क्या आपको पता है दुनिया की सबसे महँगी जमीन कब और कहाँ खरीदी गई? गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड के अनुसार यह जमीन है हॉन्ग कॉन्ग में। जानकारी सही दी गई है गिनीज बुक में लेकिन है अधूरी। अधूरी इसलिए क्योंकि जब गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड का जन्म भी नहीं हुआ था उस समय भारत के पंजाब में एक जमीन खरीदी गई थी – 78000 सोने के सिक्के देकर। जमीन भी कोई आलीशान महल या हवेली बनाने के लिए नहीं खरीदी गई थी, सौदा हुआ था बस चंद गज का। क्योंकि माता गुजरी और उनके दो पोतों का करना था अंतिम संस्कार। आक्रांता मुगल जिस सिख धर्म को नेस्तानाबूद करने पर तुले हुए थे, उनके तीन अहम सदस्यों का ससम्मान अंतिम संस्कार करके इतिहास दर्ज करना था। आपको जानकर यह आश्चर्य हो सकता है कि सिखों के सम्मान के लिए इतनी बड़ी कीमत चुकाई थी दीवान टोडर मल ने, जो खुद सिख नहीं थे।
कौन थीं माता गुजरी? उनका और उनके दो पोतों का अंतिम संस्कार इतना महत्वपूर्ण क्यों बन गया? कौन थे दीवान टोडर मल, जो 78000 सोने के सिक्के देने में झिझके नहीं? मुगलों के सामने इतनी हैसियत दिखाने के बाद आखिर क्या हश्र हुआ उनका? हॉन्ग कॉन्ग वाली जमीन से तुलना की जाए, तो वर्ष 1704 में खरीदी गई यह जमीन कितनी महँगी है? यह लेख इन्हीं सारे सवालों का जवाब खोजते हुए लिखा गया है।
माता गुजरी, 2 साहिबजादे और मुगल कैद
गुरु तेग बहादुर सिखों के 9वें गुरु थे। माता गुजरी इन्हीं की धर्मपत्नी थीं। साथ ही थीं सिखों के 10वें गुरु गुरु गोबिंद सिंह की माँ। तब भारत पर औरंगजेब का राज था। साथ ही बढ़ रहा था सिख धर्म का प्रभाव भी। कट्टर मजहबी औरंगजेब को यह मंजूर नहीं था। उसने गुरु गोबिंद सिंह को जिंदा या मुर्दा पकड़ने का आदेश दे दिया। इस आदेश के बाद वर्ष 1704 में चमकौर का युद्ध हुआ। युद्ध की शुरुआत हो, इससे पहले ही माता गुजरी और गुरु गोबिंद सिंह के 2 बेटों (9 साल के साहिबजादा जोरावर सिंह और 7 साल के साहिबजादा फतेह सिंह) को मुगलों ने बंदी बना लिया। उन्हें रखा गया पंजाब स्थित फतेहगढ़ साहिब के ठंडा बुर्ज में कैद करके।
बल-छल से धर्म परिवर्तन मुगलों की प्राथमिकता थी। साहिबजादे जोरावर सिंह और साहिबजादे फतेह सिंह के साथ भी यही किया गया। दोनों को लगातार इस्लाम कबूलने का प्रलोभन दिया गया। मौत का डर भी दिखाया गया। उम्र भले ही दोनों की 9 और 7 साल थी लेकिन न तो उन्होंने शीश झुकाया, न ही इस्लाम कबूला। सजा के तौर पर औरंगजेब के नवाब वजीर खान ने दोनों को दीवार में चुनवाने का आदेश दे दिया। जब माता गुजरी को साहिबजादों की मौत की खबर मिली तो वो भी इसे झेल नहीं पाईं। उन्होंने भी प्राण त्याग दिए।
दुनिया की सबसे महँगी जमीन और दीवान टोडर मल
माता गुजरी और दो साहिबजादे धर्म की रक्षा के लिए बलिदान हो चुके थे। लेकिन धर्मसंकट अभी भी बरकरार था। मुगलों की कैद से उनके पार्थिव शरीर को लाकर अंतिम संस्कार कैसे होगा, कौन करेगा? क्योंकि शाही फरमान जारी कर दिया गया था कि मुगल जमीन पर इन तीनों की अंत्येष्टि नहीं की जाएगी। जब राज ही मुगलों का था, तो सारी जमीन भी उनकी थी। मतलब अंतिम संस्कार के लिए जमीन मुगलों से खरीदनी होगी।
इस काम के लिए आगे आए दीवान टोडर मल। वो सरहिंद (वर्तमान में पंजाब के फतेहगढ़ साहिब जिले का जिला मुख्यालय) के नवाब वजीर खान के दीवान थे। गुरु गोबिंद सिंह से प्रभावित थे, भक्त थे उनके हालाँकि सिख नहीं (कुछ स्रोतों के अनुसार जैन थे, जबकि सिख-इनसाइक्लोपीडिया के अनुसार हिंदू) थे फिर भी अपना सब कुछ न्योछावर करके तीनों बलिदानियों के ससम्मान अंतिम संस्कार के लिए प्रतिबद्ध थे। जिस वजीर खान के लिए वो काम करते थे, जिसके आदेश पर तीनों की मौत हुई, उसी से अंतिम संस्कार के लिए जमीन का सौदा करने पहुँच गए। इसके बाद जो शर्त रखी गई, वही आधार बनी दुनिया की सबसे महँगी जमीन खरीद की।
