24 जून 1564 को नरराई नाला (वर्तमान जबलपुर) की संकरी घाटी में एक ऐसी घटना घटी, जिसने इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया, जब रानी दुर्गावती ने मुगलों की कैद में जाने से बेहतर अपनी जान देना चुना। एक घायल रानी ने, चारों ओर दुश्मनों से घिरने के बाद भी झुकने से इनकार कर दिया। आइए जानते हैं कि आखिर कैसे उन्होंने पराजय के क्षण में भी अपना भाग्य खुद लिखा?
वर्ष 1564 में एक भयानक युद्ध छिड़ा, जब मुगल बादशाह अकबर की नजर गोंडवाना की समृद्धि और रानी दुर्गावती पर पड़ी। अकबर के आदेश पर उसके प्रमुख सेनापतियों में से एक आसफ खान ने 50,000 सैनिकों, तोपों और आधुनिक हथियारों के साथ आक्रमण किया, जबकि रानी दुर्गावती की सेना मात्र 5,000 योद्धाओं की थी। रानी ने अपने 16 वर्ष के शासन में 51 युद्ध जीते थे, एक भी नहीं हारे थे। उन्होंने बाज बहादुर को मालवा में बार-बार खदेड़ा, बंगाल के अफगानों को रोका और प्रजा को न्याय दिया था। लेकिन आज मुगल सेना चारों तरफ से घेर रही थी और स्थिति तेजी से बदल रही थी।
युद्ध के पहले दिन रानी ने मुगल सेना को पीछे ढकेल दिया। रानी ने मुगलों को पहले घाटी में घुसने दिया और फिर चारों तरफ से हमला बोल दिया। फौजदार (सेनापति) अर्जुन दास लड़ते हुए बलिदान हो गए। अब रानी ने खुद मोर्चे को सम्भाला था। सेना का मनोबल ऊंचा था और मुगल सेना को पहले दिन भारी नुकसान हुआ। रानी की आंखों में विजय की चमक थी, लेकिन दूसरे दिन आसफ खान ने भारी तोपें मंगवा लीं और हमला तेज कर दिया।
दूसरे दिन यानी 24 जून 1564 को स्थिति पूरी तरह बदल गई। रानी दुर्गावती को दो घातक तीर लगे। एक कान के पास और दूसरा गर्दन में। खून की धार बह रही थी, दर्द असहनीय था। मुगल सेना चारों तरफ से घेर रही थी। रानी दुर्गावती को एहसास हो गया था कि अब हार तय है।
उन्होंने अपने विश्वसनीय मंत्री आधार सिंह को पुकारा और शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा कि मुझे मार दो। अपनी तलवार से मेरी गर्दन काट दो। मैं मुगलों की कैद में नहीं जाना चाहती। अपमान के साथ जीना मेरे स्वाभिमान के खिलाफ है।
आधार सिंह रो पड़े और ऐसा करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि जिस हाथ ने आपके उपहार थामे हैं, वह ऐसा घिनौना कार्य कैसे कर सकता है? आधार सिंह ने कहा कि मैं आपको इस युद्ध क्षेत्र से दूर ले जा सकता हूं, हम सब के लिए आपकी जान बचनी बहुत ही जरूरी है। युद्ध क्षेत्र छोड़ने की बात सुनकर रानी क्रोधित हो गईं और बोलीं कि ईश्वर न करे कि मैं नाम और सम्मान से भी पराजित हो जाऊं।
फिर रानी ने अपनी कटार निकाली और स्वयं पर ही वार करके वीरतापूर्वक प्राण त्याग दिए। खून की फुहार उड़ी, सरमन चिंघाड़ा और रानी का शरीर शांति से लुढ़क गया। आसफ खान स्तब्ध रह गया। अकबर जीतकर भी हार गया। रानी को अपने महल में रखने के उसके मंसूबे चकनाचूर हो गए। उसका अहंकार मिट्टी में मिल गया।
रानी दुर्गावती के बलिदान के बाद गोंडवाना मुगलों के अधीन हुआ, लेकिन उनकी कहानी कभी नहीं मरी। 5 अक्टूबर, 1524 को कालिंजर (वर्तमान में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में) जन्मी रानी दुर्गावती की 18 साल की उम्र में गढ़ा-कटंगा के गोंड राजा संग्राम शाह के बेटे दलपत शाह से उनकी शादी हुई थी। आज भी मध्य प्रदेश के गांवों में, जबलपुर के संग्रहालय में, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में उनके वीरगति की तारीख 24 जून को बलिदान दिवस के रूप में सम्मान दिया जाता है। वे स्वाभिमान की ज्वाला थीं, जो कभी बुझी नहीं।

