Author: Akansha T

  • कैसे कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों ने बर्मा में 5 सप्ताह तक ब्रिटिश सेना को रोककर रखा?

    कैसे कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों ने बर्मा में 5 सप्ताह तक ब्रिटिश सेना को रोककर रखा?

    बर्मा (आज का म्यांमार) के घने जंगलों, पहाड़ियों में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐसा अध्याय छिपा है, जिसे इतिहास में हाशिये पर रखा गया। यह कहानी किसी विशाल सेना की नहीं, बल्कि एक दृढ़ निश्चयी भारतीय सैन्य अधिकारी गुरबख्श सिंह ढिल्लों की है।

    उस दौर में, जब ब्रिटिश साम्राज्य विश्व में सबसे शक्तिशाली सैन्य शक्ति था, तब आजाद हिंद फौज के इस अधिकारी कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों ने सीमित संसाधनों के बावजूद ब्रिटिश सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। बर्मा के घने जंगलों में 5 सप्ताह तक ब्रिटिश सेना आगे नहीं बढ़ पाई थी। गुरबख्श सिंह ढिल्लों का अंग्रेजी सेना से यह कोई साधारण टकराव नहीं था, बल्कि वह ऐतिहासिक क्षण था, जब भारतीय सैनिकों ने पहली बार ब्रिटिश सरकार को सीधे युद्धभूमि में चुनौती दी थी।

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  • वह कहानी, जो पाकिस्तान, कश्मीर एकजुटता दिवस पर नहीं बताएगा : PoK में बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर की विफलता

    वह कहानी, जो पाकिस्तान, कश्मीर एकजुटता दिवस पर नहीं बताएगा : PoK में बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर की विफलता

    हर साल 5 फरवरी को पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के साथ ‘एकजुटता दिखाने’ के लिए ‘कश्मीर सॉलिडेरिटी डे’ मनाता है, जबकि कश्मीर का वह हिस्सा जिस पर उसने 22 अक्टूबर, 1947 को कब्जा कर लिया था (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर), खंडहर बन चुका है। सच तो यह है कि, जब पाकिस्तान J&K के लोगों के साथ खड़े होने का दावा करता है, तब वह छिपाता है कि जिस इलाके पर उसने कब्जा किया है, वहां इंफ्रास्ट्रक्चर की इतनी ज्यादा अनदेखी हुई है कि वहां बार-बार लोगों ने विद्रोह किया है और आज भी कर रहे हैं। हर इलाके में मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर, चाहे वह सड़कें हों, अस्पताल हों, रेलवे हों, यूनिवर्सिटी हों, या बिजली की पहुंच हो, सिर्फ बातें नहीं हैं, बल्कि यह देखने का एक तरीका है कि कोई इलाका सच में तरक्की कर रहा है या नहीं। 

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  •  एक ‘मृत सिपाही’ को गवाह बनाकर अंग्रेजों ने 172 लोगों को सुनाई थी फांसी की सजा

     एक ‘मृत सिपाही’ को गवाह बनाकर अंग्रेजों ने 172 लोगों को सुनाई थी फांसी की सजा

    सोचिए, अगर कोई मृत व्यक्ति अदालत में पहुंचकर गवाही दे और उसकी गवाही पर 172 लोगों को फांसी की सजा भी सुना दी जाए। शायद किसी को भी इस बात पर विश्वास नहीं होगा, लेकिन यह घटना बिल्कुल सच है। बस, इसे इतिहास के पन्नों में दबा दिया गया। 

    यह घटना है, 1922 में गोरखपुर में हुए चौरी-चौरा कांड की। इसमें अंग्रेजों ने सैकड़ों किसानों के जीवन का फैसला चंद कागजों और गुमनाम बयानों से तय किया था। जिसका गवाह था, ब्रिटिश इंडियन पुलिस में काम करने वाला एक सिपाही, जिसे अंग्रेज पहले ही मृत घोषित कर चुके थे।

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  • World Wetlands Day : कल्लनई से रामसर तक, भारत ने 2000 साल पहले ही बना लिया था वेटलैंड सिस्टम

