Nathu La Clashes 1967 : जब चीन ने बरसाईं गोलियां, तो सगत सिंह ने खुलवा दीं तोपें… नाथू ला में ऐसे टूटा चीन का घमंड

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Nathu La Clashes 1967 : अंग्रेजों को हराने के लिए हमेशा तलवारें ही नहीं उठाई गईं, एक धार्मिक उत्सव भी सबसे बड़ा हथियार बना था। स्वधीनता संग्राम के दौरान महाराष्ट्र में सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत भी, ऐसी ही एक क्रांतिकारी योजना थी। जिसके पीछे थे श्रीमंत भाऊसाहेब रंगारी (भाऊ लक्ष्मण जावले)। 

व्यवसायी भाऊसाहेब क्रांतिकारियों की मदद करने के लिए जाने जाते थे। इसीलिए उन्होंने गणेशोत्सव को केवल पूजा नहीं, बल्कि राष्ट्र जागरण का अभियान बना दिया। यह वह दूरदर्शी सोच थी, जिसने एक धार्मिक आयोजन को अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध सांस्कृतिक क्रांति और राष्ट्रीय एकता का सशक्त माध्यम बना दिया। पहली बार सार्वजनिक गणेशोत्सव का आयोजन करने वाले भाऊसाहेब रंगारी गणेश उत्सव को क्रांति का माध्यम कैसे बनाया, यह कहानी काफी रोचक है।

1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने पूरे देश में दमन की नीति अपनाई। सार्वजनिक सभाओं और राजनीतिक गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी जाने लगी। ऐसे समय में पुणे के शालुकर बोल क्षेत्र में रहने वाले भाऊसाहेब रंगारी, राष्ट्र की दशा को लेकर चिंतित थे। वे पेशे से प्रसिद्ध राजचिकित्सक थे, लेकिन उनका मन भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्पित था। उनका विश्वास था कि जाति, वर्ग और भेदभाव में बंटा समाज कभी विदेशी शासन को चुनौती नहीं दे सकता। इसलिए उन्होंने ऐसा माध्यम खोजा, जो धार्मिक भी हो, सामाजिक भी और अंग्रेजों के लिए संदेह का विषय भी न बने। उनकी यही दूरदर्शी सोच भारतीय इतिहास की एक नई शुरुआत बनने वाली थी।

सन् 1892 में उनके घनिष्ठ मित्र सरदार कृष्णजी काशीनाथ उर्फ नानासाहेब खासगीवाले ग्वालियर से लौटे। श्रीमंत भाऊसाहेब रंगारी उनसे मिलने गए थे। यहां  नानासाहेब खासगीवाले ने उन्हें ग्वालियर राजदरबार में आयोजित होने वाले गणेश उत्सव के बारे में जानकारी दी। इसके बाद भाऊसाहेब ने मन में वर्षों से पल रहे क्रांतिकारी विचार को आकार देने के लिए, गणेश उत्सव को माध्यम बनाया। उन्होंने अपने आवास पर एक बैठक बुलाई। जिसमें उनके मित्र महर्षि अन्नासाहेब पटवर्धन, गणपतराव घोटावड़ेकर, दगडूशेठ हलवाई, लखुशेठ दंताले सहित 11 प्रमुख लोग उपस्थित हुए।

इसी बैठक में ऐतिहासिक निर्णय लिया गया कि गणेशोत्सव अब राजदरबारों और निजी घरों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे समाज का उत्सव बनेगा। इन्हीं विचारों के तहत भाऊसाहेब रंगारी ने 1892 को अनंत चतुर्दशी के दिन पुणे में तीन स्थानों पर सार्वजनिक गणपति पंडाल स्थापित कराए। इस दौरान पुणे शहर में तीन स्थानों पर सार्वजनिक गणेश पूजा शोभायात्रा निकाली गई। पहली बार निकाली गई शोभा यात्रा में हिंदू समाज के हर वर्ग के लोग शामिल हुए। यह यात्रा सामाजिक समानता और समाज की एकजुटता का बड़ा माध्यम बनीं।

क्योंकि भाऊसाहेब रंगारी का उद्देश्य सिर्फ गणेश पूजा तक ही सीमित नहीं था। उन्होंने पूजा पंडाल में गणेशजी की ऐसी अनूठी प्रतिमा स्थापित करवाई, जिसमें भगवान गणेश एक राक्षस का वध करते हुए दिखाई देते थे। लकड़ी, भूसे और मिट्टी से बनी, पर्यावरण के अनुकूल प्रतिमाएं  पारंपरिक गणेश प्रतिमाओं से बिल्कुल अलग थीं। यह बुराई पर अच्छाई की विजय के साथ-साथ विदेशी दासता के अंत का भी प्रतीक थी। गणेशोत्सव के मंच से समाज में राष्ट्रीय चेतना, स्वदेशी, सामाजिक समरसता और स्वतंत्रता का संदेश दिया जाने लगा। अंग्रेज जहां राजनीतिक सभाओं पर प्रतिबंध लगाते थे, वहीं धार्मिक उत्सव के नाम पर हजारों लोग एकत्र होकर देश और समाज के भविष्य पर विचार करने लगे। यही भाऊसाहेब की सबसे बड़ी क्रांतिकारी रणनीति थी।

भाऊसाहेब रंगारी की इस पहल का प्रभाव बहुत तेजी से दिखाई दिया। 26 सितंबर 1893 को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने अपने समाचार पत्र केसरी में इस नई परंपरा की प्रशंसा करते हुए लिखा कि “हमें उन सज्जनों का धन्यवाद करना चाहिए जिन्होंने इस वर्ष यह कार्य किया है।” 

अगले वर्ष 1894 में तिलक ने स्वयं विंचुरकर वाडा में सार्वजनिक गणपति स्थापित किया और अपने लेखन तथा जनसंपर्क के माध्यम से इस आंदोलन को पूरे महाराष्ट्र और फिर देशभर तक पहुंचाया। बाद के वर्षों में यही सार्वजनिक गणेशोत्सव अनेक क्रांतिकारियों, समाज सुधारकों और राष्ट्रवादी नेताओं का प्रभावशाली मंच बना, जहां से स्वतंत्रता का संदेश जन-जन तक पहुंचा।

आज सार्वजनिक गणेशोत्सव भारत की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है, लेकिन इसकी शुरुआत के पीछे छिपा राष्ट्रवादी उद्देश्य उतना ही महत्वपूर्ण है। श्रीमंत भाऊसाहेब रंगारी ने यह सिद्ध कर दिया कि समाज को संगठित करने के लिए संस्कृति सबसे प्रभावी शक्ति बन सकती है। उन्होंने गणेशोत्सव को घरों की चौखट से निकालकर राष्ट्र जागरण का उत्सव बनाया, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी। 

इसलिए सार्वजनिक गणेशोत्सव के इतिहास में श्रीमंत भाऊसाहेब रंगारी का योगदान केवल एक परंपरा की शुरुआत भर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सामाजिक एकता की ऐसी क्रांतिकारी पहल है, जिसकी गूंज आज भी हर गणेशोत्सव में सुनाई देती है।