सुधारक या मुगल दूत? जब राजा राममोहन राय अकबर द्वितीय की पेंशन बढ़वाने इंग्लैंड गए

Raja Rammohan Roy

Written by

in

एक समाज सुधारक, जो सती प्रथा का कट्टर विरोधी है और भारतीय समाज को आधुनिक बनाने का सपना देखता है, अचानक दिल्ली के लाल किले से मुगल सम्राट का दूत बन जाता है। वह ब्रिटिश राजा के दरबार में जाकर न केवल सुधारों की बात करता है, बल्कि उन मुगलों की जेब भरने की गुहार लगाता है, जिनके पूर्वजों ने हिंदू मंदिर तोड़े और लाखों जानें लीं, साथ ही हिन्दू धर्म को पूरी तरह से मिटाने का प्रयास किया। 

यह कोई काल्पनिक कथा नहीं, बल्कि 1831 की सच्ची घटना है, जब राजा राममोहन राय इंग्लैंड पहुंचे। कैसे एक सुधारक मुगल हितैषी बना, और क्यों बना, यह आज भी विवाद पैदा करता है। 

कहानी 19वीं शताब्दी की शुरुआत से आरम्भ होती है, जब भारत ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के जाल में फंस चुका था। मुगल साम्राज्य, जो कभी एशिया का सबसे ताकतवर साम्राज्य था, अब दिल्ली के लाल किले तक सिमट गया था। सम्राट अकबर द्वितीय (शासनकाल 1806-1837) नाममात्र के शासक थे। उनके पास न सेना थी, न प्रजा, बस एक पुरानी वंशावली।

 1765 की इलाहाबाद संधि में ईस्ट इंडिया कंपनी ने वादा किया था कि बंगाल, बिहार और उड़ीसा की आय का हिस्सा (26 लाख रुपए सालाना पेंशन या पेशकश) मुगलों को मिलेगा। लेकिन कंपनी ने चालाकी से इसे घटाकर मात्र 12 लाख रुपए कर दिया। मुगल दरबार की हालत ऐसी हो गई कि खाने-पीने का इंतजाम भी मुश्किल था। 

इसी संकट में अकबर द्वितीय की नजर पड़ी, एक विद्वान राजा राममोहन राय पर। 1772 में पश्चिम बंगाल के राधानगर में जन्मे राममोहन संस्कृत, अरबी, फारसी और अंग्रेजी के ज्ञाता थे। वे खुद को एकेश्वरवादी कहते थे। मूर्तिपूजा, जातिवाद और अंधविश्वासों के कट्टर दुश्मन थे। 1828 में उन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की। सती प्रथा के खिलाफ उनका अभियान इतना जोरदार था कि 1829 में लॉर्ड बेंटिंक ने इसे प्रतिबंधित कर दिया। लेकिन अब, मुगल सम्राट ने उन्हें अपना दूत बनाने का फैसला किया, क्योंकि राममोहन अंग्रेजी और ब्रिटिश कानूनों के माहिर थे।

सन् 1830-31 के आसपास, जब अकबर द्वितीय ने राममोहन को औपचारिक रूप से अपना राजनयिक बनाया, तो उन्हें ‘राजा’ का खिताब दिया, यह मुगल दरबार की तरफ से था, ब्रिटिश सरकार ने इसे कभी मान्यता नहीं दी। मिशन साफ था, ‘इंग्लैंड जाओ, ब्रिटिश राजा जॉर्ज चतुर्थ और ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशकों के सामने अपनी  याचिका दोहराओ।‘

राममोहन को निर्देश मिला कि कंपनी पर संधि उल्लंघन का आरोप लगाओ कि खालसा भूमि (मुगल क्राउन लैंड्स) की आय बढ़ी है, लेकिन सम्राट को हिस्सा क्यों नहीं? 

राममोहन ने सहमति जताई, शायद इसलिए क्योंकि मुगलों ने उन्हें ‘राजा’ उपाधि दी थी और वे मुगलों को ‘एकेश्वरवादी’ परंपरा का हिस्सा मानते थे। 

लेकिन यह फैसला आश्चर्यजनक था। राममोहन जानते थे कि मुगल वंशावली हिंदू उत्पीड़न से सनी है। बाबर ने 1527 के पानीपत युद्ध के बाद मंदिर तोड़े, अकबर को सहिष्णु कहा जाता है लेकिन उनके बेटे जहांगीर ने सिख गुरु अर्जन देव की हत्या की। शाहजहां ने काशी विश्वनाथ और मथुरा के केशवदेव मंदिर ध्वस्त कर मस्जिदें बनवाईं। औरंगजेब तो सबसे क्रूर था, 80 से अधिक मंदिर तोड़े, जजिया दोबारा लगाया, लाखों हिंदुओं को जबरन मुसलमान बनाया। इतिहासकार के.एस. लाल जैसे विद्वान अनुमान लगाते हैं कि मुगल काल में 8 करोड़ हिंदू मारे गए, जो होलोकॉस्ट जैसी घटना थी। फिर भी, राममोहन ने मुगलों की सेवा चुनी, शायद उनकी धर्मनिरपेक्ष सोच ने अतीत को भुला दिया!

