महान योद्धा ही नहीं, महिला सशक्तिकरण के भी नायक थे मल्हारराव होल्कर : जानिए इस पहलू से जुड़ी महिला अधिकार की प्रेरक कहानी

मल्हारराव होल्कर

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भारतीय इतिहास में मल्हारराव होल्कर को एक महान मराठा सेनानायक और होल्कर वंश के प्रवर्तक के रूप में याद किया जाता है। 18वीं शताब्दी में जब मराठा साम्राज्य उत्तर और मध्य भारत में अपनी शक्ति का विस्तार कर रहा था, तब उन्होंने अपनी वीरता, सैन्य रणनीति और दूरदर्शिता से इस विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

लेकिन मल्हारराव होल्कर की कहानी केवल युद्धों और विजय की कहानी नहीं है। यह उस सोच की कहानी भी है, जिसने उस दौर में महिलाओं की क्षमता और अधिकारों को पहचाना, जब समाज में उन्हें सार्वजनिक जीवन से लगभग दूर रखा जाता था। तो आइए, जानते हैं मल्हारराव होल्कर के उस पहलू को भी, जो महिला सशक्तिकरण से जुड़ा है।

अहिल्याबाई को सम्मान और सत्ता 

मल्हारराव होल्कर के जीवन की एक अत्यंत रोचक घटना उनकी बहू अहिल्याबाई से जुड़ी है। कहा जाता है कि एक बार उन्होंने एक मंदिर में एक छोटी लड़की को गरीबों की सेवा करते देखा। उसकी संवेदनशीलता और व्यवहार से प्रभावित होकर उन्होंने उसे अपने पुत्र खांडेराव की पत्नी बनाने का निर्णय लिया। यह लड़की आगे चलकर अहिल्याबाई होल्कर बनीं, जिन्हें भारतीय इतिहास की महानतम महिला शासकों में गिना जाता है। इस निर्णय में मल्हारराव की दूरदर्शिता स्पष्ट दिखाई देती है, क्योंकि उन्होंने सामाजिक प्रतिष्ठा से अधिक व्यक्तित्व और गुणों को महत्व दिया।

1754 में कुम्भेर के युद्ध के दौरान मल्हारराव के पुत्र खांडेराव की मृत्यु हो गई। उस समय समाज में विधवाओं के लिए सती होना एक सामान्य प्रथा मानी जाती थी। अहिल्याबाई भी सती होने की तैयारी कर चुकी थीं, लेकिन मल्हारराव होल्कर ने उन्हें रोक दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि राज्य और प्रजा के प्रति उनकी जिम्मेदारी अधिक महत्वपूर्ण है। यह निर्णय उस दौर के सामाजिक वातावरण के खिलाफ था, लेकिन इसी कदम ने आगे चलकर इतिहास की दिशा बदल दी।

महिलाओं को अधिकार और नेतृत्व देने का साहस

मल्हारराव होल्कर ने केवल अहिल्याबाई को सती होने से नहीं रोका, बल्कि उन्हें प्रशासन और शासन की शिक्षा भी दी। उन्होंने उन्हें न्याय, राजस्व और कूटनीति जैसे विषयों में प्रशिक्षित किया। साथ ही उन्होंने अपने सामाजिक समुदाय की उस परंपरा को भी आगे बढ़ाया, जिसमें परिवार की संपत्ति का एक चौथाई हिस्सा महिलाओं को दिया जाता था। मल्हारराव ने सत्ता और प्रतिष्ठा प्राप्त करने के बाद भी अपने समुदाय की इस परंपरा को नहीं तोड़ा, बल्कि इसे व्यवहार में उतारकर महिलाओं के आर्थिक अधिकार को सम्मान दिया।

