भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में, कुछ मेल-जोल केवल राजनीतिक नहीं थे, वे पूरे एक युग के लिए मार्गदर्शक प्रकाश-स्तंभ थे। ऐसा ही एक बंधन था रवींद्रनाथ टैगोर, वह कवि जो अहिंसा के उपासक थे और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बीच, जो जो सशस्त्र संघर्ष में विश्वास रखते थे। उनके बीच केवल आपसी सम्मान ही नहीं था, बल्कि एक ऐसा आध्यात्मिक जुड़ाव था, जो राष्ट्र के प्रति अटूट प्रेम से ओत-प्रोत था। यदि एक का योगदान कविता था, तो दूसरे का योगदान वह क्रांति थी, जिसने उन कविताओं में प्राण फूंक दिए। यह इस बात का विश्लेषण है कि कैसे एक कवि ने अपने शब्दों के माध्यम से एक योद्धा के लिए सुरक्षा-कवच का काम किया, ठीक उस समय, जब वह राजनीतिक रूप से पूरी तरह अलग-थलग पड़ गया था।
मोतीलाल नेहरू ने कभी धन-दौलत, पश्चिमी सूट और शाही आराम वाली जिंदगी जी थी। फिर जलियांवाला बाग की आवाजें उन तक पहुंचीं। धीरे-धीरे विलासिता की जगह त्याग ने ले ली।
अहमदशाह अब्दाली, महमूद गजनवी जैसे क्रूर इस्लामिक आक्रांताओं ने जिस धरती से आकर भारत में लूटपाट और निर्दोष हिंदुओं का नरसंहार किया, उसी गांधार (अफगानिस्तान) की धरती पर एक भारतीय वीर की ऐसी कहानी छिपी है, जिसे वामपंथी इतिहासकारों ने इतिहास के पन्नों में दबा दिया। यह सच्ची कहानी एक ऐसे भारतीय शूरवीर की है, जिसके भय से कट्टरपंथी अफगानी पठान थर-थर कांपते थे। उसका खौफ इतना कि अफगानी पठान डर के मारे महिलाओं का सलवार पहने लगे थे।
यह योद्धा कोई और नहीं, बल्कि महान भारतीय शासक महाराजा रणजीत सिंह के सेनापति सरदार हरि सिंह नलवा थे। जब उन्हें सीमांत इलाकों (खैबर पख्तूनख्वा और अफगानिस्तान) का गवर्नर बनाया गया, तो डर के मारे कट्टरपंथी अफगान कबीलों ने अपनी इस्लामिक पहचान तक बदल डाली। हरि सिंह नलवा की यह कोई सामान्य सैन्य विजय नहीं थी, बल्कि यह वह दौर था, जब एक भारतीय योद्धा ने सिर्फ भूगोल ही नहीं, बल्कि शत्रुओं की संस्कृति तक को प्रभावित कर दिया था।
20वीं सदी के आरंभिक दशकों में, रंगून (यांगून) कई भारतीय औपनिवेशिक शहरों जैसा ही दिखता था। भारतीय व्यापारी अपना कारोबार चलाते थे, तमिल गोदी-मजदूर बंदरगाह पर जहाजों से माल उतारते थे और बंगाल के क्लर्क सरकारी दफ्तरों में काम करते थे।
ऐसा इसलिए था क्योंकि बर्मा कोई अलग उपनिवेश नहीं था, उस पर ब्रिटिश भारत के एक प्रांत के तौर पर शासन किया जाता था। यह व्यवस्था 1885 में तीसरे एंग्लो-बर्मीज युद्ध के बाद बर्मा को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाए जाने के समय से चली आ रही थी। इसके बाद, ब्रिटिश शासकों ने इस क्षेत्र को भारतीय साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में शामिल कर लिया था। दशकों तक, बर्मा से जुड़े फैसले वही औपनिवेशिक नौकरशाही लेती थी, जो बंबई, मद्रास और कलकत्ता पर शासन करती थी।
Nehru-Liaquat Pact: 1950 में, भारत अभी भी बंटवारे के झटकों से उबर रहा था। पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) से हिंदू और बौद्ध शरणार्थियों की बाढ़ पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और असम में आ रही थी। हर ट्रेन और गाड़ी में घरों पर कब्जा, मंदिरों को तोड़ने और परिवारों के अलग होने की कहानियां थीं।
