झारखंड की पहाड़ियों में एक ऐसी चीखें आज भी गूंजती हैं, जिन्हें इतिहास ने सुनकर भी अनसुना कर दिया। यह चीखें हैं डोम्बारी बुरु नरसंहार में मारे गए, 400 जनजातीय क्रांतिकारियों की। जब दमनकारी ब्रिटिश शासन ने निहत्थे जनजातीय समाज के पुरुषों, बच्चों और महिलाओं पर गोलियों की बरसात की थी। यह कोई साधारण घटना नहीं थी, बल्कि वह क्षण था, जब एक पूरी सभ्यता को कुचलने का प्रयास किया गया। इस विद्रोह की आत्मा थे, बिरसा मुंडा, जिनकी आवाज ‘अबुआ दिशुम अबुआ राज’ (अपना देश, अपना राज) बनकर जंगलों और पहाड़ों में गूंज उठी थी। लेकिन अंग्रेजों को यह इतना खतरनाक लगा कि उन्होंने इसे हमेशा के लिए दबाने का निर्णय लिया। डोम्बारी बुरु की पहाड़ी आज भी उस दिन की गवाही देती है, जब ब्रिटिश सत्ता ने इतिहास का सबसे क्रूरता पूर्ण भयावह रूप दिखाया था।
डोम्बारी बुरु नरसंहार, इमेज सोर्स- जी न्यूज
यह सच्ची कहानी है 19वीं सदी के अंत की। जब झारखंड के जंगलों में रहने वाले मुंडा जनजातीय समाज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था। अंग्रेजों ने उनकी जमीनें छीन ली थीं, उनकी परंपराओं को तोड़ दिया और उन्हें अपने ही घर में पराया बना दिया था। इसी अन्याय के खिलाफ बिरसा मुंडा ने ‘उलगुलान’ यानी महाविद्रोह का आह्वान किया। यह केवल एक आंदोलन नहीं था, बल्कि वह पुकार थी जो सदियों के शोषण के खिलाफ उठी थी। हजारों की संख्या में जनजातीय समाज के लोग, जिसमें बड़ी संख्या महिलाओं की भी थी, अब वह सभी बिरसा मुंडा के साथ थे। जिनके दम पर बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करते हुए कहा कि अब अंग्रेजों का राज खत्म होगा और अपना राज स्थापित होगा।
सन् 1899 के अंत तक यह विद्रोह अंग्रेजों के लिए एक भय बन चुका था। जंगलों में हर ओर विद्रोह की आग फैल चुकी थी। विद्रोह की आग खूंटी से होते हुए तामर, बसिया और रांची जिले तक फैल चुकी थी। बिरसा की सेना में 7,000 से अधिक पुरुष और महिलाएं शामिल हो चुकी थीं। क्योंकि उनके लिए यह लड़ाई केवल जमीन की नहीं, बल्कि अपनी पहचान और अस्तित्व की भी है। बिरसा की सेना में शामिल सैनिकों के पास धनुष-बाण और भाला-बरछी जैसे हथियार चलाने का व्यापक अनुभव था। यह क्रांतिकारी क्रूर ब्रिटिश अधिकारियों को निशाना बनाकर उन्हें चुनौती देते थे। लेकिन अंग्रेजी सत्ता ने बिरसा मुंडा की क्रांतिकारी सेना को चुनौती मानते हुए इसे कुचलने के लिए एक सुनियोजित साजिश रची। अंग्रेज उस दिन का इंतजार कर रहे थे, जब एक ही वार में इस आंदोलन को खत्म किया जा सके।
