एक ऐसा इंसान, जिसने एक अपाहिज बच्चे में भगवान को ढूंढ़ा और अपनी पीठ को ही उसका सिंहासन बना दिया। हम बात कर रहे हैं भगत पूरन सिंह की और उनके ‘प्यारा सिंह’ की, जिन्होंने पिंगलवाड़ा जैसी महान संस्था को जन्म दिया। आज इस लेख के माध्यम से हम आपको बताएंगे कि कौन थे भगत पूरन सिंह और पिंगलवाड़ा बनाने की प्रेरणा उनको कहां से मिली।
साल 1934, एक सर्द और काली अमावस्या की रात। लाहौर के ऐतिहासिक गुरुद्वारा देहरा साहिब के मुख्य द्वार पर सन्नाटा पसरा हुआ था। तभी अंधेरे में दो साये आए और एक पोटली जैसा कुछ जमीन पर रखकर गायब हो गए। लाहौर अभी सुबह की पहली किरण से जाग ही रहा था कि गुरुद्वारा देहरा साहिब के विशाल लकड़ी के द्वार पर एक छोटा-सा बच्चा तकरीबन चार साल का, अकेला बैठा रो रहा था। वह बच्चा न बोल सकता था, न चल सकता था और न ही अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा कर सकता था। बच्चे में ‘स्पास्टिक और कुष्ठ रोग के शुरुआती लक्षण थे।
अगले दिन दोपहर होते-होते बच्चे की हालत खराब हो गई। ऊपर से बच्चे का बदहजमी से बुरा हाल था। कोई उसे नहलाना, साफ करना तो दूर उसको हाथ तक लगाने को तैयार नहीं था। बच्चे का पूरा शरीर अपने ही मल-मूत्र से सन गया। मक्खियां उसके चारों तरफ भिनभिना रही थीं। गुरुद्वारे के भक्त आते, दया जताते, रोटी या दूध रख देते, लेकिन कोई आगे बढ़कर उसे गोद में लेने को तैयार नहीं था।
गुरुद्वारे के प्रधान ग्रंथी, जत्थेदार अचार सिंह चुपचाप सब देख रहे थे। सुबह की अरदास पूरी करने के बाद उन्होंने बच्चे को गोद में उठाया और संगत की ओर देखा और पूछा, “भाई “कोई इस बच्चे की जिम्मेदारी लेगा?”
सुनते ही सन्नाटा छा गया। कोई आखें नहीं मिला रहा था।
तभी उनकी नजर एक युवक पर पड़ी, भगत पूरन सिंह। वह कई साल से गुरुद्वारे के सेवक थे। वह लंगर बनाते, सफाई करते, बीमारों की देखभाल करते। जत्थेदार जी ने बच्चे को उनकी तरफ बढ़ाते हुए कहा, “पूरन सिंह… कृपया तुम ही इस बच्चे की देखभाल कर लो।”
वो साल था 1934…। भगत पूरन सिंह ने एक पल भी नहीं सोचा। उन्होंने बच्चे को अपने हाथों में ले लिया। वह गंदा, रोता हुआ, बदबूदार बच्चा था, लेकिन भगत जी के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उन्होंने तुरंत उस बच्चे को नहलाया, साफ किया, खाना खिलाया और प्यार से उसे नया नाम दिया—प्यारा सिंह।
प्यारा सिंह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता था और भगत जी के पास न कोई साधन ना ही पैसा। उन्होंने तय किया कि प्यारा सिंह जहां भी जाएगा, उनकी पीठ पर जाएगा। और फिर वो दिन और अगले 14 सालों तक, भगत जी जहां भी जाते,चाहे वह अमृतसर की गलियां हों या लाहौर के रास्ते, प्यारा सिंह उनकी पीठ पर सवार होता। लोग उन्हें देखकर हंसते और कुछ उनका मजाक उड़ाते कि “देखो, एक पागल दूसरे पागल को उठाकर घूम रहा है।”
