11 जून, 1606 का वह ऐतिहासिक दिन था, जब मुगल सम्राट जहांगीर के आदेश पर लाहौर में गुरु अर्जुन देव जी को शहीद कर दिया गया। उस समय गुरु हरगोबिंद साहिब जी मात्र 11 वर्ष के थे। अपने पिता की शहादत के बाद गुरु हरगोबिंद जी ने गुरुगद्दी संभाली। गुरु अर्जुन देव जी की शहादत से पूरे सिख समाज में असुरक्षा की भावना फैल गई थी।
लोगों ने महसूस किया कि क्रूरता के इस दौर में, धर्म की रक्षा के लिए अब भक्ति को शक्ति की ढाल की आवश्यकता है। लोगों के इसी डर को गुरु हरगोबिंद जी ने सिखों की पहली सेना में बदल दिया, जिसमें पेशेवर योद्धा नहीं, बल्कि अपने पंथ की रक्षा के लिए तैयार किए गए सामान्य लोग शामिल हुए। इनमें किसान और संत भी थे। यह सेना ही सिख पंथ की पहली ‘अकाल सेना’ कहलाई, और यही सिख के निर्माण की कहानी है।
गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने जनता के लिए मार्शल आर्ट और शस्त्र प्रशिक्षण की ट्रेनिंग की शुरुआत की। जनता की सुरक्षा के लिए एक स्थायी सैन्य बल का गठन किया।
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गुरु जी ने सिखों को एक सुरक्षित ठिकाना देने के लिए 1609 में अमृतसर की किलेबंदी करवाई और लोहगढ़ (लोहे का किला) का निर्माण किया। उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा, “मेरे पास अपनी प्रार्थनाएं लाओ, लेकिन अब भेंट में घोड़े और शस्त्र भी लाना और संग में अपनी वीरता लाना।”
बाबा बुड्ढा जी को गुरु जी की इस पहली सिख सेना के मुख्य मार्गदर्शक नियुक्त किया गया था। उनके साथ, भाई बिधि चंद, बाबा गुरदित्ता, भाई पीराना, भाई जेठा और भाई पैंदे खान जैसे महान योद्धाओं ने सेनापतियों और जत्थेदारों के रूप में सेना की कमान संभाली।
1606-09 ईस्वी में सेना के गठन के साथ ही, घोड़ों को भी युद्ध प्रयासों के लिए शामिल किया गया और उन्हें भी प्रशिक्षित किया गया। शुरुआत में सात सौ घोड़ों को दल का हिस्सा बनाया गया, लेकिन धीरे-धीरे सैन्य शक्ति में और भी विस्तार हुआ। समय के साथ गुरु जी की इस सेना में तीन सौ कुशल घुड़सवार और साठ तोपची भी जुड़ गए। इतना ही नहीं, पंजाब के माझा क्षेत्र से आए पांच सौ जांबाज सैनिकों ने पैदल सेना की कमान संभाली, जिससे यह सैन्य बल और भी शक्तिशाली और संगठित हो गया।
इसके बाद, गुरु हरगोबिंद साहिब ने सिखों को शस्त्र विद्या, घुड़सवारी और युद्ध कौशल का प्रशिक्षण देना शुरू किया। इसके साथ ही, युवाओं को कुश्ती, तीरंदाजी और तलवारबाजी में प्रशिक्षित किया गया। सिख नौजवान बिना किसी वेतन के, पूरी निष्ठा के साथ गुरु जी की सेना में भर्ती होने के लिए उमड़ पड़े। उन सभी को एक तलवार और एक घोड़ा दिया गया। धीरे-धीरे एक अनुशासित सेना तैयार हुई, जिसे ‘अकाल सेना’ कहा गया। यह बहुत बड़ी सेना नहीं थी, लेकिन अपने अनुशासन, बहादुरी और वफादारी में इसका कोई मुकाबला नहीं था।
वर्ष 1612 में, जहांगीर के शासनकाल में मुगलों को सिखों की बढ़ती सैन्य शक्ति का डर सताने लगा। इसलिए, उसने गुरु जी के बढ़ते प्रभाव को रोकने का प्रयास किया। जनवरी 1613 में मिलने के बहाने उसने गुरु जी को दिल्ली बुलाया और गिरफ्तार कर लिया। वे अक्टूबर 1619 तक 6 साल तक कैद में रहे। रिहा होने के बाद, गुरु जी ने अपनी सेना को और अधिक मजबूत किया। यह वह समय था, जब आम लोग योद्धाओं में बदल चुके थे। 1621 ईस्वी में, गुरु जी ने मुगलों के खिलाफ रोहिल्ला का युद्ध लड़ा, और मुगलों को पराजित किया। इसके अतिरिक्त, अक्टूबर 1627 ईस्वी में जहांगीर की मृत्यु के बाद, मुगलों के खिलाफ करतारपुर और गुरुसर जैसे कई अन्य कई लड़ाइयां लड़ीं। गुरु हरगोबिंद जी युद्ध में भाग लेने वाले पहले गुरु थे, जिन्होंने मुगल सेनाओं के खिलाफ युद्ध लड़े और विजय प्राप्त की।

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गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने सिखों को ‘संत-सिपाही’ की पहचान दी। उनकी यही सोच, आगे चलकर गुरु गोविंद सिंह जी के समय में खालसा पंथ की नींव बनी। यह केवल इतिहास नहीं है, बल्कि आज के समय के लिए भी एक संदेश है कि आत्म-सम्मान, साहस और न्याय के लिए खड़ा होना ही सच्ची मानवता है।