अप्रैल 1831 में राममोहन राय इंग्लैंड के लिवरपूल पहुंचे। उन्होंने तुरंत ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशकों से संपर्क किया। ब्रिटिश संसद की कमेटियों के सामने याचिकाएं पेश कीं, जहां उन्होंने तर्क दिया कि मुगल सम्राट को संधि के अनुसार 26 लाख रुपए ही मिलने चाहिए। उन्होंने मुगल दरबार की दयनीय हालत का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि सम्राट को इतनी कम पेंशन पर जीना पड़ रहा है कि उनका दरबार बंद होने की स्थिति में है। 

लेकिन कंपनी ने उन्हें पूर्ण दूत के रूप में मान्यता नहीं दी। गवर्नर-जनरल लॉर्ड एमहर्स्ट ने तो वृद्धि की सिफारिश ही ठुकरा दी। फिर भी, वे यूनिटेरियन चर्चों, राजनीतिज्ञों और बुद्धिजीवियों से मिलते रहे। इस दौरान उन्होंने सती प्रथा के कानून को मजबूत करने की भी पैरवी की, लेकिन मुख्य फोकस पेंशन पर था। यह दौर राममोहन के लिए दोहरी जद्दोजहद था, एक तरफ मुगल वफादारी, दूसरी तरफ अपनी सुधारक छवि बचाना।

1831 से 1833 तक राममोहन ब्रिस्टल और लंदन में डेरा डाले रहे। उनके लगातार प्रयास से कंपनी के निदेशकों पर दबाव बढ़ा। राममोहन की राजनयिक चालाकी काम आई, वे अंग्रेजी में धाराप्रवाह थे और ब्रिटिश कानूनी तर्कों का सहारा लेते थे। आखिरकार, फरवरी 1833 में उन्हें सफलता मिली। कंपनी ने पेंशन को 12 लाख से बढ़ाकर 15 लाख रुपए वार्षिक कर दिया। कुछ स्रोतों में इसे £30,000 (लगभग 3 लाख रुपए अतिरिक्त) की वृद्धि बताया गया। यह जीत मुगल दरबार के लिए सांस की राहत थी। अकबर द्वितीय को अब बेहतर जीवन स्तर मिल सका। 

लेकिन इस सफलता के पीछे राममोहन की विवादास्पद भूमिका छिपी थी। वह जानते थे कि अकबर द्वितीय के पूर्वजों जैसे औरंगजेब ने हिंदू महिलाओं पर अत्याचार किए, मंदिर लूटे। कहा जाता है कि ब्रह्म समाज में इस्लामी प्रभाव दिखाने वाले राममोहन ने कुरान की प्रशंसा की, जबकि हिंदू देवी-देवताओं को नकारा। आलोचक आज उन्हें ‘ब्रिटिश स्टूज’ कहते हैं, जो हिंदू रूढ़ियों को ‘अनैतिक’ ठहराकर ईसाई शिक्षा का प्रचार करते थे।

राजा राममोहन राय की यह घटना भारतीय इतिहास की जटिलता को दर्शाती है। एक ओर वह सती प्रथा के खिलाफ अभियान चलाने वाले, ब्रह्म समाज के संस्थापक और एकेश्वरवाद के प्रचारक थे, जो समाज को तर्कसंगत और आधुनिक बनाने की बात करते थे। दूसरी ओर, मुगल सम्राट अकबर द्वितीय के दूत बनकर उन्होंने ब्रिटिश सत्ता से पेंशन बढ़वाने का सफल प्रयास किया। 

राजा राममोहन राय की मृत्यु 1833 में इंग्लैंड में हो गई, और वे भारत नहीं लौट सके। यह कहानी हमें बताती है कि व्यक्ति की भूमिका बहुआयामी हो सकती है। उनकी विरासत आज भी बहस का विषय बनी हुई है, जो हमें अतीत को नए नजरिए से देखने की प्रेरणा देती है।