सह्याद्रि की घाटियों में एक ऐसा नाम गूंजता है, जिसे इतिहास में प्रायः एक प्रखर योद्धा के रूप में स्मरण किया जाता है, वह नाम है, संभाजी महाराज का। अधिकांश लोग उन्हें महान छत्रपति और मुगलों के विरुद्ध लड़ने वाले वीर योद्धा के रूप में जानते हैं।
लेकिन इतिहास के पन्नों में संभाजी महाराज की एक और पहचान छिपी है, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। यह है एक महान संस्कृत विद्वान की। संभाजी महाराज केवल रणभूमि के योद्धा ही नहीं थे, बल्कि वह एक ‘संस्कृत योद्धा’ भी थे, ऐसे विद्वान शासक, जिनकी कलम उतनी ही प्रखर थी, जितनी कि उनकी तलवार। उन्होंने संस्कृत और ब्रज भाषा में महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे। जिसमें से ‘बुद्धभूषणम्’ उनकी प्रमुख रचना है। यह उनके गहन अध्ययन और बौद्धिक क्षमता का प्रमाण है। यही कारण है कि इतिहास में संभाजी महाराज को केवल वीरता से नहीं, बल्कि उनको विद्वता से भी समझने की आवश्यकता है।
संभाजी महाराज- इमेज सोर्स- Greatpeoples.in
संभाजी महाराज का जन्म 14 मई 1657 में हुआ था। वह महान मराठा सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज के ज्येष्ठ पुत्र थे। मात्र 2 वर्ष की आयु में उनकी माता साईबाई का निधन हो जाने के चलते, उनका भी पालन पोषण दादी जीजाबाई ने किया। माता जीजाबाई ने बचपन से ही उनका पालन-पोषण एक ऐसे वातावरण में किया, जहां युद्धकला और विद्या दोनों को समान महत्त्व दिया जाता था।
संभाजी महाराज ने संस्कृत, हिंदी, मराठी, ब्रज, कन्नड़, तेलगु, तमिल, मलयालम, बंगाली व विदेशी भाषाओं में अरबी, पुर्तगाली, इंग्लिश सहित 13 से अधिक भाषाओं का पूरा ज्ञान था। इन भाषाओं में संभाजी ने प्रवीणता प्राप्त की। उन्होंने कम उम्र में ही शास्त्रों, काव्य और राजनीति का गहन अध्ययन कर लिया था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उमाजी पंडित से होने के पश्चात उच्च शिक्षा कवि कलश, महाकवि भूषण, गागाभट्ट , केशव पंडित जैसे विद्वानों के मार्गदर्शन में हुई, जिन्होंने उन्हें धर्मशास्त्र, नीति और साहित्य का ज्ञान दिया। इसी अध्ययन ने आगे चलकर उन्हें एक ऐसे शासक के रूप में स्थापित किया, जो युद्ध कला के साथ विचार और ज्ञान की शक्ति में भी पारंगत थे।
संभाजी महाराज की विद्वत्ता का सबसे प्रमुख प्रमाण उनका संस्कृत ग्रंथ ‘बुद्धभूषणम्’ माना जाता है। यह ग्रंथ केवल साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि एक व्यापक ज्ञानकोश है, जिसमें शासन, नीति और संस्कृति के अनेक आयामों के बारे में उन्होंने लिखा है। बुद्धभूषणम् तीन भागों में विभाजित है, जिनमें काव्यशास्त्र, अलंकार, संगीत, पुराण और धनुर्विद्या जैसे विषयों का वर्णन किया गया है।
इसके साथ ही बुद्धभूषणम्’ ग्रंथ में एक आदर्श राजा के कर्तव्यों, राज्य संचालन की नीतियों, राजकोष के प्रबंधन और सेना के नेतृत्व से सम्बंधित महत्वपूर्ण सिद्धांत भी प्रस्तुत किए गए हैं। विशेष रूप से गुप्तचर व्यवस्था और प्रशासनिक संतुलन जैसे विषयों पर भी इसमें विस्तार से प्रकाश डाला गया है। यह ग्रंथ दर्शाता है कि संभाजी महाराज केवल एक वीर योद्धा ही नहीं, बल्कि एक गहन चिंतक, लेखक और कुशल शासक भी थे, जिन्होंने वीरता के साथ अपने राज्य की सुरक्षा और राज्य की सीमाओं के विस्तार के साथ कला, संस्कृति और शासन के संतुलित समन्वय पर भी बल दिया।
बुद्धभूषणम् के अलावा संभाजी ने ब्रज भाषा में नाइकाभेद, नखशिख और सातसतक जैसी प्रसिद्ध रचनाएं भी लिखीं। संभाजी महाराज का साहित्य प्रेम केवल एक लेखन तक सीमित नहीं था। वह साहित्य और काव्य के गहरे जानकार भी थे। उन्होंने काव्य रचनाएं भी कीं और विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ में भाग भी लिया। मराठा दरबार में विद्वानों को संरक्षण देना उनकी नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा था। यही कारण है कि उनके शासनकाल में संस्कृत विद्या और परंपरा को भी संरक्षण मिला। यह परंपरा उनके पिता शिवाजी महाराज से प्रेरित थी, जिन्होंने सनातन धर्म और संस्कृति के संरक्षण को राज्य नीति का हिस्सा बनाया था। इस प्रकार संभाजी महाराज ने युद्ध और विद्या दोनों परंपराओं को आगे बढ़ाया।
वास्तव में संभाजी महाराज उन दुर्लभ शासकों में से थे, जिन्होंने युद्ध के साथ-साथ ज्ञान की परंपरा को भी जीवित रखा। वह जानते थे कि राज्य केवल तलवार से नहीं, बल्कि नीति और बुद्धि से भी चलता है। ‘बुद्धभूषणम्’ इसी विचार का प्रतीक है, एक ऐसा ग्रंथ जो बताता है कि संभाजी महाराज केवल योद्धा नहीं, बल्कि एक विचारक शासक भी थे।
आज जब इतिहास को नए दृष्टिकोण से पढ़ा जा रहा है, तब संभाजी महाराज की इस ‘संस्कृत योद्धा’ वाली पहचान को सामने लाना आवश्यक है। उनकी तलवार ने मराठा साम्राज्य की रक्षा की, लेकिन उनकी कलम ने राज्य संचालन और नीति की एक बौद्धिक परंपरा को भी स्थापित किया। यही कारण है कि उन्हें केवल एक वीर योद्धा और शासक के रूप में देखना अधूरा होगा। वे उस परंपरा के प्रतिनिधि थे, जिसमें ज्ञान और शक्ति और कला साथ-साथ चलते हैं।
सह्याद्रि की पहाड़ियों में गूंजने वाला यह नाम हमें स्मरण दिलाता है कि इतिहास के महान योद्धा केवल रणभूमि में ही नहीं, बल्कि विचार और विद्या के क्षेत्र में भी अमर होते हैं। संभाजी महाराज इसी विरासत के प्रतीक हैं, एक ऐसे शासक, जिन्हें इतिहास को ‘संस्कृत योद्धा’ के रूप में भी उतनी ही श्रद्धा से समझना चाहिए।

