भारत का पहला आम चुनाव: 12 पॉइंट्स में समझें भारत ने कैसे रचा विश्व का सबसे बड़ा चुनावी इतिहास

भारत में आजादी के बाद पहला आम चुनाव 25 अक्टूबर 1951 से लेकर 21 फरवरी 1952 के बीच हुआ

किसी भी राष्ट्र की शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक प्रणाली की आवश्यकता होती है। दुनियाभर के देशों में विभिन्न प्रकार की शासन प्रणालियां लागू हैं, लेकिन इन सभी में जो सर्वोत्तम प्रणाली है, वह है लोकतंत्र। जी हां, लोकतंत्र… जनता का, जनता के लिए, और जनता द्वारा किया जाने वाला शासन। यही वह शासन प्रणाली है जिसमें शक्ति जनता जनार्दन में निहित होती है। अगर बात भारत की करें, तो 99.1 करोड़ (करीब 100 करोड़) मतदाताओं के साथ दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में इसे पहचान मिली है। लेकिन क्या आप जानते हैं विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की शुरूआत कैसे हुई? पहला आम चुनाव कब और कैसे आयोजित हुआ? भारत का पहला वोट किसने डाला? और किन चुनौतियों का सामना करते हुए लोकतंत्र की यह ऐतिहासिक यात्रा शुरू हुई? चलिए ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब जानते हैं।

 1. भारत का पहला चुनाव कब से कब तक चला?

भारत में आजादी के बाद पहला आम चुनाव 25 अक्टूबर 1951 से लेकर 21 फरवरी 1952 के बीच हुआ। 119 दिनों तक चला लोकतंत्र का यह महापर्व भारतीय के इतिहास में सबसे लंबी चुनावी प्रक्रिया है, जिसमें कुल 68 फेज में वोटिंग हुई थी। उस दौरान भारत के 17 करोड़ 32 लाख 12 हजार 343 रजिस्टर्ड वोटर थे।  यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव रखने वाला एक ऐतिहासिक मील का पत्थर था।  इस चुनाव ने स्वतंत्र भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्थापित किया। उस दौरान राज्य विधानसभाओं की 3,283 सीटों के लिए भी मतदान हुआ था। पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन थे।

2. एक से ज्यादा सदस्य चुने जाने की व्यवस्था क्या थी?

पहले आम चुनाव के समय लोकसभा में कुल 489 सीटें थीं लेकिन संसदीय क्षेत्रों की संख्या 401 थी।उस वक्त एक निर्वाचन क्षेत्र में एक से अधिक सीटें थीं, इस वजह से 489 स्थानों के लिए 401 निर्वाचन क्षेत्रों में ही चुनाव हुआ। लोकसभा की 314 संसदीय सीटें ऐसी थीं जहां से सिर्फ़ एक-एक प्रतिनिधि चुने जाने थे। वहीं 86 संसदीय सीटें ऐसी थी जिनमें दो-दो लोगों को सांसद चुना जाना था। वहीं नॉर्थ बंगाल संसदीय क्षेत्र से तीन सांसद चुने गए थे। एक से ज्यादा सदस्य चुने जाने की यह व्यवस्था 1957 तक (5 साल तक) ही जारी रही। 

 3.  नकली (Dummy) चुनाव का प्रयोग क्यों किया गया?

 पहले आम चुनाव के समय 85 प्रतिशत लोग अशिक्षित थे। असली चुनाव से पहले सितंबर 1951 में, चुनाव आयोग ने एक नकली” या डमी चुनाव का आयोजन कराया। इसका मकसद देश की ज्यादातर निरक्षर (लगभग 85%) जनता को मतदान प्रक्रिया से परिचित कराना था।  लोग समझ नहीं पा रहे थे कि वोट कैसे डालना है, क्योंकि यह उनके लिए बिल्कुल नया अनुभव था। इस नकली चुनाव में लोगों को मतपत्र और मतपेटियों का उपयोग समझाया गया। 

 4. क्यों पहले आम चुनाव में 28 लाख महिलाओं के नाम मतदाता सूची से हटाने पड़े?

