मोगा 1989 जून, वो दिन जब पार्क बन गया था रणक्षेत्र और निहत्थे लोग हौसले के साथ गोलियों के सामने खड़े रहे। यह सिर्फ हमला नहीं था, साहस की सबसे बड़ी परीक्षा थी, जहां डर नहीं, बल्कि अंत में संकल्प जीता।
1990 का पंजाब…
एक ऐसा समय, जब हवा भी डरकर बहती थी। गांव हों या शहर, हर तरफ एक ही सवाल था, ‘अगला निशाना कौन?’
लेकिन इसी अंधेरे दौर में, कुछ लोग थे, जो हर सुबह बिना डरे एक मैदान में इकट्ठा होते थे। उनके हाथों में हथियार नहीं, बल्कि मन में अनुशासन और राष्ट्रभक्ति का संकल्प होता था। वे थे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक। आज हम आपको बताएंगे, उस नरसंहार के बारे में जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। 25 जून1989, वो तारीख जब अलगाववादियों ने विदेशी ताकतों के इशारे पर भारत की अखंडता में विश्वास रखने वाले संगठन को डराकर चुप कराना चाहा, पर ये ना हो सका।
तारीख 25 जून, 1989…
मोगा का जवाहरलाल नेहरू पार्क, एक साधारण सी सुबह, जैसे हर रोज होती थी।
सैर करने वाले लोग, खेलते बच्चे, और एक कोने में लग रही आरएसएस की शाखा… सब कुछ सामान्य था।
समय : सुबह के 6 बजकर 25 मिनट…
अचानक कुछ हथियारबंद लोग पार्क में घुसे। उन्होंने आते ही स्वयंसेवकों से कहा, “झंडा उतारो…।”
यह केवल एक आदेश नहीं था, यह चुनौती थी। पर स्वयंसेवकों ने इनकार कर दिया।
और फिर…क्या था…, अलगाववादियों ने बिना कुछ भी सोचे, चेतावनी दिए, गोलियां चलानी शुरू कर दीं। अंधाधुंध फायरिंग, हर तरफ भगदड़, चीखें और खून। कुछ ही मिनटों में 25 स्वयंसेवक वहीं ढेर हो गए और 35 से ज्यादा लोग घायल होकर जमीन पर तड़पने लगे। पार्क, जो कुछ देर पहले जीवन से भरा था, अब मौत की गवाही दे रहा था। लेकिन यह सब यहीं खत्म नहीं हुआ।
छोटे गेट के पास खड़े थे—ओम प्रकाश और उनकी पत्नी छिंदर कौर। वे निहत्थे थे, उन्होंने आतंकियों को भागते देखा, तो वे डरकर छिपे नहीं, बल्कि उनका सामना करने के लिए आगे बढ़े। उन्होंने जोर से ललकारा, दोनों ने मिलकर आतंकियों को रोकने और पकड़ने का प्रयास किया। यह जानते हुए भी कि सामने AK-47 जैसे घातक हथियार हैं, उन्होंने पीछे हटना स्वीकार नहीं किया। लेकिन अगले ही क्षण, गोलियों की तेज बौछार हुई और दोनों वहीं गिर पड़े।

खालिस्तानी आतंक की गोली से बलिदान हुए वीर
उसी समय, पास में खेल रही डेढ़ साल की मासूम बच्ची—डिंपल…वह भी इस हिंसा की शिकार बन गई। उस दिन मौत ने किसी का धर्म नहीं देखा, सिर्फ इंसान मारे गए।
एक 10 साल का बच्चा नितिन जैन, यह सब अपनी आंखों से देख रहा था। उसे लगा जैसे कोई खेल चल रहा हो…, वह भी भागते हुए आतंकियों के पीछे दौड़ पड़ा।
लेकिन किसी ने उसे पकड़कर घर भेज दिया। शायद इसलिए… ताकि वह जिंदा रहे और इस सच्चाई का गवाह बन सके। फायरिंग के कुछ समय बाद, पार्क में लगाया गया एक शक्तिशाली बम भी फट गया, जिसमें एक दंपत्ति और दो पुलिसकर्मी मारे गए।
मोगा के इस नरसंहार ने पंजाब समेत पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। हर घर में मातम था। हर आंख में आंसू थे।
उस हमले में कई नाम इतिहास बन गए— लेखराज धवन, बाबू राम, भगवान दास, शिव दयाल, मदन गोयल, मदन मोहन, प्रभजोत सिंह, नीरज, जगदीश भगत, वेद प्रकाश पुरी, भजन सिंह, सतपाल सिंह कालड़ा, सिख दंपत्ति ओम प्रकाश और उनकी पत्नी छिंदर कौर। और ऐसे ही कई अन्य…। हर नाम के पीछे एक परिवार था, एक सपना था। हमले के बाद, कुछ देर के लिए लगा कि आतंक जीत गया…
लेकिन इस कहानी का सबसे बड़ा मोड़ अभी बाकी था…
अगले ही दिन—26 जून 1989। वही नेहरू पार्क…, वही जमीन, जहां अभी खून के निशान सूखे भी नहीं थे… वहां फिर से शाखा लगी। करीब 100 स्वयंसेवक आए। न कोई डर, न कोई गुस्सा, सिर्फ संकल्प।
उन्होंने एक गीत गाया—
“कौन कहता है हिंदू-सिख वख ने, ऐ भारत मां दी सज्जी-खब्बी अख ने…”
यह गीत नहीं था, यह जवाब था। उन गोलियों का जवाब, जो एकता को तोड़ना चाहती थीं।
इस घटना ने साफ कर दिया कि आतंक का मकसद चाहे जितना बड़ा हो,
अगर समाज एकजुट हो जाए, तो उसे हराया जा सकता है। मोगा का यह नरसंहार सिर्फ एक दुखद घटना नहीं, बल्कि यह एक ऐसी कहानी बन गया, जिसमें दर्द भी है, बलिदान भी… और सबसे बढ़कर, एकता की जीत भी।
आज भी, जब 25 जून आता है, तो मोगा की हवा में एक खामोश सवाल गूंजता है—
“क्या गोलियां इंसानियत को खत्म कर सकती हैं?” और उसी हवा में कहीं से जवाब आता है—
“नहीं…
क्योंकि जहां बलिदान होता है,
वहां एकता और भी मजबूत होकर जन्म लेती है।

मोगा के पार्क में मारे गए लोगों की याद में 24 जून, 1990 को एक स्मारक बनाया गया शहीदी पार्क। पीड़ित परिवारों की मदद और स्मारक की देखभाल के लिए एक समिति भी बनाई गई। यह समिति हर साल 25 जून के बाद आने वाले पहले रविवार को सभी शहीदों को श्रद्धांजलि देती है।
इस सच्ची और पूरी कहानी से एक बात तो साफ है कि जहां कहीं भी देश को तोड़ने की कोशिश होती है, वहां स्वयंसेवक सबसे आगे खड़े दिखाई देते हैं। चाहे 1947 का विभाजन हो, 1984 के दंगे हों या 1980-90 का आतंक का समय, हर दौर में स्वयंसेवकों ने हिंदू-सिख दोनों की रक्षा के लिए काम किया।

