पोखरण II, चांदीपुर और क्रिकेट: भारत के परमाणु परीक्षण कैसे बने अमेरिका की ‘दशक की सबसे बड़ी खुफिया विफलता’

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“आज 15:45 बजे, भारत ने पोखरण रेंज में तीन भूमिगत परमाणु परीक्षण किए”: यह बयान पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 11 मई, 1998 को तब दिया था, जब भारत ने राजस्थान के थार रेगिस्तान में “ऑपरेशन शक्ति” कोड-नाम से परमाणु परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे कर लिए थे। कुछ ही घंटों में, दुनिया को एहसास हो गया कि भारत ने बेहद गोपनीयता के साथ कुछ असाधारण कर दिखाया है, बिना दुनिया के सबसे आधुनिक निगरानी तंत्रों की पकड़ में आए, जिसके चलते इसे “दशक की सबसे बड़ी खुफिया विफलता” कहा जाने लगा। 

इस घटना से दुनिया को जो जोरदार झटका लगा, वह हमें यह सवाल पूछने पर मजबूर करता है, भारत ने परमाणु परीक्षण जैसी इतनी बड़ी घटना को अंतरिक्ष से निगरानी कर रहे उपग्रहों से कैसे छिपाए रखा? आज, 28 साल बाद, जब हम ‘ऑपरेशन शक्ति’ को फिर से याद करते हैं, तो हम आपके लिए इस सवाल का जवाब लेकर आए हैं कि भारत ने इतनी पूर्ण गोपनीयता के साथ इन परीक्षणों की तैयारी और उनका फलित कैसे किया। यह सब भ्रमित करने की दो असाधारण परतों के जरिए संभव हो पाया, जिनमें से एक सैकड़ों किलोमीटर दूर ओडिशा के चांदीपुर में थी, और दूसरी ठीक थार रेगिस्तान के बीचों-बीच।


पोखरण II, परमाणु परीक्षण विस्फोट। छवि स्रोत : The Better India 

चांदीपुर डायवर्जन और थार में क्रिकेट

जब भारत पोखरण में परमाणु परीक्षणों की तैयारी कर रहा था, तो उसे इस बात की पूरी जानकारी थी कि अमेरिका अपनी ‘आसमान में मौजूद आंखों’ के जरिए उस पर लगातार नजर रखे हुए है—जिन पर एक अरब डॉलर से भी ज्यादा का खर्च आया था, यानी अमेरिकी जासूसी उपग्रह। इसलिए, पूरी तरह से गोपनीयता बनाए रखने की सबसे अहम योजनाओं में से एक यह थी कि दुनिया का ध्यान, खास तौर पर अमेरिका का ध्यान, कहीं और भटका दिया जाए। भारत ने ऐसा ओडिशा के चांदीपुर में स्थित मिसाइल परीक्षण केंद्र की ओर ध्यान मोड़कर किया।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने त्रिशूल सतह-से-हवा में मार करने वाली मिसाइल के 37वें परीक्षण के लिए अपनी सामान्य तैयारियां शुरू कर दीं। लेकिन इन तैयारियों के बीच कुछ असामान्य घटना घटी। परीक्षण स्थल पर जरूरत से ज्यादा उपकरण पहुंचाए गए। इनमें से कुछ उपकरण तो अग्नि मध्यम-दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल को लॉन्च करने के लिए इस्तेमाल होने वाले बुनियादी ढांचे जैसे ही दिख रहे थे। 

यह चाल कामयाब रही। विदेशी खुफिया एजेंसियों को इससे यह लगा कि कोई बड़ा मिसाइल लॉन्च होने वाला है। अमेरिकी उपग्रहों और निगरानी प्रणालियों ने अपना ध्यान चांदीपुर पर केंद्रित कर दिया, जबकि कोको द्वीप समूह पर स्थित चीनी सिग्नल निगरानी सुविधा कथित तौर पर अग्नि मिसाइल के संभावित लॉन्च की आशंका में सक्रिय हो गई।

