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की वह अमर सहयोगी, जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर रानी को अंग्रेजों के चंगुल से बचाया, वह नाम है झलकारी बाई। 1858 के मार्च-अप्रैल में जब ब्रिटिश सेना के जनरल सर ह्यू रोज ने झांसी के किले को घेर लिया था, तब स्थिति अत्यंत विकट हो चुकी थी। इस घड़ी में झलकारी बाई ने एक ऐसा साहसिक कदम उठाया, जो इतिहास की किताबों में स्वर्ण अक्षरों से लिखा गया। आइए, जानते हैं कि झलकारी देवी रानी लक्ष्मीबाई के संपर्क में कैसे आईं, उनकी खास बनी और जब रानी पर खतरा मंडराया, तो किस तरह के अपनी जान पर खेलकर कैसे इतिहास रच दिया।
22 नवंबर 1830 को झांसी के निकट भोजला गांव में एक साधारण कोली परिवार में जन्मी झलकारी बाई की शादी रानी लक्ष्मीबाई की सेना के बहादुर तोपची पूरन सिंह से हुई थी। शादी के बाद झलकारी भी रानी लक्ष्मीबाई की सेना में शामिल होना चाहती थी और वह मौका भी आया। गौरी पूजा के मौके पर राज्य की महिलाएं किले में रानी का सम्मान करने गईं। इनमें झलकारी भी शामिल थीं। रानी ने झलकारी को देखा, तो चौंक गईं। झलकारी का चेहरा, कद-काठी और आकृति बिल्कुल रानी जैसी थी। रानी ने उनकी बहादुरी की कहानियां सुनीं और उन्हें तुरंत अपनी निकटवर्ती बना लिया। रानी ने झलकारी को दुर्गा दल में शामिल किया, जो महिलाओं की एक विशेष सशस्त्र टुकड़ी थी। वे जल्द ही दुर्गा दल की सेनापति बन गईं।
सन् 1858 के मार्च में ब्रिटिश जनरल सर ह्यू रोज की सेना ने झांसी पर घेराबंदी कर दी। ब्रिटिश सेना की संख्या भारी थी और उनके पास आधुनिक तोपें व हथियार भी थे। झांसी के किले की रक्षा के लिए रानी और उनकी सेना ने अदम्य साहस दिखाया। झलकारी बाई और दुर्गा दल की महिलाएं मोर्चे पर पुरुष सैनिकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रही थीं। वे गोला-बारूद ढो रही थीं, घायलों की देखभाल कर रही थीं और कभी-कभी तोपें भी चला रही थीं।
किले पर हमला तेज होता गया। ब्रिटिश सेना ने किले की दीवारों को तोड़ने के लिए लगातार तोपों से बमबारी की। अंदर से रानी की सेना ने भी जवाबी हमले किए, लेकिन स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ती गई। रानी की सेना के एक गद्दार सैनिक जिसका नाम दूल्हेराव था, उसन महारानी को धोखा दे दिया। उसने अंग्रेजों के लिए किले का एक द्वार चुपके से खोलकर दुश्मन को अंदर घुसने दिया। अब किले का पतन निश्चित लग रहा था।
ऐसे में रानी के सेनापतियों और झलकारी बाई ने उन्हें कुछ सैनिकों के साथ किला छोड़कर सुरक्षित निकलने की सलाह दी। रानी अपने नाबालिग दत्तक पुत्र दामोदर राव और कुछ विश्वस्त सैनिकों के साथ रात के अंधेरे में किले से निकल गईं। वे कालपी की ओर बढ़ीं, जहां अन्य विद्रोही नेताओं से मिलकर आगे की लड़ाई की योजना बनानी थी।