    World Wetlands Day : कल्लनई से रामसर तक, भारत ने 2000 साल पहले ही बना लिया था वेटलैंड सिस्टम

    2  फरवरी को वर्ल्ड वेटलैंड्स डे मनाया जाता है, जो 1971 में वेटलैंड्स पर रामसर कन्वेंशन पर हस्ताक्षर की याद दिलाता है। इस दिन ईरान के रामसर में, दुनिया भर के देशों ने वेटलैंड्स की सुरक्षा के लिए दुनिया की पहली वैश्विक संधि को अपनाया था। ये

     वेटलैंड्स ऐसे इकोसिस्टम हैं जो ताजा पानी, खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता, बाढ़ नियंत्रण और जलवायु स्थिरता को प्रदान करते हैं। आज, दुनिया के अधिकांश देश इस फ्रेमवर्क का पालन करते हैं, यह मानते हुए कि सभ्यता खुद ‘स्वस्थ जल इकोसिस्टम’ पर निर्भर करती है।

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  • जब पहली बार समुद्री लुटेरों का सामना भारतीय तटरक्षक बल से हुआ!

    जब पहली बार समुद्री लुटेरों का सामना भारतीय तटरक्षक बल से हुआ!

    भारत के समुद्री इतिहास में एक दिन ऐसा भी आया, जब भारतीय तटरक्षक बल (Indian Coast Guard-ICG) ने अरब सागर में खूंख्वार समुद्री डाकुओं से लड़ाई लड़ी। इस लड़ाई को नाम दिया गया था, ऑपरेशन अलोंद्रा रेनबो (Operation Alondra Rainbow), जिसने न केवल भारत की समुद्री ताकत, बल्कि उसकी बुद्धिमत्ता को भी पूरी दुनिया के सामने साबित किया। 

    1 फरवरी को पूरे देश में भारतीय तटरक्षक दिवस (Indian Coast Guard Day) मनाया जाता है। इसी दिन 1977 में इस बल की नींव रखी गई थी। तो आइए, इस अवसर पर ऑपरेशन अलोंद्रा रेनबो के बारे में विस्तार से जानते हैं कि कैसे भारत के समुद्री सुरक्षा इतिहास में इसने एक स्वर्ण अध्याय जोड़ा। 

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  • कैसे अदालत की एक नौकरी ने कुडमुल रंगा राव को वंचित समाज का युगपुरुष बना दिया?

    कैसे अदालत की एक नौकरी ने कुडमुल रंगा राव को वंचित समाज का युगपुरुष बना दिया?

    मंगलौर की जिला अदालत उस दिन सामान्य नहीं थी। दीवारों के अंदर एक ऐसा निर्णय हुआ, जो मुगलकाल से चली आ रही रूढ़िवादी व्यवस्था को सीधी चुनौती थी। 

    हुआ कुछ यूं था कि वंचित समाज से आने वाले बाबू बेंदूर नाम के एक व्यक्ति, जिसने अनेकों परेशानियों का सामना करते हुए चौथी कक्षा पास की थी, उसकी जिला अदालत में क्लर्क के पद पर नियुक्ति हुई थी। और इसके पीछे थे, वकील कुडमुल रंगा राव। उन्होंने ही अपने प्रयासों से बाबू बेंदूर को नौकरी दिलवाई थी। 

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  • कैसे 1971 के गंगा ‘हाइजैक’ ने बांग्लादेश की आजादी पक्की की

    कैसे 1971 के गंगा ‘हाइजैक’ ने बांग्लादेश की आजादी पक्की की

    30 जनवरी, 1971 को दोपहर 1.05 बजे, इंडियन एयरलाइंस का एक विमान जिसका नाम ‘फोकर F27-100 फ्रेंडशिप’ था और जो ‘गंगा’ के नाम से मशहूर था, जिसमें 26 यात्री और 4 क्रू मेंबर थे, उसे दो कश्मीरी अलगाववादियों ने आसमान में ही हाईजैक कर लिया और उसे पाकिस्तान के लाहौर में इमरजेंसी लैंडिंग करने के लिए मजबूर किया गया। 