आखिर में 9 जनवरी 1900 यह वह दिन था जब, डोम्बारी बुरु पहाड़ी, पर बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हजारों की संख्या में जनजातीय समाज के लोग सभा कर रहे थे। पुरुष, महिलाएं, बच्चे सभी सभा में शांतिपूर्वक अपने अधिकारों की बात कर रहे थे। लेकिन तभी मुखबिर से सूचना पाकर ब्रिटिश कमिश्नर ए फोर्ब्स, कर्नल वेस्टमोर्लैंड और एचसी स्ट्रेटफील्ड वहां भारी पुलिस फोर्स लेकर पहुंचे। ब्रिटिश सेना ने डोम्बारी बुरु पहाड़ी को चारों ओर से घेर लिया। बिना किसी चेतावनी के अंधाधुंध गोलियां चलानी शुरू हुई। चारों ओर चीखें, खून और तड़पते लोग। पल भर में हुई कई राउंड फायरिंग से 400 जनजातीय योद्धा मारे गए। बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। किसी प्रकार बिरसा मुंडा को उनके साथियों ने सुरक्षित बाहर निकाला। उन्हें बार्टोडीह गांव पहुंचाया। जहां उन्होंने क्रांति को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से शरण ली।
आज भी डोम्बारी बुरु पहाड़ी नरसंहार अंग्रेजों का दिया हुआ वह वह जख्म है, जिसके घाव नहीं भरे। उस दिन हादी मुंडा, मझिया मुंडा, होपिन मांझी जैसे 400 क्रांतिकारी बलिदान हुए। लेकिन किसी का भी नाम सामने नहीं आया। अंग्रेजों की क्रूरता केवल नरसंहार तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने नरसंहार में नारे गए जनजातीय क्रांतिकारियों की भी पहचान छिपाने का प्रयास किया। उन्होंने 400 लोगों की मौत को मात्र 12 लोगों की मौत बताकर इस नरसंहार की सच्चाई छिपाई। लेकिन जनजातीय लोककथाओं, गीतों और स्मृतियों में वे 400 बलिदानी आज भी जीवित हैं।
इस नरसंहार के बाद भी अंग्रेजों की क्रूरता का सिलसिला कम नहीं हुआ। जो लोग सुरक्षित बच भी गए थे, उन्हें पकड़ने के लिए अंग्रेजों ने क्रूरता की। क्रांतिकारियों को पकड़-पकड़ कर उनकी निर्दयता के साथ हत्या की। मुंडा के दो करीबी साथी हाथीराम मुंडा और सिंगराई मुंडा को अंग्रेजों ने जिंदा दफना दिया। हालांकि, बिरसा मुंडा कुछ समय तक गिरफ्तारी से बचते रहे, लेकिन 3 फरवरी 1900 को अंग्रेजों ने उन्हें भी धोखे से गिरफ्तार कर लिया। जिसके बाद उन्हें रांची जेल में कैद किया गया। यहां उन्हें प्रतिदिन अमानवीय यातनाएं दी जातीं। 9 जून 1900 को षड़यंत्र रचकर अंग्रेजों ने जेल में ही छल पूर्वक बिरसा मुंडा की हत्या कर दी। अंग्रेजों मे उनकी हत्या को, हैजा से हुई मौत बताकर सत्य छिपाने का प्रयास किया। इस प्रकार मात्र 25 वर्ष की आयु में ही देश की स्वतंत्रता के लिए बिरसा मुंडा ने अपने प्राण दे दिए।
आज जब हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं, तो यह याद रखना आवश्यक है कि स्वतंत्रता केवल बड़े शहरों या प्रसिद्ध आंदोलनों से नहीं मिली, बल्कि उन अनजान पहाड़ियों और जंगलों में भी मिली, जहां डोम्बारी बुरु जैसे नरसंहार हुए। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि इतिहास केवल उन लोगों का नहीं होता, जिनके नाम ऐतिहासिक पुस्तकों में लिखे जाते हैं, बल्कि उनका भी होता है, जिनका खून मिट्टी में मिलकर भी आवाज बनकर गूंजता है। डोम्बारी बुरु नरसंहार हमें याद दिलाता है कि अन्याय के विरुद्ध उठी आवाज को गोलियों से दबाया जा सकता है, लेकिन खत्म नहीं किया जा सकता।

