मिजोरम शांति समझौता: 30 जून 1986 को हुई सबसे बड़ी शांति डील के पीछे एक अधिकारी की अनसुनी कहानी!

Mizoram Peace Accord

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पूर्वोत्तर भारत के राज्य मिजोरम में शांति लाने के लिए एक ऐसा समझौता हुआ, जिसे मिजोरम समझौता के नाम से जाना जाता है, लेकिन इस समझौते के पीछे एक ऐसे भारतीय अधिकारी का दिमाग था, जिसके बारे में लोग बहुत कम जानते हैं। इस अधिकारी का नाम था आरडी प्रधान, जो उस समय भारत के गृह सचिव थे। उन्होंने करीब 20 वर्षों से विद्रोह की आग में झुलस रहे मिजोरम राज्य में विद्रोह को शांत कराकर इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया। गृह सचिव आरडी  प्रधान की यह केवल  प्रशासनिक सफलता नहीं थी, बल्कि विश्वास, संवाद और संवेदनशीलता की भी गाथा थी, जिसने एक पूरे राज्य को हिंसा से निकालकर शांति की राह पर ला खड़ा किया।

मिजोरम विद्रोह की हिंसक शुरुआत होती है 28 फरवरी, 1966 से। रात 10:30 बजे, लालडेंगा के नेतृत्व में करीब एक हजार मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) के विद्रोहियों ने आइजोल के बीएसएफ और असम राइफल्स कैंप पर कब्जा कर लिया। टेलीफोन लाइन को क्षतिग्रस्त विद्रोहियों ने राजकोष और अन्य महत्वपूर्ण सरकारी भवनों पर कब्जा कर लिया। विद्रोहियों की स्पष्ट मांग थी मिजोरम को भारत से अलग करना। जिसके बाद भारतीय वायु सेना ने कार्रवाई कर इन विद्रोहियों को खदेड़ा।

हालांकि, विद्रोही उस समय तो हट गए लेकिन अब आगे की योजना पर जुट गए। MNF प्रमुख लालडेंगा ने भागकर तब के पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में शरण ली। वहीं से लालडेंगा विद्रोहियों को कंट्रोल करता था। मिजो विद्रोही गुरिल्ला रणनीति अपनाने हुए सुरक्षा जवानों को निशाना बनाते। एमएनएफ विद्रोही स्थानीय लोगों के साथ आसानी से घुलमिल जाते थे। जिससे सुरक्षा बलों के लिए जवाबी कार्रवाई करना कठिन हो रहा था। 4 जनवरी से 15 फरवरी 1967 के बीच 75 सुरक्षा बल कर्मियों की जान गई। वहीं 100 विद्रोही मार गिराए गए। विद्रोही लगातार हिंसा, विस्फोट और गोलीबारी कर रहे थे, जिससे भारत सरकार चिंतित थी। 

समय बीता। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बनें। उन्होंने मिजो विद्रोह शांत करने के लिए जनवरी 1985 में वरिष्ठ अधिकारी आरडी प्रधान को भारत का गृह सचिव नियुक्त किया। अब प्रधान के सामने 20 वर्षों से चले आ रहे मिजो विद्रोह को शांत कराने की जिम्मेदारी थी।

प्रधान ने इस चुनौती को एक सख्त प्रशासक की तरह नहीं, बल्कि एक धैर्यवान अधिकारी की तरह लिया। उन्होंने दिल्ली में बैठकर फैसले नहीं किए, बल्कि मिजोरम जाकर वहां की जमीन और लोगों को समझा। हवाई सर्वेक्षण किए। स्थानीय नेताओं और लोगों से मुलाकात की और मिजो समाज की सरलता, अपनापन और भावनात्मक जुड़ाव को महसूस किया। उन्हें यह समझ में आया कि यह संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि लोगों की पहचान और सम्मान से जुड़ा हुआ है। यही कारण था कि उन्होंने विद्रोहियों के आत्मसमर्पण की प्रक्रिया को भी बेहद संवेदनशील तरीके से तैयार किया, ताकि वर्षों तक हथियार उठाने वाले लोगों को अपमान का अनुभव न हो।

प्रधान ने लालडेंगा और उसके करीबियों से बातचीत की शुरुआत की। प्रधान की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू था, मानवीय दृष्टिकोण। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि मिजो नेशनल फ्रंट के विद्रोहियों से हथियार डलवाकर, उन्हें मुख्यधारा में शामिल किया जाए। इसका असर यह हुआ कि धीरे-धीरे लालडेंगा के करीबियों का मन विद्रोह से बदलने लगा। फरवरी 1986 तक लंदन में मौजूद लालडेंगा भी भारत लौटने को बेचैन हो रहा था। 

