प्रतिभाशाली हिंदू से बहिष्कृत ईसाई तक : मधुसूदन दत्त की यात्रा

माइकल मधुसूदन दत्त

फरवरी 1843 में, सारा कलकत्ता तब हिल गया था, जब माइकल मधुसूदन दत्त, जो उस समय हिंदू कॉलेज के एक होशियार, मशहूर और स्टार स्टूडेंट माने जाते थे, अचानक ही कैंपस से गायब हो गए थे। फिर वह बैप्टाइज होने के लिए ओल्ड मिशन चर्च में मिले।

उनका धर्म बदलना एक सनसनीखेज मुद्दा बन गया था क्योंकि कंजर्वेटिव यानी परंपरावादी समाज के लिए, यह एक प्रकार की बगावत थी। हां, खुद को प्रतिशील मानने वाले लोगों के लिए, यह एक नई वेस्टर्न-एजुकेटेड पीढ़ी की चाहत की निशानी थी।

फिर भी, असली कहानी, जो उस समय के लिखे हुए पत्रों और चर्च के सबूतों में दर्ज है, एक ऐसे हिंदू नौजवान को दिखाती है, जो बड़ी उम्मीदों के साथ ईसाई धर्म में गया था, लेकिन बाद में उसने महसूस किया कि बैप्टाइज करने के बाद यानी धर्म परिवर्तन के बाद, चर्च उसे वह सपोर्ट नहीं दे रहा है, जिसकी उसने उम्मीद की थी।

माइकल मधुसूदन दत्त, इमेज सोर्स  newindianexpress

मधुसूदन की अपनी लिखी बातों से पता चलता है कि उनका धर्म बदलना आध्यात्मिक फैसला नहीं था, बल्कि यह आजादी और मौका पाने की एक कोशिश मात्र थी। अपने लिखे उन खतों में, जो बाद में छपे, वह बार-बार इंग्लैंड पहुंचने की अपनी गहरी इच्छा बताते हैं, “मुझे या तो इंग्लैंड में रहना है या फिर वहां रहना ही बंद कर देना है।” (पेज 23)।

रेव. के. एम. बनर्जी, जिन्होंने बैप्टिजम से पहले उनका इंटरव्यू लिया था, इस बात की पुष्टि करते हैं और कहते हैं कि मधुसूदन की ईसाई बनने की इच्छा इंग्लैंड जाने की उनकी इच्छा से ‘ज्यादा नहीं थी’ (पेज 24–25)। उनके लिए धर्म बदलना, परिवार के सख्त नियंत्रण से निकलने का एक रास्ता भर था, जिसमें एक अनचाही हिंदू शादी भी शामिल थी जिससे उन्हें ‘डर’ लगता था। (पेज 23)।

चर्च, मधुसूदन को अपने धर्म में लाने के लिए बहुत बेचैन था। चर्च उन्हें अपने धर्म में लाने के लिए आगे बढ़ने को बहुत उत्सुक लग रहा था। आर्कडीकन डीलट्री ने ओल्ड मिशन चर्च में उस समय का सबसे प्रसिद्ध बैप्टिजम करवाया और लोगों के गुस्से की आशंका में चर्च के बाहर हथियारबंद गार्ड तैनात थे (पेज 21)। लोगों ने मधुसूदन का लिखा एक भजन भी गाया (पेज 21)। इसके बाद रेव. मॉर्टन ने धर्म बदलने के बचाव में एक पैम्फलेट छापा (पेज 21–22)।

कुछ समय के लिए, चर्च ने मधुसूदन को लोगों के गुस्से से बचाने के लिए पनाह दी, पहले डीलट्री के घर में, फिर रेव. वेटिकन के पास और बाद में रेव. थॉमस स्मिथ के पास, जिन्होंने उन्हें शेक्सपियर पढ़ाया (पेज 25)। इन सब बातों से मधुसूदन का यह यकीन और पक्का हो गया कि वह एक ऐसे नए समुदाय में आ गए हैं, जो उन्हें प्रोत्साहन देगा।

