हिमालय की गोद में बसा सिक्किम 1970 के दशक की शुरुआत में तेजी से अस्थिर हो रहा था। शांत हिमालयी राज्य अचानक जातीय तनाव, राजनीतिक अराजकता और बाहरी प्रभाव की चपेट में आ गया। सड़कों पर प्रदर्शनकारियों की भीड़ उमड़ रही थी, पुलिस स्टेशन कब्जे में लिए जा रहे थे, सरकारी दफ्तरों पर हमले हो रहे थे और राज्यव्यापी अशांति फैल रही थी।
इस बिगड़ते संकट के पीछे मुख्य भूमिका सिक्किम की अमेरिकी रानी होप कुक की थी। यह 1973 की घटना न सिर्फ सिक्किम राजशाही के अंत की कहानी थी, बल्कि एक अमेरिकी रानी के CIA कनेक्शन और भारत की खुफिया-सेना की संयुक्त सूझबूझ की भी मिसाल थी। आइए जानते हैं, सिक्किम के भारत में विलय की रोचक कहानी।
सिक्किम, जो 1950 के भारत-सिक्किम संधि के तहत भारत का रक्षित राज्य था, 1970 के दशक में जब इस राज्य के तेजी से हालात बिगड़ रहे थे तब उसकी कमान राज पाल्डेन थोंडुप नामग्याल चोग्याल के हाथों में थी और स्थिति के लिए जिम्मेदार थी, उनकी अमेरिकी पत्नी और सिक्किम की रानी होप कुक।
होप कुक की पाल्डेन थोंडुप नामग्याल से 1959 में दार्जिलिंग में मुलाकात हुई। 20 मार्च 1963 को दोनों ने शादी कर ली। बाद में 1965 में पाल्डेन थोंडुप नामग्याल राजा बने, तो होप कुक सिक्किम की रानी बनीं। लेकिन जल्द ही वह केवल महल की रानी नहीं रहीं, वह राजनीति की मास्टरमाइंड बन गईं।
रानी होप कुक ने विदेशी पत्रकारों को महल में आमंत्रित किया, इंटरव्यू दिए और सिक्किम को ‘भारत के दबाव से जूझता स्वतंत्र राष्ट्र’ के रूप में चित्रित किया। उन्होंने चोग्याल पर सिक्किम में भारत का प्रभाव खत्म करने और स्वतंत्रता की मांग तेज करने के लिए दबाव बनाया। दिल्ली में खुफिया अधिकारी उन्हें ‘जासूस रानी’ कहने लगे। उन पर अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए से संबंध रखने का गंभीर आरोप लगा। लेखक देवदत्त डी ने अपनी पुस्तक ‘अजित डोभाल : ऑन ए मिशन ’ में स्पष्ट लिखा है कि दिल्ली के खुफिया अधिकारियों को संदेह था कि होप कुक वाशिंगटन के प्रभाव के लिए एक माध्यम के रूप में काम कर रही थीं।
उस समय भारत-अमेरिका संबंध तनावपूर्ण थे। 1971 के बांग्लादेश युद्ध में अमेरिका पाकिस्तान के पक्ष में था। भारत को डर था कि होप कुक के जरिए सीआईए सिक्किम को चीन के खिलाफ बफर स्टेट बनाने की बजाय अमेरिकी हितों का अड्डा बना सकती है। रानी के बढ़ते अंतर्रराष्ट्रीय संपर्क और स्वतंत्रता के दावों ने सिक्किम की नेपाली बहुल जनसंख्या (कुल जनसंख्या का करीब 75%) को और भड़का दिया। वे पहले से ही भूटिया-लेपचा अभिजात वर्ग की जमींदारी प्रथा और चुनावी पक्षपात से पीड़ित थे। रानी के प्रभाव ने जातीय तनाव को चरम पर पहुंचा दिया।
1973 की शुरुआत में फरवरी के चुनावों में धांधली के आरोपों ने आग में घी डाल दिया। चोग्याल ने विपक्षी नेताओं को जेल भेज दिया। 2 अप्रैल को क्राउन प्रिंस तेनजिंग नामग्याल पर प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग का आदेश देने का आरोप लगा, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई। यह घटना पूरे सिक्किम में जंगल की आग की तरह फैल गई। प्रदर्शनकारी पुलिस स्टेशनों पर हमला करने लगे, सरकारी दफ्तरों पर कब्जा कर लिया गया और स्थानीय पुलिस भाग खड़ी हुई।
अब सड़कों पर ट्रक-जीपों की रेलगाड़ी थी। चोग्याल ने खुद इंदिरा गांधी को तार भेजकर सैन्य मदद मांगी। 1950 की भारत-सिक्किम संधि के तहत भारत रक्षा और विदेश नीति का जिम्मेदार था। वहीं प्रदर्शनकारियों ने भी इंदिरा गांधी से हस्तक्षेप की अपील की।
भारतीय सेना ने ब्रिगेडियर देपिंदर सिंह के नेतृत्व में 17 माउंटेन डिवीजन के सैनिकों को भेजा। सेना ने हथियारों का न्यूनतम इस्तेमाल करते हुए प्रदर्शनकारियों से संवाद स्थापित किया, उनकी मांगें (जमींदारी उन्मूलन, लोकतंत्र) सुनीं और लॉजिस्टिक मदद देकर उन्हें घर भेजा। चोग्याल की 200 सदस्यीय पैलेस गार्ड को शांतिपूर्वक निहत्था किया गया। 8 अप्रैल को चोग्याल ने प्रशासनिक नियंत्रण भारत को सौंपने वाला समझौता साइन किया। 15 अप्रैल तक शांति बहाल हो गई।
बता दें कि पर्दे के पीछे युवा खुफिया अधिकारी अजीत डोभाल ने सिक्किम में स्थानीय नेताओं से संपर्क बनाया, जनता की नब्ज टटोली और दिल्ली को रिपोर्ट भेजी कि विलय जनता की इच्छा है। इसी खुफिया काम ने होप कुक के प्रभाव को बेअसर किया। बढ़ते दबाव में रानी होप कुक 1973 में ही सिक्किम छोड़कर अमेरिका चली गईं और कभी वापस नहीं आईं।
इस संकट ने 1974 के चुनावों और 1975 के जनमत संग्रह का रास्ता खोला। 14 अप्रैल 1975 को 97.5% वोट से विलय का समर्थन हुआ। 16 मई 1975 को सिक्किम भारत का 22वां राज्य बन गया। राजशाही खत्म हुई, लोकतंत्र आया।
यह कहानी सिर्फ सिक्किम के विलय की नहीं है। यह कहानी एक अमेरिकी रानी के सीआईए कनेक्शन, जातीय तनाव और भारतीय सेना-खुफिया एजेंसियों की संयुक्त सूझबूझ की भी है। भारतीय सेना-खुफिया एजेंसियों ने बिना बड़े संघर्ष के रणनीतिक जीत हासिल की थी।