लेकिन भगत जी शांत रहते। वे प्यारा सिंह को ‘अपने गले का हार’ और ‘अपना संसार’ कहते थे। प्यारा सिंह अक्सर भगत जी की पीठ पर ही मल-मूत्र त्याग देता था, लेकिन भगत जी कभी क्रोधित नहीं हुए। वे उसे अपने हाथों से नहलाते, खाना खिलाते और उसकी गंदगी साफ करते।
इसी तरह 14 साल कैसे बीत गए … पता ही ना चला… और फिर साल 1947 का समय आया। बंटवारे के काले अध्याय ने सब बदल दिया। लाहौर शहर में खून की नदियां बह रही थीं। भगत पूरन सिंह के पास भी अपनी जान बचाने के अलावा और कोई चारा ना था। लेकिन ऐसे हालात में भी उन्होंने प्यारा सिंह को नहीं छोड़ा। भगत जी प्यारा सिंह को अपने कंधे पर उठाकर लाहौर से शरणार्थियों के काफिले के साथ अमृतसर पहुंचे। अमृतसर स्टेशन और सड़कों पर उन्होंने जो देखा, उसने उनका कलेजा चीर दिया। चारों ओर दंगे हो रहे थे, कहीं पर अधकटी लाशें तो कहीं पर कटे-फटे अंग वाले लोग, बीमार और बेसहारा बुजुर्ग पड़े थे। उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था।
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उन्होंने अमृतसर के रेलवे स्टेशन और सड़कों से बीमारों को उठाना शुरू किया। भगत पूरन सिंह के पास न घर था, न पैसा। उन्होंने अमृतसर में खालसा कॉलेज के सामने एक तंबू गाड़ा। यही तंबू पहला ‘पिंगलवाड़ा’ (अपाहिजों का घर) बना। वह खुद कुष्ठ रोगियों के जख्म धोते, नहलाते और बेसहारा महिलाओं को सुरक्षा देते। वे अक्सर एक हाथगाड़ी (रेहड़ी) लेकर निकलते, जिस पर प्यारा सिंह लेटा होता। वे शहर के कचरे से रद्दी कागज उठाते, उन्हें बेचते और उस पैसे से दवा लाते।
दिलचस्प बात यह है कि 1948 के आसपास पिंगलवाड़ा की आधिकारिक नींव उन्होंने खुद नहीं, बल्कि उसी प्यारा सिंह के हाथों से रखवाई, जो 14 साल से उनके गले का हार था।
भगत जी कहते थे कि अगर उन्हें वह 4 साल का अपाहिज बच्चा (प्यारा सिंह) उस रात न मिला होता, तो शायद ‘पिंगलवाड़ा’ कभी न बनता।
भगत जी ताउम्र कुंवारे रहे, कोई संपत्ति नहीं बनाई। उनकी संपत्ति बस वही लोग थे, जिन्हें समाज ने ‘कूड़ा’ समझकर सड़कों पर फेंक दिया था।
यह बात जानने वाली है कि भगत पूरन सिंह को उनकी महान सेवाओं के लिए भारत सरकार ने 1981 में पद्म श्री से सम्मानित किया था। 5 अगस्त 1992 को उनका निधन हुआ। जब उनका निधन हुआ, तब भी प्यारा सिंह जीवित था। भगत जी के जाने के बाद पिंगलवाड़ा की अगली सेवादार बीबी इंद्रजीत कौर जी ने प्यारा सिंह की 9 साल तक उसी तरह देखभाल की जैसे भगत जी करते थे। साल था 2001, 13 मई , वो दिन था, जब प्यारा सिंह का निधन हो गया।

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आज भी पिंगलवाड़ा में प्यारा सिंह की कहानी सुनाई जाती है, आज भी पिंगलवाड़ा एक विशाल वटवृक्ष की तरह हजारों बेसहारा लोगों को आश्रय और उपचार प्रदान कर उनकी अटूट विरासत को जीवित रखे हुए है। जिस बच्चे को दुनिया ने दुत्कार दिया, उसे भगत जी ने अपना ईश्वर बना लिया।