लेकिन चर्च का शुरुआती प्यार जल्दी ही समाप्त हो गया। बिशप कॉलेज में, उन्हें बिना किसी पादरी की ट्रेनिंग या पैसे की मदद के, सिर्फ एक आम छात्र के तौर पर प्रवेश मिला (पेज 25)। धर्म परिवर्तन के बाद भी उन्हें बहुत जल्द ही नस्ल के आधार पर ईसाई धर्म में भेदभाव का सामना करना पड़ा। बिशप कॉलेज में यूरोपियन लोगों को कपड़े पहनने और शराब समेत, खाने-पीने में खास अधिकार दिए गए, जबकि भारतीय स्टूडेंट्स को ये अधिकार नहीं दिए गए और मधुसूदन को भारतीय यानी हिंदुओं की श्रेणी में गिना गया। (पेज 25–26)। मधुसूदन के विरोध के बाद ही कॉलेज ने अपनी पॉलिसी में बदलाव किए। पर अब तक मधुसूदन के सपने टूटने लगे थे। जिस ईसाई धर्म में उन्होंने बराबरी की कल्पना की थी, वह असल में मौजूद था ही नहीं।

पैसे यानी आर्थिक मामले में भी, मधुसूदन को अकेला छोड़ दिया गया था। धर्म बदलने के बाद, उनके नाराज पिता ने उन्हें धन देना बंद कर दिया, फिर भी चर्च ने उनकी मदद के लिए कोई कदम नहीं उठाया। पत्र में एक जगह साफ लिखा है, “उन्हें किसी भी सोर्स से कोई मदद नहीं मिली।” (पेज 26)। रोजी-रोटी का कोई जरिया न होने के कारण, उन्हें ‘अपनी किस्मत आजमाने के लिए’ आखिरकार कलकत्ता छोड़कर मद्रास जाना पड़ा (पेज 27)। जिस चर्च ने उनके बैप्टिजम का सपोर्ट किया था, उसी चर्च ने जब मधुसूदन को गरीबी का सामना करना पड़ा, तो उसे किसी प्रकार की सहायता नही दी, कोई सहारा नहीं दिया, जिससे उन्हें अकेले ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

उम्मीद और असलियत के बीच के इस फर्क ने उनकी बाकी जिंदगी को कठिन बनाया। स्टार हिंदू कॉलेज का वह स्टूडेंट मधुसूदन, जो मानते थे कि ईसाई धर्म अपनाने से इज्जत, खुशहाली और यूरोप में मौके मिलेंगे, वह यह सब पाने के बजाय बहुत मुश्किलों में डूब गए।

मधुसूदन अपनी सोच के हिसाब से एक जबरदस्ती की हिंदू शादी से तो बच निकले, लेकिन उन्होंने मद्रास में ईसाई लड़की से शादी की, चार बच्चों के पिता बने और बढ़ते खर्चों का बोझ उठाया (पेज 27–28)।

बाद में मधुसूदन लंदन तो पहुंचे, जहां उन्होंने अपना वह सपना पूरा किया, जो कुछ हद तक उनके धर्म बदलने की वजह बनी थी, पर  अपनी कमाई बर्बाद करने, कर्ज लेने और मुश्किल हालातों में भारत लौटने के लिए वह बाध्य हुए (पेज 28–29)।

कोई यह सोचे बिना नहीं रह सकता कि अगर मधुसूदन हिंदू रहते, तो उनकी जिंदगी कितनी अलग होती, परिवार का सपोर्ट, बंगाल के इंटेलेक्चुअल सर्कल का सम्मान और उस नस्लीय, इंस्टीट्यूशनल और पैसे की अनदेखी से बचे रहते, जिसने उनकी धर्म बदलने वाली जिंदगी पर छाया डाली थी।

मधुसूदन का सफर बंगाल रेनेसां की सबसे दिल को छूने वाली कहानियों में से एक है, एक जीनियस जिन्होंने एक उम्मीद के साथ एक नया धर्म अपनाया, लेकिन उन्होंने बाद में महसूस किया कि चर्च ने उन्हें बिना किसी सपोर्ट के छोड़ दिया और धर्म बदलने के नतीजे उन्हें उस जिंदगी से कहीं ज्यादा परेशान करते रहे, जो उन्होंने पीछे छोड़ी थी।