    लेकिन रुकिए। इसमें एक ट्विस्ट है, हालांकि इसे ‘हाईजैक’ कहा गया, लेकिन असल में यह हाईजैक नहीं था! यह 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में बांग्लादेश की आजादी पक्का करने के लिए भारत की एक सोची-समझी चाल थी। लेकिन यह पूरा डिप्लोमैटिक मामला, जैसा दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा था, कैसे सामने आया, यह हम आपको आज बताएंगे।

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  • कूका वरियाम सिंह और 65 नामधारी शहीद : गौ रक्षा और मालेरकोटला नरसंहार

    कूका वरियाम सिंह और 65 नामधारी शहीद : गौ रक्षा और मालेरकोटला नरसंहार

    भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में, 1857 के विद्रोह के 15 साल बाद, एक खूनी घटना हुई, जिसने ब्रिटिश राज का क्रूर चेहरा दुनिया के सामने ला दिया। यह कहानी उन 66 बहादुर नामधारी (कूका) सिखों की है, जो जनवरी 1872 में शहीद हुए थे। उन्होंने निश्चित मौत का सामना करते हुए भी ‘गौ रक्षा’ के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। हालांकि, आज भी कई सवाल उठते हैं, इतिहास में ‘मालेरकोटला नरसंहार’ के नाम से बदनाम इस घटना के ये 66 शहीद आखिर कौन थे? वे किस बड़े आंदोलन का हिस्सा थे, और उन्हें इतनी बेरहमी से क्यों मारा गया?

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  • हेराका क्वीन : कैसे एक युवा रानी गाइदिन्ल्यू ने ईसाई मिशनरियों के खिलाफ नागा विरासत की रक्षा की

    हेराका क्वीन : कैसे एक युवा रानी गाइदिन्ल्यू ने ईसाई मिशनरियों के खिलाफ नागा विरासत की रक्षा की

    13 साल की छोटी सी उम्र में, रानी गाइदिन्ल्यू पॉलिटिकल पावर के लिए नहीं, बल्कि ईसाई मिशनरियों के खिलाफ अपने लोगों के जिंदा रहने की लड़ाई में उतरीं, इस आंदोलन का नाम था, हेराका मूवमेंट।

    26 जनवरी, 1915 को मणिपुर के लोंगकाओ गांव में जन्मी रानी ने देखा कि कैसे ईसाई मिशनरियों ने तेजी से नागा कबीलों का धर्म बदलना शुरू कर दिया, उनके पुरखों के विश्वासों को कमजोर किया और समुदायों को तोड़ दिया।

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  • प्रतिभाशाली हिंदू से बहिष्कृत ईसाई तक : मधुसूदन दत्त की यात्रा

    प्रतिभाशाली हिंदू से बहिष्कृत ईसाई तक : मधुसूदन दत्त की यात्रा

    फरवरी 1843 में, सारा कलकत्ता तब हिल गया था, जब माइकल मधुसूदन दत्त, जो उस समय हिंदू कॉलेज के एक होशियार, मशहूर और स्टार स्टूडेंट माने जाते थे, अचानक ही कैंपस से गायब हो गए थे। फिर वह बैप्टाइज होने के लिए ओल्ड मिशन चर्च में मिले।

    उनका धर्म बदलना एक सनसनीखेज मुद्दा बन गया था क्योंकि कंजर्वेटिव यानी परंपरावादी समाज के लिए, यह एक प्रकार की बगावत थी। हां, खुद को प्रतिशील मानने वाले लोगों के लिए, यह एक नई वेस्टर्न-एजुकेटेड पीढ़ी की चाहत की निशानी थी।

    फिर भी, असली कहानी, जो उस समय के लिखे हुए पत्रों और चर्च के सबूतों में दर्ज है, एक ऐसे हिंदू नौजवान को दिखाती है, जो बड़ी उम्मीदों के साथ ईसाई धर्म में गया था, लेकिन बाद में उसने महसूस किया कि बैप्टाइज करने के बाद यानी धर्म परिवर्तन के बाद, चर्च उसे वह सपोर्ट नहीं दे रहा है, जिसकी उसने उम्मीद की थी।

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