अब झलकारी बाई ने योजना के अनुसार काम शुरु कर दिया। योजना का उद्देश्य था कि ब्रिटिश सेना को यह भ्रम रहे कि रानी अभी भी किले में हैं और लड़ रही हैं। इससे रानी को सुरक्षित दूरी तय करने का समय मिल सके। झलकारी ने रानी लक्ष्मीबाई का पूरा वेश धारण कर लिया। वही पोशाक, आभूषण, सिर पर पगड़ी और योद्धा रूप। वह घोड़े पर सवार होकर मोर्चे पर पहुंचीं और सेना की कमान अपने हाथ में ले ली। झलकारी ने सैनिकों को प्रोत्साहित किया और ब्रिटिश सेना पर हमले जारी रखे। उनकी आवाज और हाव-भाव बिल्कुल रानी लक्ष्मीबाई जैसे थे। कोई यह नहीं समझ पाया कि यह असली रानी नहीं हैं।
किले के अंदर की लड़ाई अंग्रेजों के पाले में जा रही थी, क्योंकि उनके सैनिकों के संख्या बहुत बड़ी थी। लेकिन अभी भी इस भ्रम को कुछ समय तक बरकरार रखना था कि लक्ष्मीबाई ही लड़ाई लड़ रही हैं, जब तक कि रानी सुरक्षित कालपी न पहुंच जाएं।
ऐसी स्थिति में झलकारी बाई किले से बाहर निकल ब्रिटिश जनरल ह्यूग रोज के शिविर में पहुंची। वहां झलकारी ने कहा कि वह रानी लक्ष्मीबाई हैं और जनरल ह्यूग रोज से मिलना चाहती हैं। रोज और उसके सैनिक प्रसन्न थे कि अब उनके हाथ में झांसी आ गई और रानी भी जीवित उनके कब्जे में है। जनरल को बाद में पता चला कि वह रानी नहीं, वह तो रानी की कद-काठी वाली झलकारी बाई हैं लेकिन तब तक रानी सुरक्षित जगह पहुंच चुकी थीं। भारत के महान साहित्यकार वृंदावनलाल वर्मा ने लिखा है कि ‘दूल्हेराव ने जनरल रोज को बता दिया कि ये असली रानी नहीं है। इसके बाद रोज ने पूछा कि तुम्हें गोली मार देनी चाहिए।
इस पर झलकारी ने कहा कि मार दो, इतने सैनिकों की तरह मैं भी मर जाऊंगी। झलकारी के इस रूप को अंग्रेज सैनिक स्टुअर्ट बोला कि ये महिला पागल है। इस पर जनरल रोज ने कहा नहीं स्टुअर्ट अगर भारत की 1 फीसदी महिलाएं भी इस जैसी हो जाएं, तो अंग्रेजों को जल्दी ही भारत छोड़ना पड़ेगा ‘।
झलकारी देवी की मृत्यु को लेकर कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है। कुछ लोगों का कहना हैं कि युद्ध के बाद उन्हें छोड़ दिया गया था और फिर उनकी मृत्यु 1890 में हुई। इसके उलट कुछ इतिहासकार मानते हैं कि झलकारी बाई को युद्ध के समय 4 अप्रैल 1858 को वीरगति प्राप्त हुई।
उनके त्याग ने रानी लक्ष्मीबाई को न केवल बचाया, बल्कि विद्रोह की ज्वाला को और भड़काया। रानी बाद में कालपी और ग्वालियर में लड़ती रहीं और 18 जून 1858 को ग्वालियर के निकट वीरगति को प्राप्त हुईं।
‘झांसी की रानी की परछाई’ या ‘दूसरी झांसी की रानी’ के नाम से प्रसिद्ध झलकारी के सम्मान में भारत सरकार डाक टिकट जारी कर चुकी है।

झलकारी बाई ने यह सिद्ध किया कि भारत की बेटियां केवल इतिहास की गवाह नहीं, बल्कि उसकी निर्माता भी हैं। उनका बलिदान हर भारतीय के भीतर राष्ट्रभक्ति की ज्वाला को सदैव प्रज्वलित करता रहेगा।

