Siege of Chittorgarh (1567-68) : सन् 1567-68 की चित्तौड़गढ़ की घेराबंदी में चित्तौड़गढ़ का किला खामोश हो चुका था। मुगल सेना विजय का जश्न मना रही थी। चारों ओर मौत की सन्नाटा छाया हुआ था। तभी धुएं और मलबे के बीच से एक अकेला साया उभरा, राजपूत योद्धा ईसर दास चौहान।
उसके शरीर पर धूल और खून के निशान थे। जख्मों से लथपथ होने के बावजूद उसकी आंखों में आग थी। किले के भीतर जो नरसंहार हुआ था, उसमें वह बचा रह गया था। लेकिन भागने की बजाय उसने अंतिम प्रतिरोध का फैसला किया। उसके पास केवल एक खंजर था, कोई ढाल नहीं, कोई साथी नहीं, सिर्फ अटूट साहस और मातृभूमि के प्रति समर्पण।
अकबर ने युद्ध के मैदान में तबाही मचाने के लिए हाथियों को भेजा था। पहले 50 ओर फिर लगभग 300 हाथी, जिनकी सूंड पर तलवारें थीं, मैदान में छोड़ दिए गए। अबू फजल के अनुसार, इसर दास चौहान ने एक हाथी से केवल चाकू से लड़ाई की।
बिना किसी हिचकिचाहट के ईसर दास उस हाथी की ओर दौड़ा। हाथी ने गुस्से में सूंड उठाकर हमला किया। ईसर दास ने खुद को बचाते हुए हाथी के बड़े-बड़े दांतों को दोनों हाथों से मजबूती से पकड़ लिया। फिर अदम्य हिम्मत दिखाते हुए वह खुद को ऊपर खींचने लगा। हाथी चीखा, हिला और उसे झटकने की कोशिश करने लगा, लेकिन ईसर दास ने दांत नहीं छोड़ा।
एक झटके में वह हाथी की पीठ पर चढ़ गया। फिर बिना समय गंवाए उसने अपना खंजर हाथी के मांस में गहराई तक घोंप दिया। खून की धारा फूट पड़ी। हाथी जोर से चीख उठा और पीड़ा से तड़पने लगा। पूरा मुगल शिविर स्तब्ध रह गया।
ईसर दास ने चारो तरफ देखा और गरजकर कहा, “मेरा सलाम अकबर तक पहुंचाने की मेहरबानी करो।”
यह शब्द अकबर के लिए थे। मौत के मुंह में खड़े होकर भी उसने सम्राट का उपहास किया। एक अकेला योद्धा पूरे मुगल साम्राज्य को चुनौती दे रहा था। उसकी आवाज में न डर था, न हार, केवल वीरता और व्यंग्य थी।
मुगल घुड़सवार और पैदल सैनिक तुरंत हर तरफ से घेरने लगे। तलवारें निकल आईं, भाले तैयार हो गए। ईसर दास हाथी से कूदकर जमीन पर उतरा और अकेले ही उन सबका सामना करने लगा।
उसका खंजर लगातार घूम रहा था। एक मुगल सैनिक को उसने सीधे भेद दिया, दूसरे का सिर काटा, तीसरे को घायल कर दिया। चारों ओर चीख-पुकार मच गई। ईसर दास जैसे एक ज्वालामुखी बन गया था। उसके हर वार में चित्तौड़ की रक्षा की आखिरी चिंगारी थी।
मुगल सैनिकों की संख्या बहुत अधिक थी। वे चारों तरफ से टूट पड़े। भाले उसके शरीर में घुसने लगे। तलवारें उसके कंधे, बाजू और छाती पर लगीं। खून बहने लगा, लेकिन वह रुका नहीं। गिरते-गिरते भी उसने कई और हमलावरों को मार गिराया। उसकी वीरता देखकर मुगल सैनिक भी हैरान थे।
अंततः घावों की संख्या बढ़ती गई। शरीर जवाब दे रहा था। ईसर दास चित्तौड़ की पवित्र धरती पर घुटनों के बल बैठ गया। एक अकेला राजपूत योद्धा, जो विशाल मुगल सेना और उसके सम्राट के खिलाफ अपनी अंतिम सांस तक डटा रहा।
ईसर दास चौहान की यह लड़ाई चित्तौड़ की वीरगाथा का सबसे चमकदार अध्याय बन गई। जब पूरा किला चुप हो चुका था, तब भी उन्होंने दिखा दिया कि सच्चा राजपूत कभी समर्पण नहीं करता। उसके अपनी बहादुरी से इतिहास में एक अमिट निशान छोड़ दिया कि संख्या कितनी भी हो, साहस के आगे वह बेकार है।
बता दें कि चित्तौड़गढ़ की इस घेराबंदी में लगभग 8000 राजपूत योद्धा मातृभूमि की रक्षा में बलिदान हुए। लगभग 300 महिलाओं ने दासता के अपमान से बचने के लिए जौहर किया। अकबर ने विजय का क्रूर उत्सव मनाया, कटे सिरों की मीनारें बनवाईं। यह नरसंहार की भयावहता का प्रमाण था। जो बताता है कि अकबर महान नहीं सिर्फ क्रूर आक्रांता था।
राजपूत योद्धा ईसर दास चौहान कौन थे, इस बारे में सोशल मीडिया और राजपूत गौरव गाथाओं में बदनौर का होने का दावा किया गया है।

