कल्पना कीजिए, अंग्रेजों के जमाने की एक ऐसी जेल, जहां गीता का संदेश गूंजता हो। जहां सलाखों के पीछे निराशा नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और साधना का वातावरण हो, जैसे किसी आश्रम में होता है। जहां एक कठोर जेलर भी एक संत के व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हो जाए कि स्वयं आध्यात्मिक प्रवचनों की व्यवस्था कर दे और परिवार के साथ शामिल भी हो।
यह कोई काल्पनिक कथा नहीं, बल्कि सन् 1932 में धुलिया जेल में घटी एक ऐतिहासिक घटना है। जिसे साकार किया था, भारत के महान स्वाधीनता संग्राम सेनानी विनोबा भावे जी ने। उन्होंने ब्रिटिशकाल की क्रूर जेल के वातावरण को आध्यात्मिक कैसे बनाया, इसके पीछे की कहानी काफी रोचक है।
यह कहानी है, साल 1932 की। स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने के चलते ब्रिटिश सरकार ने विनोबा भावे को धुलिया जेल में कैद करके रखा था। उनके साथ अनेक राजनीतिक कैदी भी बंद थे, जिनके लिए जेल का जीवन बेहद नीरस और मानसिक रूप से कष्टदायक बन गया था। विनोबा भावे ने अनुभव किया कि यदि कैदियों के भीतर उत्साह और आशा का दीपक जलाए रखा जाए, तो जेल का वातावरण भी सकारात्मक बन सकता है। जिससे स्वाधीनता संग्राम को और मजबूती मिलेगी। इसके लिए उन्होंने हर साथी कैदी से व्यक्तिगत परिचय बनाया और सभी के मनोबल को बनाए रखने का प्रयास किया।
विनोबा भावे जी के जेल में ‘बी’ श्रेणी के कैदियों में शामिल किया गया था। जहां श्रम करना अनिवार्य नहीं था, लेकिन उन्होंने स्वयं जेलर से काम मांगा। जब जेलर ने उनकी कमजोर शारीरिक स्थिति देखकर मना कर किया, तब विनोबा ने कहा कि बिना श्रम किए भोजन करना धर्म के खिलाफ है। आखिरकार जेल प्रशासन को उनकी बात माननी पड़ी। जेल में बंद प्रतिष्ठित स्वतंत्रता सेनानी साने गुरुजी, जमनालाल बजाज व आपटे गुरुजी की मांग पर, जेलर ने उन्हें कैदियों को ‘गीता का प्रवचन’ सुनाने का काम सौंपा।
विनोबा जी ने यह कार्य सहर्ष स्वीकार किया। तय हुआ कि सप्ताह में एक बार, प्रत्येक रविवार को गीता के एक अध्याय पर विनोबा भावे कैदियों को प्रवचन देंगे। इस प्रकार 21 मार्च 1932 को उन्होंने पहले अध्याय पर प्रवचन दिया। उन्होंने कठिन दार्शनिक विचारों को भी अत्यंत सरल भाषा में सुनाया। धीरे-धीरे इन प्रवचनों का प्रभाव जेल की सीमाओं से भी आगे बढ़ने लगा। प्रारंभ में ये प्रवचन केवल पुरुष राजनीतिक कैदियों के लिए होते थे, लेकिन जब महिला कैदियों को इसकी जानकारी मिली, तो उन्होंने भी इन्हें सुनने की इच्छा प्रकट की।
जेल की नियमावली के अनुसार, पुरुष कैदियों का महिला बैरक में प्रवेश असंभव था, किंतु तत्कालीन जेलर वैष्णव ने विनोबा जी के प्रवचन से प्रभावित होकर महिलाओं की बैरक में गीता प्रवचन करने की अनुमति दे दी। इतना ही नहीं, जेलर वैष्णव ने स्वयं प्रत्येक प्रवचन के समय उपस्थित रहना प्रारंभ किया और अपनी पत्नी को भी साथ लाते थे। इस प्रकार सप्ताह में एक दिन महिला कैदियों के बीच भी गीता का संदेश पहुंचने लगा।
महिला कैदियों को जेल में गीता प्रवचन सुनाने की जानकारी जब सामान्य कैदियों को मिली, तो उन्होंने भी जेलर से मांग की कि उन लोगों को भी विनोबा जी के प्रवचन सुनने का अवसर मिले। जिसके बाद जेलर वैष्णव ने बुधवार को एक घंटे की विशेष छुट्टी देकर यह व्यवस्था कर दी। देखते ही देखते पूरा कारागार आध्यात्मिक वातावरण से भर उठा। जहां पहले कैद, अनुशासन और कठोरता का भाव था, वहीं अब आत्मचिंतन, शांति और जीवन को नई दृष्टि से देखने की प्रेरणा का संचार होने लगा।
इसका प्रभाव यह हुआ कि धीरे-धीरे जेल का तनावपूर्ण माहौल, किसी आध्यात्मिक आश्रमों में आभास की जाने वाली शांति में बदलने लगा। मानसिक तनाव से गुजरने वाले कैदियों के चेहरे पर अब मुस्कान और उनमें आध्यात्मिक ऊर्जा का तेज था।
21 मार्च 1932 से शुरु हुआ गीता प्रवचन, 19 जून 1932 को संपन्न हुआ। विनोबा जी ने कैदियों को सभी 18 अध्यायों को सुनाया। जब विनोबा जी के जेल से रिहा होने का समय आया, तब तक कैदियों के मन में उनके प्रति अपार श्रद्धा उमड़ चुकी थी। कैदियों ने जेल प्रशासन से अनुरोध किया कि उन्हें उनकी मेहनत की कमाई में से दो आने दिए जाएं। क्योंकि वह विनोबा जी को दक्षिणा स्वरूप भेंट करना चाहते हैं। यह इस बात का प्रमाण था, जिन लोगों को समाज अपराधी कहता था, उन्हीं कैदियों के भीतर गीता प्रवचन से ज्ञान, श्रद्धा और कृतज्ञता की ऐसी भावना जाग उठी थी।
धुलिया जेल का यह अध्याय केवल ‘गीता प्रवचन’ के जन्म की कहानी नहीं है, बल्कि इस बात का सशक्त उदाहरण भी है कि एक संत स्वभाव व्यक्ति अपनी दृष्टि और आचरण से किसी भी स्थान का स्वरूप बदल सकता है। अंग्रेजों ने जिस कारागार को स्वतंत्रता सेनानियों का मनोबल तोड़ने के लिए बनाया था, उसी कारागार को विनोबा भावे ने साधना, श्रम, आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक जागरण का केंद्र बना दिया। वहां गीता केवल पढ़ी नहीं गई, बल्कि जीवन में उतारी गई। कैदियों के भीतर निराशा के स्थान पर आत्मविश्वास, संघर्ष के बीच धैर्य और दंड के वातावरण में करुणा का संचार हुआ।
जन्म व परिवार
विनोबा भावे का जन्म 11 सिंतबर 1895 को महाराष्ट्र के कोंकण के गागोदा गांव में हुआ था। उनके पिता विनायक नरहरि भावे और माता मां रुक्मणी बाई धार्मिक महिला थीं। भावे को प्रारंभिक धार्मिक शिक्षा मां से ही मिली। वह बचपन से ही उन्हें महाभारत, रामायण के साथ-साथ संत ज्ञानेश्वर, शंकराचार्य, नामदेव, गुरू रामदास और तुकाराम की कथाएं सुनाया करती थीं।

