इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की वो परीक्षा, जब सीवी रमन भी दंग रह गए : रज्जू भैया से जुड़ी अनसुनी कहानी!

राजेंद्र सिंह

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इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला में उस दिन सिर्फ एक परीक्षा नहीं हो रही थी, बल्कि भारतीय विज्ञान के भविष्य की एक अद्भुत झलक सामने आने वाली थी। यहां दो बड़े व्यक्तित्वों का मिलन होने वाला था। यह थे, भारत के महान वैज्ञानिक और नोबेल पुरस्कार विजेता सीवी रमन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के  बाद में सरसंघचालक बने राजेंद्र सिंह यानी रज्जू भैया। 

रज्जू भैया उन दिनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञान से एमएससी कर रहे थे। यह वह दौर था, जब विज्ञान की दुनिया में सीवी रमन देवतुल्य प्रतिष्ठा रखते थे। ऐसे में जब वही रमन किसी छात्र की प्रतिभा से प्रभावित हो जाएं, तो यह साधारण बात नहीं हो सकती थी। उस दिन इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला में कुछ ऐसा ही हुआ था।

बात साल 1942 की है। रज्जू भैया इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञान में एमएससी अंतिम वर्ष की पढ़ाई कर रहे थे। उन दिनों विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर केएस कृष्णन थे, जो स्वयं सीवी रमन के प्रिय शिष्य थे। इसी कारण रमन का इलाहाबाद आना-जाना लगा रहता था। एमएससी की अंतिम प्रायोगिक परीक्षा में रमन बाह्य परीक्षक बनकर पहुंचे। परीक्षा के दौरान रज्जू भैया को ‘रमन इफेक्ट’ से संबंधित प्रयोग प्रस्तुत करना था। उन्होंने अपने द्वारा खींची गई स्पेक्ट्रोस्कोपी की तस्वीर रमन को दिखाई।

रमन ने तस्वीर देखते ही पूछा कि यह किस पदार्थ की है। रज्जू भैया ने आत्मविश्वास से कहा ‘यह बेंजीन है।’  रमन ने तुरंत कहा कि यह बेंजीन नहीं, बल्कि कार्बन टेट्राक्लोराइड है। 

आम छात्र शायद वहां घबरा जाता, लेकिन रज्जू भैया शांत रहे। उन्होंने आत्मविश्वास के साथ उत्तर दिया कि वह इसे बेंजीन इसलिए कह रहे हैं क्योंकि प्रोफेसर कृष्णन ने उन्हें ऐसा बताया था।

रज्जू भैया का यह उत्तर सुनकर रमन चौंक गए। उन्होंने तुरंत प्रोफेसर कृष्णन से हंसते हुए कहा कि ‘तुम्हारा यह छात्र रमन से भी अधिक तुम पर विश्वास करता है।’ 

यह केवल हास्य का क्षण नहीं था, बल्कि रज्जू भैया की स्पष्टता, आत्मविश्वास से रमन बहुत प्रभावित हुए। आखिर में सीवी रमन ने ‘रज्जू भैया’ के प्रायोगिक परीक्षा का परिणाम देखा। रज्जू भैया ने रमन इफेक्ट स्वयं सीवी रमन से भी अच्छी तरीके से सिद्ध किया था। साथ ही उन्होंने रमन के सिद्ध फॉर्मूले से हटकर ऐसा करके परिणाम प्राप्त किया। यह देखकर रमन जी, रज्जू भैया से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने प्रायोगिक परीक्षा में रज्जू भैया को 100 में से 100 नंबर दिया।

यह वही दौर था, जब भारत में नाभिकीय भौतिकी जैसे विषय के विशेषज्ञ बहुत कम थे, लेकिन रज्जू भैया इस कठिन विषय को बहुत सरलता से समझ जाते थे। यही कारण था कि जब एमएससी अंतिम वर्ष का उनका परिणाम आया, तो उन्होंने पूरे विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान प्राप्त किया। रज्जू भैया के परमाणु भौतिकी पर मजबूत पकड़ को देखते हुए सीवी रमन ने उन्हें बेंगलुरु में अपने साथ वैज्ञानिक शोध करने के लिए आमंत्रित किया। लेकिन तब तक रज्जू भैया संघ के बहुत निकट आ चुके थे। साथ ही उन्हें अध्यापन कार्य से बहुत लगाव था। इसलिए उन्होंने रमन जी से विनम्रता पूर्वक कहा कि वह अपना जीवन संघ को दे चुके हैं। बेंगलुरु जाना संभव नहीं है।

इस घटना के कुछ समय बाद श्रीगुरु जी और सीवी रमन जी की भेंट हुई। तब सीवी रमन ने उनसे मजाकिया अंदाज में कहा कि आपने देश से एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक छीन लिया। तब गुरु जी ने भी मुस्कुराते हुए उत्तर दिया कि देश को और भी वैज्ञानिक मिल जाएंगे, लेकिन संघ के पास को सिर्फ एक ही रज्जू भैया हैं। 

जन्म और संघ से जुड़ाव

राजेंद्र सिंह यानी ‘रज्जू भैया’ का जन्म  29 जनवरी, 1922 को बुलंदशहर जिले के बनैल गांव में हुआ। उनके पिता कुंवर बलबीर सिंह अंग्रेजी शासन काल के पहले भारतीय मुख्य अभियंता थे। रज्जू भैया इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने के दौरान संघ के संपर्क में आए। जिसके बाद वर्ष 1943 में उन्होंने संघ शिक्षा वर्ग का प्रशिक्षण किया। इस दौरान वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर थे। अध्यापन कार्य के साथ-साथ उन्होंने संघ के कार्य को जारी रखा। साल 1966 में वह प्रोफेसर पद से त्यागपत्र देकर संघ के प्रचारक बने। इस प्रकार 1977 में वह सह सरकार्यवाह, 1978 में सरकार्यवाह और 1994 में सरसंघचालक बने। जीवन भर संघ कार्य करते हुए रज्जू भैया का शरीर  14 जुलाई, 2003 को कौशिक आश्रम, पुणे में पूर्ण हुआ।