जम्मू-कश्मीर की दुर्गम पहाड़ियों में एक ऐसे वीर की गाथा गूंजती है, जो अद्भुत साहस, तीक्ष्ण बुद्धि और अटूट संकल्प का प्रतीक है। यह उस वीर भारतीय सैनिक के पराक्रम की कहानी है, जिसने गोलियों की बौछार, बारूदी सुरंगों और हर पल मंडराती मौत के बीच रास्ता बनाया, ताकि राजौरी को पाकिस्तानी सेना से मुक्त करा सके।
1948 के उस कठिन दौर में, जब राजौरी सहित जम्मू-कश्मीर के कई क्षेत्रों में पाकिस्तानी सेना ने घुसपैठ कर वहां अपना कब्जा जमा लिया था, तब एक वीर जवान अपनी टीम के साथ राजौरी से पाकिस्तीनी सेना को खदेड़ने के लिए आगे बढ़ा। यह कोई साधारण मिशन नहीं था, बल्कि समय के विरुद्ध एक दौड़ थी। हर एक मिनट की देरी सैकड़ों जिंदगियों पर भारी पड़ सकती थी। यह वीर सैनिक कोई और नहीं, बल्कि परमवीर चक्र से सम्मानित भारतीय लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे थे।
1947 में हुए भारत के बंटवारे के बाद से ही, पाकिस्तान की नजर जम्मू-कश्मीर पर थी। जम्मू-कश्मीर पर कब्जा करने के उद्देश्य से कबाइलियों के भेष में आए पाकिस्तानी सैनिकों ने 22 अक्टूबर 1947 को पुंछ सहित जम्मू कश्मीर के बड़े भू- भाग पर कब्जा कर लिया। कब्जा जमाने के बाद, पाकिस्तानी सैनिक लगातार भारतीयों का नरसंहार कर रहे थे क्योंकि वहां अभी तक भारतीय सेना नहीं पहुंच सकी थी।
भारतीय सेना के वहां नहीं पहुंच सकने की सबसे बड़ी वजह थी, राजौरी तक पहुंचने वाले मार्गों को पाकिस्तान द्वारा नष्ट करना। जो वैकल्पिक मार्ग थे, उन पर हर जगह बारूदी सुरंगें बिछी थीं, तो कहीं पेड़ों को काटकर सड़कों को ब्लॉक किया गया था। साथ ही ऊंची पहाड़ियों पर बैठे पाकिस्तान के जिहादी सैनिक लगातार मशीनगनों से हमला कर रहे थे। ऐसे में भारतीय सेना द्वारा कार्रवाई कर पाना लगभग असंभव लगने लगा था।
लेकिन इसी असंभव को संभव बनाने के लिए भारतीय सेना ने, 8 अप्रैल 1948 को लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे को माइन-क्लियरिंग ऑपरेशन की जिम्मेदारी सौंपी। अब उन्हें नौशेरा से राजौरी तक का रास्ता साफ कराना था, ताकि भारतीय सेना वहां पहुंचकर ऑपरेशन चला सके।
पहले ही दिन जब अपने साथियों के साथ लेफ्टिनेंट राणे माइन-क्लियरिंग ऑपरेशन में जुटे, तो ऊपर बैठे दुश्मन ने मोर्टार और मशीनगन से उन पर हमला किया। राणे के दो साथी बलिदान हो गए। वह स्वयं गंभीर रूप से घायल हुए। हालांकि घायल होने के बाद भी उन्होंने किसी को यह जानकारी नहीं दी। उन्होंने अपनी टुकड़ी को फिर से एकजुट किया और माइन-क्लियरिंग ऑपरेशन में जुटे रहे। इसके लिए उनका तरीका भी असाधारण और साहसिक था। वह टैंकों की आड़ लेकर आगे बढ़ते। फिर स्वयं छिपकर आगे बढ़कर जमीन पर रेंगते हुए माइन्स ढूंढ़ते और उन्हें निष्क्रिय कर देते, तब टैंक सुरक्षित आगे बढ़ने का सिग्नल देते। यह काम इतना आसान नहीं था, एक जरा सी चूक होने पर उनकी जान जा सकती थी। पर राणे का संकल्प अडिग था, भारतीय सीमा से पाकिस्तान के जिहादी सैनिकों को खदेड़ना। उनके चेहरे पर भय नहीं, बल्कि उत्साह था। जिसके दम पर वह धीरे-धीरे रास्ते को साफ करते हुए राजौरी को ओर बढ़ रहे थे।