शर्त थी – जमीन के जितने हिस्से पर सोने के सिक्के बिछाए (वो भी सुला कर नहीं, खड़े करके ऊर्ध्वाधर स्थिति में) जाएँगे, सिर्फ उतनी ही जमीन अंतिम संस्कार के लिए मिलेगी। दीवान टोडर मल ने अपना सब कुछ बेच दिया, जहाजी हवेली भी। जमा किए 78000 सोने के सिक्के। इन सिक्कों को एक के साथ एक खड़ा करके जमीन पर रखा गया। जब सारे सिक्के बिछ गए तो उससे जो जमीन मिली, वो थी चार गज। 4 गज मतलब 36 वर्ग फीट – तीन बलिदानियों की अंत्येष्टि के लिए। फतेहगढ़ साहिब स्थित इस जमीन की कीमत क्या होगी, इसके लिए 78000 सोने के सिक्कों को वर्तमान संदर्भ में समझने की कोशिश कीजिए।
भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार मुगलकालीन सोने के सिक्के लगभग 169 ग्रेंस वजनी होते थे। ग्राम में यह लगभग होता है 10.95 ग्राम। इस हिसाब से 78000 सोने के सिक्कों का कुल वजन होगा – 854100 ग्राम। 30 नवंबर 2025 की बात करें तो 1 ग्राम सोने की कीमत है – 13025 रुपया। इसलिए 854100 ग्राम सोने की कुल कीमत होगी – 11124652500 रुपया। आसान शब्दों में कहें तो 1112 करोड़ रुपये से कुछ ज्यादा कीमत चुकानी पड़ी थी 4 गज जमीन लेने के लिए। लेकिन क्या यह सच में दुनिया की सबसे महँगी जमीन है? इस प्रश्न का सही उत्तर तभी मिलेगा, जब गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हॉन्ग कॉन्ग की जमीन से इसकी तुलना की जाए।
रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2017 के मई महीने में हॉन्ग कॉन्ग में 31000 वर्ग फीट जमीन जो खरीदी गई, वो दुनिया की सबसे महँगी जमीन बनी। तब इसकी कीमत थी 96896 अमेरिकी डॉलर प्रति वर्ग फीट। मतलब इस दर से अगर 36 वर्ग फीट जमीन खरीदी जाए, तो इसकी कीमत होगी – 3488256 अमेरिकी डॉलर। चूँकि फतेहगढ़ साहिब स्थित जमीन की कीमत हमने वर्तमान आँकड़े से की है, इसलिए 30 नवंबर 2025 को डॉलर-रुपए के हिसाब से 3488256 अमेरिकी डॉलर की कीमत होगी – 311701835 रुपए। आसान भाषा में समझें तो 31 करोड़ रुपए से कुछ अधिक कीमत चुकानी होगी हॉन्ग कॉन्ग वाली जमीन के 4 गज के लिए। कहाँ 1112 करोड़ और कहाँ 31 करोड़ – तुलना आप खुद कर लीजिए।
दीवान टोडर मल: जमीन खरीद के बाद भी चुकानी पड़ी कीमत
जिस जगह माता गुजरी के साथ-साथ साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह का अंतिम संस्कार दीवान टोडर मल ने किया, उस जगह वर्तमान में गुरुद्वारा ज्योति स्वरूप खड़ा है। ऐसा करके धर्म की रक्षा तो उन्होंने कर ली। लेकिन क्या वो खुद को मुगलों से बचा पाए? नहीं।
मुगल नवाब वजीर खान को दीवान टोडर मल का यह कृत्य पसंद नहीं आया। बात सिर्फ पैसे की नहीं थी। धर्म-परिवर्तन नहीं करने वालों के मन में वो खौफ पैदा करना चाहता था। टोडर मल के कारण यह हो न सका। इसी का खामियाजा उन्हें चुकाना पड़ा, जो चंद रोज पहले तक खुद उसके दीवान थे। हवेली तो बिक ही गई थी, बाकी बची संपत्तियों को भी नवाब ने नेस्तानाबूद करवा दिया। जिस शख्स ने चंद घंटों में 78000 सोने के सिक्के जमा कर लिए, वो दिवालिया हो गया। अपने ही बनाए आशियाने से भागना पड़ा। और अंततः गुमनामी में खो गया। लेकिन ऐसा करके वो सिख और भारतीय इतिहास में अपना नाम अमर कर गए। उनकी जहाज हवेली जो पहले जर्जर अवस्था में थी, सरकारी वादों को अगर सच मानें तो शायद अब उसके जीर्णोद्धार का कार्य किया जाएगा।