 पहले आम चुनाव में मतदाता सूची तैयार करना एक बड़ी चुनौती थी, खासकर महिलाओं के लिए। उस समय, खासकर ग्रामीण इलाकों में, कई महिलाएं अपना नाम दर्ज कराने से हिचकिचाती थीं। वे अपने नाम की जगह “किसी की माँ” या “किसी की पत्नी” के रूप में दर्ज होना चाहती थीं। इस सामाजिक रूढ़ि के कारण मतदाता सूची में लगभग 28 लाख महिलाओं के नाम हटाने पड़े, क्योंकि उनका सटीक नाम दर्ज नहीं हो सका। यह घटना उस समय की सामाजिक मानसिकता को दर्शाती है और चुनाव आयोग के सामने आई अनोखी चुनौतियों को उजागर करती है।

5. भारत का पहला वोट किसने और कहां डाला था?

भारत का पहला वोट 25 अक्टूबर 1951 को हिमाचल प्रदेश के चिनी (अब किन्नौर) तहसील में डाला गया, जिसे श्याम सरन नेगी ने डाला। भारत के पहले वोटर श्याम सरन नेगी का निधन 2022 में 106 वर्ष की आयु में हो गया।

अब बात उठती है हिमाचल में ही सबसे पहले मतदान क्यों हुआ? इसका कारण था वहाँ की भौगोलिक स्थिति। हिमाचल के पहाड़ी इलाकों में सर्दियों में भारी बर्फबारी होती थी, जिससे जनवरी-फरवरी में मतदान कराना असंभव था। इसलिए, बाकी देश से पहले, अक्टूबर 1951 में हिमाचल में मतदान शुरू किया गया। यह अनोखा निर्णय लिया गया ताकि वहाँ के लोग अपने मताधिकार का उपयोग कर सकें।  

6. लोकतंत्र के महापर्व में लोगों में किस तरह का उत्साह था?

स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र के प्रति निष्ठा इस कदर थी कि केरल के एक गाँव में एक युवक ने अपनी 90 वर्षीय माँ को पीठ पर लादकर पहाड़ी रास्ते से मतदान केंद्र तक पहुंचाया था। उस समय सड़कें न होने के कारण यह यात्रा कई घंटों की थी, लेकिन युवक ने कहा था कि, “माँ का पहला वोट राष्ट्र निर्माण के लिए जरूरी है।” यह कहानी ग्रामीण भारत की उत्साहपूर्ण भागीदारी को दर्शाती है।

7. कैसे 85% अशिक्षित मतदाताओं को वोटिंग प्रक्रिया समझाई गई?

उस दौरान 85% अशिक्षित मतदाताओं के लिए चुनाव आयोग ने एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई, जो 3,000 से अधिक सिनेमाघरों में मुफ्त दिखाई गई। इसमें वोट डालने की प्रक्रिया को नाटकीय तरीके से समझाया गया। नुक्कड़ नाटकों, ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारण और सिनेमाघरों में डॉक्यूमेंट्रीज़ के जरिए जागरूकता फैलाई गई। यह प्रयोग इतना सफल रहा कि इसने लाखों लोगों को वोटिंग की प्रक्रिया समझने में मदद की, जिससे असल चुनाव में भागीदारी बढ़ी। 10.59 करोड़ लोगों ने अपने नेता को चुनकर इतिहास रचा था। यह अनोखा प्रयास मतदान प्रतिशत को 45% तक ले गया।

 8.  पहले आम चुनाव में मतदान करने की उम्र क्या थी?

आजादी से पहले केवल धनी जमींदारों और व्यापारियों के पास ही वोट देने का अधिकार था। भारत ने मतदान के लिए पश्चिम देशों के मॉडल को ठुकराकर भारत के सभी लोगों द्वारा वयस्क मताधिकार के आधार पर आम चुनाव कराने का फैसला लिया। पहले लोकसभा चुनाव के दौरान मतदान करने की उम्र 21 वर्ष थी। 1989 में राजीव गांधी की सरकार के दौरान 61वां संविधान संशोधन कर मतदान करने की आयु घटाकर 18 वर्ष कर दी।

 9. पहले आम चुनाव में किस पार्टी ने बहुमत हासिल किया?

पहले आम चुनाव में करीब 53 राजनैतिक पार्टियों ने भाग लिया, जिनमें 14 राष्ट्रीय दल थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी, किसान मज़दूर प्रजा पार्टी, अखिल भारतीय जनसंघ, अखिल भारतीय रामराज्य परिषद् और अखिल भारतीय हिन्दू महासभा सहित कई पार्टियां शामिल थीं।। पहले आम चुनाव में 1,874 उम्मीदवारों ने अपनी किस्मत अजमाई थी। इस चुनाव में कांग्रेस ने 364 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई और पंडित जवाहरलाल नेहरू पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री बने। वहीं  भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) 16 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही। भारतीय जनसंघ को 3  हिंदू महासभा को चार और राम राज्य परिषद को तीन सीटें मिलीं।

 10. भारत का चुनाव आयोग कब और कैसे बना?