2010 का दंतेवाड़ा हमला भारत की अंदरूनी सुरक्षा के इतिहास में सबसे भयानक नक्सली हमलों में से एक है। इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। यह आर्टिकल उस काले दिन की क्रूरता, मास्टरमाइंड माडवी हिडमा की बेरहमी से की गई प्लानिंग और नवंबर 2025 में नक्सली आंदोलन को लगे आखिरी झटके, जब सुरक्षा बलों ने आखिरकार हिडमा को खत्म कर दिया, के बारे में डिटेल में बताता है।
एक दौर था जब अमेरिकी सीनेट हॉल में हिंदू शास्त्रों का पाठ होते ही ईसाई कट्टरपंथी इसे “अभिशाप” बताते हुए चिल्ला उठे थे। उन्होंने इसे जीसस का अपमान बताया था। लेकिन उसी अमेरिका में आज हिंदू धर्म ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता पर जनप्रतिनिधि पद और गोपनीयता की शपथ ले रहे हैं। इस लेख में हम आपको चरणबद्ध तरीके से बताएंगे कि कैसे 2007 में ईसाई मिशनरियों ने सीनेट में हिंदू प्रार्थना होने पर हंगामा किया था।
अमेरिका के ओक्लाहोमा राज्य सीनेट में प्रार्थना करते पुजारी राजन जेड, इमेज सोर्स- The Oklahomanऔर पढ़ें
जब 1980 के दशक की शुरुआत में ईसाई धर्म का प्रचारक माइकल डिसूजा तमिलनाडु आए, तो उन्हें जल्दी ही एक बात समझ में आ गई। वह बात, जो चर्च सदियों से जानता तो था लेकिन शायद ही कभी खुलकर मानता था। वह यह कि भारत को भारत के लोगों को टकराव से नहीं बदला जा सकता। भारतीय लोगों की परंपराएं बहुत पुरानी थीं, उनकी सभ्यता की जड़ें बहुत गहरी थीं, उनकी सांस्कृतिक जुड़ाव बहुत मजबूत था।
भारत के संविधान संशोधनों के लंबे इतिहास में, जिसमें कुल 106 संशोधन हुए, 1976 का 42वां संशोधन सबसे विवादास्पद रहा। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में आपातकाल के दौरान पारित यह संशोधन इतना व्यापक था कि इसे ‘लघु संविधान’ का उपनाम दिया गया।
इस संविधान दिवस (26 नवंबर) पर, हम आपको भारतीय संविधान के सबसे विवादास्पद संशोधनों में से एक, 42वें संशोधन की याद दिलाते हैं, जिसने संवैधानिक प्राधिकारियों (यानी वे संस्थाएं या पद, जिन्हें भारतीय संविधान द्वारा स्थापित किया गया है, जैसे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, संसद, न्यायपालिका, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG), चुनाव आयोग आदि) के बीच कई शक्तियों संतुलन को बदल दिया था।
गंगा भारत की सबसे पवित्र नदी है, जो गोमुख से निकलकर बंगाल की खाड़ी तक लगभग 2,525 किमी बहती है। यह पांच राज्यों से गुजरते हुए 40 करोड़ लोगों को जीवन, जल और आजीविका देती है। गंगाजल में मौजूद बैक्टीरियोफेज इसे प्राकृतिक रूप से शुद्ध रखते हैं, इसलिए इसे ‘मां गंगा’ कहा जाता है। 4 नवंबर 2008 को इसे राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया। 2025 में महाकुंभ के दौरान गंगा प्रदूषण पर कई भ्रामक रिपोर्टें सामने आईं, जबकि वैज्ञानिक अध्ययन इसके जल की विशिष्ट शुद्धता की पुष्टि करते हैं।