8 से 11 अप्रैल तक, चार दिन इस अभियान के सबसे निर्णायक दिन थे। राणे और उनकी सैन्य टुकड़ी ने दिन-रात बिना रुके काम किया। उन्होंने न सिर्फ सैकड़ों माइन्स हटाईं, बल्कि पेड़ों से बने अवरोधों को विस्फोट से उड़ाया। मार्ग में टूटी हुई पुलियों के बीच रास्ते बनाए और जहां रास्ता नहीं था, वहां नया मार्ग तैयार किया। कई बार उन्हें नदी के किनारे पत्थरों को डायनामाइट से उड़ाना पड़ा और टैंकों को पानी में उतारना पड़ा। भोजन और आराम की परवाह किए बिना वे लगातार अभियान में जुटे रहे। क्योंकि उन्हें पता था कि उनके हर कदम के पीछे हजारों लोगों की जिंदगी और भारत की अखंडता जुड़ी हैं।
इस पूरे अभियान में राणे की सबसे बड़ी ताकत उनकी सूझबूझ थी। उन्होंने समझ लिया था कि सीधे मुकाबले में दुश्मन को हराना मुश्किल होगा, क्योंकि ऊंचाई पर बैठे दुश्मन को मार गिराने के लिए परिस्थितियां प्रतिकूल हैं। इसलिए उन्होंने योजना के अनुसार, मार्ग को सुरक्षित करने पर ध्यान केंद्रित किया, क्योंकि यही असली कुंजी थी। उन्होंने टैंकों को सुरक्षित आगे बढ़ाने के लिए वैकल्पिक रास्ते बनाए, दुश्मन की फायरिंग से बचने के लिए समय और दिशा का सही चुनाव किया और हर बाधा का समाधान खोजा।
आखिरकार, लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे और उनके साथियों द्वारा बनाए गए मार्ग से होकर 12 अप्रैल 1948 को चौथी डोगरा बटालियन टैकों के साथ सुरक्षित राजौरी पहुंची। वहां पहुंचते ही भारतीय जवान पाकिस्तान की जिहादी सेना पर काल बनकर टूट पड़े। कुछ ही देर में भारतीय वीरों ने पाकिस्तानी सेना के पैर उखाड़ दिए। जान बचाने के लिए पाकिस्तानी सैनिक दुम दबाकर भाग खड़े हुए। भारतीय शूरवीरों ने 500 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया।
जो राजौरी शहर, पाकिस्तानी सैनिकों के आतंक और क्रूरता के चलते भय और रक्तपात से भर गया था, वह भारतीय सेना के पहुंचते ही जीवंत हो उठा। लोग अपने घरों की ओर लौटने लगे। उनके चेहरे पर उम्मीद की किरणें दिखाई देने लगीं। लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे के साहस और पराक्रम से भारत को मिली यह जीत मात्र एक सैन्य जीत नहीं थी, बल्कि मानवता की भी जीत थी।
लेफ्टिनेंट राणे के इसी पराक्रम के चलते भारत सरकार ने 21 जून 1950 को सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया। साथ ही उन्हें 1954 में कैप्टन बनाया गया। फिर वह 25 जनवरी 1968 को मेजर पद से सेवानिवृत हुए।

परमवीर चक्र विजेता लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे, इमेज सोर्स : jammu kashmir now
26 जून 1918 को कर्नाटक के हावेरी गांव में जन्में राम राघोबा राणे ने ब्रिटिश भारतीय सेना में भी काम किया था। राष्ट्र के प्रति उनके योगदान को देखते हुए भारतीय नेवी ने करवार स्थित वॉरशिप म्यूजियम में उनकी प्रतिमा स्थापित की है। साथ ही शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया ने एक तेल टैंकर का नाम ‘एमटी लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे, पीवीसी’ रखा है। जबकि भारत सरकार ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के 21 द्वीपों में से एक द्वीप का नाम उनके नाम पर राणे द्वीप रखा है।

