नागपुर की एक पहाड़ी पर स्थित सीताबर्डी किला, आज भी खामोशी के साथ खड़ा है। उसकी दीवारें भले ही समय की धूल से ढक चुकी हों, लेकिन उसकी मिट्टी में एक ऐसी कहानी दबी है, जिसे इतिहास ने बहुत कम जगह दी। यह कहानी किसी बड़े युद्ध या किसी संगठित विद्रोह की नहीं है।
यह कहानी है एक मासूम 12 साल के बालक की, जिन्हें आगे चलकर लोगों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के रूप में जाना। केशव ने अपने बाल मन में ही अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंकने का साहस जुटा लिया था। बाल्याकाल से ही उनके भीतर राष्ट्रभक्ति कूट-कूटकर भरी थी। जब केशव मात्र 12 साल के थे, तभी उन्होंने सीताबर्डी किला पर लहरा रहे अंग्रेजों के यूनियन जैक को उतारकर वहां भारतीय ध्वज फहराने के लिए एक ऐसा कदम उठाया, जिसके बारे में कोई सामान्य बालक सोच भी नहीं सकता था।
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यह घटना 1902 की है। उस समय भारत पूरी तरह से ब्रिटिश शासन के अधीन था। अंग्रेजी सत्ता द्वारा भारतीयों पर अत्याचार करना अपने चरम पर था। नागपुर का सीताबर्डी किला सिर्फ एक सैन्य ढांचा नहीं था, बल्कि वह अंग्रेजों की ताकत और नियंत्रण का प्रतीक बन चुका था। उसकी ऊंचाई पर लहराता यूनियन जैक हर भारतीय को उसकी गुलामी का आभास कराता था।
तब केशव मात्र 12 वर्ष के थे। अपने सहपाठियों के साथ केशव पढ़ाई करने के लिए अपने गुरु श्रीमान वाजे के वहां जाया करते थे। गुरु जी उन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज, समर्थ रामदास और संत ध्यानेश्वर से जुड़ी रोचक और वीरतापूर्ण कहानियां सुनाया करते थे। शिवाजी की कहानियों ने केशव के मन पर गहरी छाप छोड़ी। इसी बीच नागपुर के सीताबर्डी किले (भोंसला शासकों का अंतिम गढ़) पर लहराते ब्रिटिश यूनियन जैक को देखकर केशव को गहरा दुख हुआ। उन्होंने मन ही मन निश्चय किया कि इस अंग्रेजी झंडे को उतारकर यहां हिंदवी साम्राज्य के प्रतीक भगवा ध्वज को स्थापित करना है।
धीरे-धीरे केशव की किले से यूनियन जैक उतारने की टीस एक विचार में बदल गई। एक दिन केशव ने अपने सहपाठियों को एकत्रित कर किले से यूनियन जैक उतारने की योजना बनाई। लेकिन मात्र 12 साल के केशव और उनके साथियों के पास ना तो कोई अनुभव था और न ही हथियार। हां, बस एक चीज थी, वह था, अंग्रेजों को चुनौती देने का विचार।
तभी केशव ने शिवा जी की गुरिल्ला रणनीति से प्रेरित होकर एक योजना बनाई। जो उन्होंने अपने गुरु नानाजी वाजे से सुनी थी। केशव की योजना जानकर कोई भी उसे बच्चों की कल्पना कहकर टाल सकता था, लेकिन यह सिर्फ 12 साल के बालक की प्रतिज्ञा थी। उन्होंने ठान लिया था कि एक गुप्त सुरंग खोदकर किले तक पहुंचना है, उस पर फहरा रहे यूनियन जैक को उतारकर भगवा ध्वज स्थापित करना है। लगभग दो किलोमीटर दूर स्थित किले तक भूमि के अंदर सुरंग बनाना, यह काम बड़े-बड़े अभियानों के लिए भी चुनौतीपूर्ण होता, लेकिन केशव और उनके साथियों ने इस असंभव कार्य को अपना संकल्प बना लिया था।
आखिरकार वह दिन आ ही गया। सुरंग की खुदाई का कार्य शिक्षक नानाजी वाजे के घर प्रारंभ हुआ। केशव और उनके साथी छोटे-छोटे हाथों और सीमित संसाधनों के मिट्टी खोदने में जुट गए। दिन हो या रात, उनके भीतर का उत्साह कम नहीं होता था। यह दृश्य किसी खेल का नहीं था, बल्कि एक ऐसी भावना का था, जो उन्हें लगातार आगे बढ़ा रही थी। हर बार जब वे मिट्टी हटाते, उन्हें लगता कि वे अपने लक्ष्य के और करीब पहुंच रहे हैं। केशव के मन में यह विश्वास था कि एक दिन वे उस किले तक जरूर पहुंचेंगे और ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देंगे। यह सुरंग केवल मिट्टी में बनाया जा रहा एक रास्ता न होकर, उनके भीतर पल रहे स्वाभिमान और स्वतंत्रता की इच्छा का प्रतीक बन चुकी थी।
लेकिन हर प्रयास की अपनी सीमाएं होती हैं। जैसे-जैसे खुदाई आगे बढ़ी, कठिनाइयां भी बढ़ती गईं। दूरी बहुत अधिक थी, संसाधन बेहद सीमित थे और बच्चों की क्षमता भी एक सीमा तक ही साथ दे सकती थी। अंततः यह गतिविधि नानाजी वाजे की नजर में आ गई। जब उनकी योजना का खुलासा हुआ, तो गुरु जी से डांट खानी पड़ी। उनके इस प्रयास को वहीं रोक दिया गया। बाहरी दृष्टि से यह एक असफल प्रयास था, एक अधूरी सुरंग, जो अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकी। लेकिन इस घटना का वास्तविक अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा था। केशव के मन में जो विचार जन्म ले चुका था, वह अब रुकने वाला नहीं था।
हेडगेवार के बचपन का यह इकलौता राष्ट्रभक्ति का उदाहरण नहीं था, उन्होंने बचपन में ही अपने स्कूल में वंदे मातरम् के लिए आंदोलन चलाया। ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के राज्याभिषेक की हीरक जयंती के अवसर पर बांटी गई मिठाई को कूड़े में फेंका, ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं। बचपन में ही डॉ. मूंजे से बम बनाना सीखा, ताकि ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दे सकें।
इतिहास के पन्नों में भले ही बाल केशव द्वारा यूनियन जैक को उतारने के लिए सुरंग खोदने की घटना का जिक्र कम मिलता है, लेकिन उनका संदेश आज भी समाज विशेषकर संघ के स्वयंसेवकों को राष्ट्र की सेवा करने के लिए प्रेरित करता है। हेडगेवार की यह सच्ची कहानी हमें बताती है कि परिवर्तन की शुरुआत उम्र, साधनों या परिस्थितियों से नहीं होती, बल्कि विचार और साहस से होती है। यह केवल एक अधूरी सुरंग की कहानी नहीं है, बल्कि उस मानसिकता की कहानी है, जो हार मानने के बजाय रास्ता खुद बनाना जानती है, चाहे वह रास्ता जमीन के ऊपर हो या उसके भीतर।