 भारत के चुनाव आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1950 को की गई थी। इसी दिन मतदाता जागरुकता दिवस मनाया जाता है। इसकी स्थापना संविधान के अनुच्छेद-324 के तहत की गई थी। सुकुमार सेन देश के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त थे।उनका कार्यकाल 21 मार्च 1950 से 19 दिसंबर 1958 तक रहा था।

चुनाव आयोग में पहले केवल मुख्य चुनाव आयुक्त ही होता था लेकिन 16 अक्टूबर 1989 से 1 जनवरी 1990 तक इसमें तीन आयुक्त नियुक्त किए गए।  1 अक्टूबर 1993 से तीन आयुक्तों की नियुक्ति की व्यवस्था को नियमित कर दिया गया।

केंद्रीय चुनाव आयोग राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, संसद के दोनों सदनों (राज्य सभा और लोकसभा), राज्यों की विधानसभाओं और विधान परिषदों का चुनाव कराता है। वहीं पंचायत और नगर निकाय के चुनाव कराने की जिम्मेदारी राज्य चुनाव आयोग के कंधे पर होती है।

 11. चुनावी प्रक्रिया किस तरह से सम्पन्न हुई?

 प्रत्येक उम्मीदवार के लिए अलग से मतपेटी रखी गई। जिसपर प्रत्याशी की चुनाव चिन्ह अंकित होता था।मतपेटियों को विभिन्न रंगों में रखा गया। जिससे मतदाता आसानी से मतदाताओं का पहचान कर सकें।  बैलेट पेपर को 1 रुपये के नोट के आकार का बनाया गया। हर मतपत्र पर उम्मीदवार का चुनाव चिन्ह अंकित किया गया। मतदान केंद्रों पर स्वयंसेवकों और अधिकारियों को तैनात किया गया, जो मतदाताओं को चुनावी प्रक्रिया समझाते थे।

रामचंद्र गुहा की किताब ‘इंडिया आफ़्टर गांधी’ के अनुसार, पूरे भारत में कुल 2 लाख 24 हज़ार मतदान केंद्र बनाए गए थे। लोहे की 20 लाख मतपेटियाँ बनाई गई थीं जिसके लिए 8200 टन इस्पात का इस्तेमाल किया गया था। बता दें पहले लोकसभा चुनाव में निर्वाचन आयोग ने प्रति वोटर 60 पैसे खर्च किए थे। 2019 के चुनाव में यह खर्च बढ़कर 72 रुपये प्रति मतदाता हो गया।  

12. पहले आम चुनाव में किन दिग्गजों की हुई थी हार?

 भारत के पहले आम चुनाव (1951-52) में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को भारी बहुमत मिला, लेकिन कई प्रमुख नेताओं को हार का सामना करना पड़ा। जिनमें डॉ. बी.आर. आंबेडकर, अचार्य जे.बी. कृपलानी,एन.जी. रंगा,दुर्गाबाई देशमुख और मोसालिकांति तिरुमाला राव जैसे दिग्गज शामिल थे।

सबसे ज्यादा चौंकाने वाली हार डॉ. आम्बेडकर की हुई। उन्होंने पहले आम चुनाव में शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन के बैनर के तले लोकसभा चुनाव में 35 प्रत्याशी खड़े किए। उनके दो प्रत्याशी ही चुनाव जीतने में सफल हो सके। उत्तरी मुंबई जीत से आम्बेडकर चुनाव हार गए। उन्हीं के पीए नारायण एस काजरोलकर को कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर उन्हें मात दी थी।

 भारत के पहले आम चुनाव की सफल प्रक्रिया ने भारत को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में स्थापित किया और भविष्य के चुनावों के लिए एक मज़बूत आधार तैयार किया। चुनाव आयोग की सफलता ने न केवल भारत, बल्कि अन्य स्वतंत्र देशों को भी प्रेरित किया। आज, जब हम इस ऐतिहासिक घटना को याद करते हैं, यह हमें लोकतंत्र की ताकत और मतदाता की भागीदारी के महत्व की याद दिलाता है।