जून 1986 का समय इस पूरी प्रक्रिया का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। गृह सचिव आरडी प्रधान अपने सेवानिवृत्ति के करीब थे, लेकिन उन्होंने अपने शांति मिशन को अधूरा छोड़ने से इनकार कर दिया। प्रधान ने अंतिम क्षण तक प्रयास जारी रखे। उन्होंने लालडेंगा को यह विश्वास दिलाया कि यह समझौता केवल एक कागजी प्रक्रिया नहीं, बल्कि मिजोरम के भविष्य की कुंजी है। शांति समझौते से मिजोरम का विकास होगा। 

दूसरी ओर प्रधान ने पीएम राजीव गांधी को बताया कि लालडेंगा पर दबाव डालने का सही समय आ गया है। प्रधान के सुझाव पर 25 जून को राजीव गांधी ने मिजोरम के मुख्यमंत्री लालथानहवला को अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ दिल्ली बुलाया। इस बैठक में प्रधान ने विद्रोही गुट के प्रमुख लालडेंगा को भी वार्ता के लिए बुलाया। प्रधान की कूटनीति के चलते प्रधानमंत्री राजीव गांधी और लालडेंगा के बीच यह पहली मुलाकात थी। लेकिन कुछ कारणों से यह वार्ता सफल नहीं हो पाई।

हालांकि आरडी प्रधान ने हार नहीं मानी। वह दूसरी योजना पर जुट गए। आखिरकार 26 जून को आरडी प्रधान की कूटनीति सफल हुई। लालडेंगा उनसे मिलने के लिए खुद आया। उसने, गृह सचिव आरडी प्रधान से आइजोल और मिजोरम के अन्य स्थानों की समस्याओं का समाधान करने के लिए कहा। आरडी प्रधान तत्काल लालडेंगा को गृह मंत्री बूटा सिंह के पास ले गए और उन्होंने लंबित मुद्दों के शीघ्र समाधान का आश्वासन दिया। 27 जून को गृह सचिव आरडी प्रधान का जन्मदिन था। उन्होंने लालडेंगा को चाय पर अपने घर बुलाया। यहां हुई चर्चा के बाद लालडेंगा शांति समझौते पर राजी हुआ। लेकिन उसने अपने कानूनी सलाहकार स्वराज कौशल और सहयोगियों से बात करने के बाद अंतिम निर्णय लेने को कहा। अंततः प्रधान की कूटनीति सफल रही।

प्रधान एक ओर लालडेंगा के साथ वार्ता कर रहे थे, दूसरी ओर उसके करीबियों से भी उनकी कूटनीतिक वार्ता चल रही थी। यही कारण था, एमएनएफ 750 विद्रोहियों ने एक साथ हथियार डालकर मुख्यधारा में शामिल होने का निर्णय लिया। लालडेंगा आरडी प्रधान के कूटनीतिक जाल में फंस चुका था, अब उसके पास शांति समझौता करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था, यही कारण है कि 30 जून 1986 जिस दिन गृह सचिव आरजी प्रधान का रिटायमेंट था, उसी दिन लालडेंगा शांति समझौते के लिए पहुंचा। हालांकि तब तक आरडी प्रधान कार्यलय से निकल चुके थे। तकनीकि रूप से उनके अधिकार समाप्त हो चुके थे, क्योंकि वह अब रिटायर हो चुके थे। हालांकि प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कैबिनेट बैठक कर प्रधान के कार्यकाल को बढ़ाने का निर्णय लिया। जिसके बाद रात 9:30 बजे इस शांति समझौते पर हस्ताक्षर हुए और मिजोरम में एक बार फिर से शांति लौटी।

तत्कालीन गृह सचिव आरडी प्रधान और MNF प्रमुख लालडेंगा मिजोरम शांति समझौते पर हस्ताक्षर  करते हुए (30 जून 1986), इमेज सोर्स- Thebetter india 

हालांकि, इस शांति को लेकर पहल दशकों पहले से चल रही थी। भारत सरकार ने जहां एक ओर कूटनीतिक तौर पर विद्रोह को दबाने के लिए समाधान निकालने के लिए प्रशासनिक आधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी थी, वहीं अंदरखाने से काम करने के लिए खुफिया एजेंसियों को भी लगाया था। जिसकी जिम्मेदारी अजीत डोभाल के हाथों में थी। उन्होंने 1972 से 1974  तक मिजोरम में रहते हुए, विद्रोह का नेतृत्व कर रहे लालडेंगा के 6 प्रमुख साथियों को शांति समझौते के लिए मना लिया था। मिजोरम शांति समझौता के लिए, जहां आरडी प्रधान ने कूटनीतिक तौर पर समाधान  निकाला। वहीं, अजीत डोभाल ने खुफिया एजेंट के रूप में काम करते हुए विद्रोहियों में फूट डालकर विद्रोह को समाप्त करने में बड़ी भूमिका निभाई।