16,000 फीट की ऊंचाई पर बर्फीली रात में एक 24 साल का युवा कैप्टन दुश्मन के भारी गोलीबारी के बीच चार बंकरों को एक-एक करके तबाह कर रहा था, उसके शरीर में कई गोलियां लग चुकी थीं। यह है, कैप्टन मनोज कुमार पांडे की वह अद्भुत बहादुरी का किस्सा, जिसने कारगिल युद्ध के बटालिक सेक्टर का रुख ही बदल दिया।
आइए, जानते हैं कि कारगिल युद्ध के दौरान खालूबार रिज (Khalubar Ridge) की लड़ाई में आखिर क्या-क्या हुआ था और कैसे एक जवान अधिकारी के बलिदान ने इस युद्ध में भारत का पलड़ा भारी कर दिया था।
कारगिल युद्ध की एक महत्वपूर्ण लड़ाई, बटालिक सेक्टर में लड़ी गई थी। इस क्षेत्र पर कंट्रोल के लिए खालूबार रिज सबसे खास जगह है। पाकिस्तान ने इस पर कब्जा कर लिया था और यह उनका सबसे महत्वपूर्ण और मजबूत केंद्र बना था क्योंकि खालूबार रिज के ठीक पीछे (उत्तर-पश्चिम दिशा में) पाकिस्तान अधिकृत जम्मू कश्मीर (PoJK) में मुंथो ढालो (Muntho Dhalo) इलाका था, जहां पाकिस्तानी सेना ने अपना मुख्य लॉजिस्टिक बेस और हेलीपैड बनाया हुआ था। खालूबार रिज से मुंथो ढालो के बीच की सीधी हवाई दूरी (Air-line distance) लगभग 8 से 10 किलोमीटर है। इसी हेलीपैड के जरिए दुश्मन के सैनिकों को हथियार, गोला-बारूद और रसद की लगातार सप्लाई मिल रही थी।
ऐसे में एक बात तो एकदम क्लियर थी कि पाकिस्तान की कमर तोड़ने के लिए खालूबार को जीतना जरूरी था और सेना का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना था कि दुश्मन लेह-बटालिक-कारगिल सड़क पर अपना दबदबा न बना पाए। यदि खालुबार पाकिस्तान के पास रहता तो वे इस महत्वपूर्ण आपूर्ति मार्ग पर निगरानी रख सकते थे और गोलाबारी कर सकते थे। यह सड़क पूरे कारगिल-लेह क्षेत्र में सैनिकों और आपूर्ति की आवाजाही के लिए महत्वपूर्ण थी। वहां दुश्मन की लगातार मौजूदगी बड़ा रणनीतिक खतरा बन सकती थी।।
मनोज पांडे की प्लाटून ने खालूबार की चोटियों को बाइपास कर पीछे से हमला किया, जिससे पाकिस्तानी सेना की कमर टूट गई थी। इस मिशन को पूरा करने के बाद भी गोरखाओं का असली लक्ष्य अभी बाकी था।
2/3 जुलाई 1999 की रात को 14 घंटे की लगातार चढ़ाई के बाद जब आखिरी चोटी यानी लक्ष्य करीब 400 मीटर की दूरी पर था, तभी अचानक दो दिशाओं से ताबड़तोड़ गोलियां बरसने लगीं। दुश्मन की तरफ से मशीन गन और मोर्टार की भारी बौछार शुरू हो गई, जिससे भारतीय जवान रुक गए। कैप्टन मनोज पांडे को एहसास हो गया कि खालूबार को वापस पाने का अब एकमात्र तरीका आमने-सामने की लड़ाई है और दुश्मन के बंकरों को एक-एक करके साफ करना होगा।
इस मुश्किल हालात में मनोज पांडे बिना कोई समय गंवाए अपनी प्लाटून को सही जगह पर लेकर आए। उन्होंने एक सेक्शन को दाईं ओर भेजा और खुद कुछ जवानों के साथ बाईं ओर हमला आरम्भ कर दिया। पहले बंकर पर पहुंचकर उन्होंने बहादुरी से हमला किया और दो पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया। इसके तुरंत बाद वे दूसरे बंकर की तरफ बढ़े और वहां भी दो दुश्मन सैनिकों को खत्म कर दिया। गोलीबारी बहुत तेज थी, लेकिन मनोज पांडे पीछे हटने को तैयार नहीं थे।
तीसरे बंकर की तरफ बढ़ते समय दुश्मन की गोली मनोज पांडे के कंधे और पैर में लग गई। खून बहने लगा फिर भी वे रुके नहीं, घायल हालत में भी वे अपने जवानों को हौसला देते रहे और तीसरे बंकर को भी सफलतापूर्वक जीत लिया। अब आगे था चौथा बंकर, जो भारतीय सेना की मुख्य टुकड़ी को आगे बढ़ने नहीं दे रहा था। मनोज पांडे जानते थे कि अगर इस बंकर को कब्जे में नहीं लिया गया, तो पूरा मिशन मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने आखिरी जोर लगाने का फैसला किया।
यह लड़ाई का सबसे रोमांचक और भावुक मोड़ था। गंभीर रूप से घायल होने पर भी कैप्टन मनोज पांडे चौथे बंकर के बहुत करीब पहुंच गए। उन्होंने सटीक निशाने से ग्रेनेड फेंका और उस बंकर को पूरी तरह नष्ट कर दिया। लेकिन ठीक उसी समय दुश्मन की मशीन गन से निकली गोली मनोज पांडे की टोपी को चीरती हुई उनके सिर में लग गई और 3 जुलाई 1999 को वह वीरगति को प्राप्त हुए। उनके इस बलिदान ने बाकी जवानों में नया जोश भर दिया। भारतीय सैनिकों ने और जोर लगाया और उसी दिन सुबह तक खालूबार रिज पर तिरंगा लहरा दिया गया।
खालूबार रिज की इस जीत का असर पूरे बटालिक सेक्टर पर पड़ा। जैसे ही यह ऊंचाई भारतीय सेना के कब्जे में आई, तो पाकिस्तान के सारे डिफेंसिव पोजिशन कमजोर पड़ गए। दुश्मन अपनी चौकियों को संभाल नहीं पाया और पीछे हटने लगा।
25 जून 1975 में उत्तर प्रदेश के सीतापुर में जन्मे कैप्टन मनोज पांडे को उनके अदम्य साहस, नेतृत्व और अंतिम सांस तक लड़ने की भावना के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र दिया गया। खालूबार की इस लड़ाई ने न सिर्फ कारगिल युद्ध का रुख बदला, बल्कि हमें याद दिलाया कि हमारे स्वतंत्रता और सुरक्षा का हर पल ऐसे वीर सपूतों के बलिदान पर टिका है।
बता दें कि पाकिस्तानी सेना ने भारत के कारगिल क्षेत्र में पड़ने वाले द्रास, बटालिक जैसे महत्वपूर्ण सेक्टर में खाली पड़ी भारतीय चौकियों पर कब्जा कर लिया था। 3 मई 1999 को इस घुसपैठ का पता चला। 25 मई को भारत सरकार ने वायुसेना के उपयोग को मंजूरी दी और इसके बाद ‘ऑपरेशन विजय’ शुरू किया। दो महीने के संघर्ष के बाद फिर से अपने क्षेत्र को मुक्त कराया गया और 26 जुलाई 1999 को युद्ध समाप्त हुआ।