इस बीच, पोखरण टेस्ट साइट पर एक बिल्कुल अलग रणनीति पर काम चल रहा था। थार रेगिस्तान की झुलसा देने वाली गरमी में, जहां तापमान अक्सर 50°C से ऊपर चला जाता था, जब सैनिक और वैज्ञानिक चुपचाप परमाणु परीक्षण के लिए गड्ढे तैयार करने में जुटे थे। उसी समय तब कुछ और भी किया जा रहा था। इसमें एक ऐसा खेल शामिल था, जिसे लाखों भारतीय पसंद करते हैं, वह है क्रिकेट। कर्नल गोपाल कौशिक के नेतृत्व में भारतीय सेना की 58वीं इंजीनियर रेजिमेंट और पोखरण में तैनात सैनिक नियमित रूप से उस जगह पर क्रिकेट मैच आयोजित करते थे। ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ के साथ एक खास इंटरव्यू में, कौशिक ने बताया, “हम जो काम करते थे, उनमें से एक था, नियमित रूप से क्रिकेट खेलना; हालांकि यह फुटबॉल या हॉकी की तरह सैनिकों का खेल नहीं है। ऐसा सिर्फ लोगों को मैच देखने के लिए आकर्षित करने और सैटेलाइट्स को गुमराह करने के लिए किया जाता था, ताकि उन्हें लगे कि पोखरण में कुछ भी खास नहीं हो रहा है।”


पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के साथ पोखरण में। इमेज सोर्स : X/@igautamshah

ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और अन्य परमाणु वैज्ञानिक, वेश बदलकर पोखरण टेस्ट साइट पर। इमेज सोर्स : X/@Dev_Fadnavis

जब कुछ सैनिक दुनिया की नजरों को धोखा देने के लिए क्रिकेट खेल रहे थे, तब लगभग 100 वैज्ञानिक, जिनमें उस समय के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के प्रमुख ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, परमाणु आयोग के पूर्व अध्यक्ष आर. चिदंबरम और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) के पूर्व प्रमुख अनिल काकोडकर जैसी हस्तियां शामिल थीं, चुपचाप सुरंगें खुदवाने, केबल बिछावने और जमीन के नीचे बने टेस्ट चैंबर तैयार करवाने का काम कर रहे थे। इस तरह, जब सैटेलाइट रेगिस्तान पर नजर रखे हुए थे, तब उन्हें रेत में सिर्फ क्रिकेट खेलते हुए सैनिक ही दिखाई दे रहे थे।

D-Day और पोखरण II क्यों?

आखिरकार, वह पल आ ही गया। 11 मई, 1998 को दोपहर 3:45 बजे, बादलों से घिरे आसमान के नीचे और रेगिस्तान की हवाओं के शांत होने के बाद, भारत ने तीन भूमिगत परमाणु परीक्षण किए। जिन उपकरणों में विस्फोट किया गया, वे थे: शक्ति I (थर्मोन्यूक्लियर उपकरण), शक्ति II (फिशन उपकरण), और शक्ति III (सब-किलोटन उपकरण)। उसी दिन बाद में, प्रधानमंत्री वाजपेयी ने राष्ट्र के सामने यह ऐतिहासिक घोषणा की। 13 मई को दो और भूमिगत परमाणु परीक्षण किए गए, जिसके साथ ही पांच परमाणु परीक्षणों की नियोजित श्रृंखला पूरी हो गई।

इन परीक्षणों के बाद, वाजपेयी ने संसद को संबोधित किया और इस मिशन के पीछे रहे वैज्ञानिकों और सैनिकों की सराहना की। भारत ने अपनी परमाणु नीति भी स्पष्ट की, जिसमें वाजपेयी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत ‘पहले इस्तेमाल नहीं’ (No-First Use) के सिद्धांत का पालन करेगा। प्रधानमंत्री वाजपेयी ने जोर देकर कहा था, “पहले इस्तेमाल नहीं। हमने यह भी कहा कि जिनके पास ये हथियार नहीं हैं, हम उनके खिलाफ इनका इस्तेमाल नहीं करेंगे।” उन्होंने दुनिया को स्पष्ट संकेत दिया कि भारत परमाणु हथियारों को आक्रमण के साधन के रूप में नहीं, बल्कि प्रतिरोधक क्षमता के रूप में देखता है।

