भारत का पहला अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट टेस्ट मैच (1932) : जब मैच से एक दिन पहले टीम में खिलाड़ियों ने कर दिया था विद्रोह

India's first international cricket Test match

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भारत अपना पहला अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट टेस्ट मैच खेलने जा रहा था, लेकिन उससे एक रात पहले टीम के अंदर बगावत हो गई! खिलाड़ी अपने ही कप्तान के खिलाफ खड़े हो गए। आखिर ऐसा क्या हुआ कि ऐतिहासिक मैच से पहले टीम टूटने की कगार पर पहुंच गई? आइए जानते हैं कि कैसे राजाओं के दबदबे, गलत परंपराओं में भारत का क्रिकेट खेल जकड़ा हुआ था और इसी जकड़न ने किस तरह से एक सच्चे खिलाड़ी और खेल भावना को दबाने की कोशिश की।

भारत को साल 1932 में टेस्ट मैच खेलने का स्टेटस मिला और उसी वर्ष यह भी घोषणा हुई कि भारत से एक टीम अप्रैल से अक्टूबर तक के लिए इंग्लैंड दौरे पर जाएगी। इस टीम को 26 फर्स्ट क्लास मैच खेलने थे, जिसमें से एक ऑफिशियल टेस्ट मैच भी शामिल था। यानी भारत अपना पहला टेस्ट मैच खेलने वाला था। अब मुश्किल यह थी कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) के पास अपनी टीम को टूर पर भेजने के लिए पैसा नहीं था। इस स्थिति में पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह और विजयानगरम के महाराजा ने फंडिंग का इंतजाम किया।

दौरा लंबा था, इसलिए पटियाला के महाराजा और विजयानगरम के महाराजा टीम के साथ नहीं गए। दोनों महाराजा छह माह तक अपने राज्य से दूर नहीं रहना चाहते थे। अगर दोनों में से कोई भी जाता, तो उन्हें ही टीम की कमान मिलती। क्योंकि टीम का कप्तान राजपरिवार का ही कोई व्यक्ति हो सकता था, उस समय की यही परम्परा थी। किसी ऐसे खिलाड़ी जो राजघराने से जुड़ा न हो, उसे कप्तानी नहीं मिलती थी, वह खेल में चाहे जितना टैलेंटेड क्यों न हो। ऐसे में पटियाला के महाराजा और विजयानगरम के महाराजा की अनुपस्थिति में टीम की कमान पोरबंदर के महाराजा राणा नटवरसिंहजी भावसिंहजी को सौंप दी गई। लिम्बड़ी के महाराजा को उप कप्तान बनाया गया। जबकि दोनों ही क्रिकेट में अच्छे नहीं थे।

लंदन पहुंचने के बाद प्रैक्टिस मैच में ही पोरबंदर के महाराजा को यह अहसास हो गया कि उन्हें जिस मैच की जिम्मेदारी मिली है, वह भारत के लिए ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण है। ऐसे में उन्होंने एक समझदारी का फैसला लेते हुए टेस्ट मैच से एक दिन पहले खुद को खेल से अलग करने की घोषणा कर दी। अब पोरबंदर के महाराजा ने टीम की जिम्मेदारी टीम के सबसे बढ़िया ऑलराउंडर खिलाड़ी कर्नल सीके नायडू को सौंप दी। उस दौर में सी.के. नायडू (जन्म 1895, नागपुर) भारतीय क्रिकेट के शानदार ऑलराउंडर और आक्रामक बल्लेबाज के रूप में प्रसिद्ध थे। उन्होंने 1916 में फर्स्ट-क्लास डेब्यू किया था। 1923 में होलकर महाराजा ने उन्हें इंदौर बुलाकर आर्मी में कैप्टन (बाद में कर्नल) का रैंक दिया। 

लेकिन अब टीम के कुछ खिलाड़ियों को कतई पसंद नहीं था कि राजघराने के अलावा कोई दूसरा कप्तान बने। मतलब यह कि गुलाम भारत में पले-बढ़े इन खिलाड़ियों को अपने कप्तान के रूप में राजा-महाराजा या नवाब के अलावा कोई दूसरा स्वीकार नहीं था। अगले दिन यानी 25 जून 1932 को भारत अपना पहला टेस्ट मैच खेलने वाला था, लेकिन उससे पहले ही टीम में रातों-रात विद्रोह हो गया था। 

बागी खिलाड़ियों ने रात में ही पटिलाया के महाराजा को टेलीग्राम भेजकर अपनी नामंजूरी व्यक्त कर दी। खिलाड़ियों की बात सुनते ही महाराजा का पारा चढ़ गया क्योंकि उन्हें भी उस ऐतिहासिक क्षण के महत्त्व का अंदाजा था। उन्हें पता था कि यह भारत का पहला टेस्ट मैच है। पटियाला के महाराजा ने कड़े शब्दों में विरोधी खिलाड़ियों को चेतावनी दी कि नायडू ही कप्तान रहेंगे, जो विरोध करेगा, वह कभी भारत के लिए नहीं खेल पाएगा। 

राजसी ताकत का चमत्कार! विद्रोह दब गया। सुबह नायडू टीम को लीड करते लॉर्ड्स के मैदान पर पहुंचे। टेस्ट मैच हुआ और इंग्लैंड ने 158 रनों से जीत हासिल की, लेकिन भारत के गेंदबाजों और बल्लेबाजों ने अपने शानदार प्रदर्शन से पूरी दुनिया को चौंका दिया।

1932 का यह ऐतिहासिक दौरा सिर्फ एक मैच या हार-जीत की कहानी नहीं था, बल्कि भारतीय क्रिकेट के असली परिवर्तन की शुरुआत थी। राजशाही परंपराओं के बीच जकड़े इस खेल को सीके नायडू जैसे खिलाड़ियों ने प्रतिभा और नेतृत्व के दम पर नई दिशा दी। बीसीसीआई के सीमित संसाधनों के बावजूद यह टीम दुनिया के सामने अपने साहस का परिचय देने में सफल रही। 

यही वह नींव थी, जिस पर आगे चलकर भारतीय क्रिकेट खड़ा हुआ। आज की सफलताएं उसी संघर्ष, साहस और बदलाव की कहानी को आगे बढ़ाती हैं।