जब मराठा शासन के अंतर्गत उन्हें मालवा का सूबेदार नियुक्त किया गया और पेशवा की ओर से उन्हें जागीर और आय का अधिकार प्राप्त हुआ, तब उन्होंने जनवरी 1734 में अपने समुदाय की परम्परा को निभाते हुए उस संपत्ति को व्यवस्थित रूप से दो भागों में विभाजित करने का निर्णय लिया। इस व्यवस्था में एक भाग ‘दौलत’ कहलाता था, जो राज्य की आय और प्रशासनिक खर्च से जुड़ा था, जबकि दूसरा भाग ‘खज्जी’ के नाम से जो महिलाओं की निजी संपत्ति के रूप में निर्धारित किया जाता था। मल्हारराव ने अपने परिवार में भी इस सिद्धांत का पालन किया और अपनी तत्कालीन तीनों पत्नियों गौतमबाई, द्वारकाबाई और बानाबाई को कुल संपत्ति का लगभग एक चौथाई हिस्सा सम्मानपूर्वक प्रदान किया।

इतना ही नहीं, उस समय के मराठा प्रशासन ने भी इस व्यवस्था को मान्यता दी। परिणामस्वरूप गौतमबाई होल्कर को मालवा क्षेत्र के महेश्वर, सांवेर और देपालपुर जैसे महत्वपूर्ण परगनों के साथ-साथ महाराष्ट्र के चांदवड़, अंबाद और कोरेगांव के कुछ गांवों से प्राप्त होने वाली आय का अधिकार मिला। इन क्षेत्रों से प्रतिवर्ष लगभग तीन लाख रुपए का राजस्व प्राप्त होता था, जो उस समय एक बड़ी राशि मानी जाती थी।

इसके बाद में जब उन्होंने हरकूबाई नामक राजपूत कुल की महिला से विवाह किया, तब भी उन्होंने उनके साथ वही व्यवहार किया, जो अपनी अन्य पत्नियों के साथ किया था। उन्हें भी वही अधिकार और सम्मान दिया गया, जो पहले से परिवार की महिलाओं को प्राप्त था। इस प्रकार मल्हारराव होल्कर ने न केवल शासन और युद्धनीति में अपनी प्रतिभा दिखाई, बल्कि अपने व्यक्तिगत जीवन में भी महिलाओं के आर्थिक अधिकारों को स्वीकार कर एक प्रगतिशील उदाहरण प्रस्तुत किया।

साधारण परिवार से मराठा साम्राज्य के सेनानायक तक

मल्हारराव होल्कर का जन्म 16 मार्च 1693 में महाराष्ट्र के पुणे जिले के होल गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम खांडुजी होलकर था और यह एक साधारण धनगर (चरवाहा) परिवार था। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने साहस और प्रतिभा के बल पर मराठा सेना में स्थान बनाया। धीरे-धीरे उनकी वीरता और रणनीतिक क्षमता ने उन्हें मराठा साम्राज्य के पेशवा बाजीराव के सबसे भरोसेमंद सेनानायकों में शामिल करा दिया। 

उत्तर भारत के अनेक सैन्य अभियानों में उनकी भूमिका निर्णायक रही और इसी दौरान उन्होंने मालवा क्षेत्र में मराठा सत्ता को मजबूत किया। आगे चलकर इंदौर को उन्होंने अपना प्रमुख प्रशासनिक केंद्र बनाया, जो बाद में होल्कर राज्य की राजधानी के रूप में विकसित हुआ। वे मालवा के पहले मराठा सूबेदार थे और उन्होंने लाहौर तक विजय प्राप्त कर मराठा झंडा फहराया था, 20 मई 1766 को आलमपुर में उनका निधन हुआ। 

निष्कर्ष

मल्हारराव होल्कर का जीवन यह दिखाता है कि एक महान योद्धा केवल युद्धभूमि में ही नहीं, बल्कि समाज की सोच बदलने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने महिलाओं की क्षमता को पहचाना और उन्हें नेतृत्व का अवसर दिया। उनके मार्गदर्शन में अहिल्याबाई होल्कर ने मालवा में एक आदर्श शासन स्थापित किया, जिसकी चर्चा आज भी होती है। इसलिए मल्हारराव होल्कर की कहानी केवल एक मराठा सेनानायक की गाथा नहीं, बल्कि यह इस बात का प्रमाण भी है कि दूरदर्शी नेतृत्व समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है। यही कारण है कि भारतीय इतिहास में उनका व्यक्तित्व वीरता, प्रगतिशील सोच और महिला सशक्तिकरण के अद्भुत संगम के रूप में याद किया जाता है।