1998 में किए गए परमाणु परीक्षण बहुत महत्वपूर्ण थे, खासकर 1990 के दशक में भारत जिस रणनीतिक माहौल का सामना कर रहा था, उसे देखते हुए। 1974 में भारत के पहले परमाणु परीक्षण के बाद, क्षेत्रीय सुरक्षा का समीकरण तेजी से बदलने लगा था। भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के निदेशक अनिल काकोडकर के अनुसार, इसके बाद के दशकों में चीन ने पाकिस्तान के साथ परमाणु तकनीक और सामग्री साझा करना शुरू कर दिया था। इसका मतलब था कि भारत को अपने पड़ोस में दो परमाणु-सशस्त्र विरोधियों का सामना करने की संभावना का खतरा बढ़ता जा रहा था, और इसलिए भारत ने एक विश्वसनीय परमाणु प्रतिरोधक क्षमता (nuclear deterrence) की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया।

इसी जरूरत के चलते परीक्षणों को पूरी तरह से गुप्त रखना जरूरी था, क्योंकि केवल तीन वर्ष पहले ही अमेरिका ने भारत के परमाणु परीक्षण करने की योजनाओं का पता लगा लिया था। 1995 में, जब भारत प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में परमाणु परीक्षणों की तैयारी कर रहा था, तब अमेरिकी खुफिया उपग्रहों ने पोखरण में पहले ही कुछ संदिग्ध गतिविधियों का पता लगा लिया था। हालांकि वे तस्वीरें साफ नहीं थीं, फिर भी इस खुलासे के बाद वाशिंगटन की ओर से भारत पर कूटनीतिक दबाव डाला गया और आखिरकार उन परीक्षणों को रद्द करना पड़ा। 1998 आते-आते भारतीय योजनाकारों को यह बात पूरी तरह साफ हो चुकी थी कि परीक्षणों की कोई भी जाहिर तैयारी विदेशी खुफिया एजेंसियों को तुरंत सतर्क कर देगी। इसलिए, इस बार यह अभियान तब तक पूरी तरह से गुप्त रहना जरूरी था, जब तक कि उन परमाणु उपकरणों में विस्फोट न हो जाए।

दुनिया भर की खुफिया एजेंसियों को लगा जबरदस्त झटका

अमेरिका की खुफिया एजेंसियों ने यह पता लगाने के लिए जांच शुरू की कि उनके निगरानी तंत्र (surveillance systems) आखिर कैसे नाकाम हो गए। यह झटका इतना गहरा था कि अमेरिकी सीनेटर रिचर्ड सी. शेल्बी, जो उस समय सीनेट इंटेलिजेंस कमेटी के अध्यक्ष थे, ने इसे ‘इस दशक की सबसे बड़ी खुफिया नाकामी’ करार दिया। वहीं, CIA के प्रमुख जॉर्ज टेनेट ने एडमिरल डेविड जेरेमिया के नेतृत्व में एक आंतरिक जांच का आदेश दिया, ताकि यह समझा जा सके कि भारतीय रेगिस्तान में परमाणु परीक्षणों की तैयारियां दुनिया की नजरों से छिपी कैसे रह गईं।

‘ऑपरेशन शक्ति’ महज परमाणु परीक्षणों की एक श्रृंखला से कहीं बढ़कर था। यह वैज्ञानिकों, सैनिकों और राजनीतिक नेतृत्व के बीच बेहतरीन तालमेल का एक बेमिसाल नमूना था। भारत दुनिया के सबसे संवेदनशील रणनीतिक अभियानों में से एक को अंजाम देने में कामयाब रहा और वह भी ठीक दुनिया भर की कड़ी निगरानी के बीच। 

और जब तक दुनिया को सच्चाई का पता चला, तब तक भारत परमाणु हथियारों से लैस देशों की कतार में शामिल हो चुका था।