19वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में जब अंग्रेज धीरे-धीरे भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर रहे थे, तब मेघालय की पहाड़ियों से एक ऐसा योद्धा उभरा, जिसने साम्राज्यवादी ताकतों को खुली चुनौती देने का साहस किया। वह वीर थे, तिरोट सिंह। खासी पहाड़ियों के इस महान शासक ने सिर्फ अपनी भूमि की रक्षा के लिए संघर्ष ही नहीं किया, बल्कि देश की स्वतंत्रता और सम्मान को बचाने के लिए अपने प्राणों तक की आहुति दे दी।
यांडाबो संधि (24 फरवरी 1826) के बाद जब अंग्रेजों ने असम और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में अपने प्रभाव का विस्तार शुरू किया, तब ब्रिटिश अधिकारी डेविड स्कॉट ने गुवाहाटी को सिलहट से जोड़ने के लिए एक सड़क बनाने की योजना बनाई। यह मार्ग खासी पहाड़ियों से होकर गुजरने वाला था। इसलिए उन्होंने मेघालय में नोंग्खलो (Nongkhlaw) के प्रमुख तिरोट सिंह से अनुमति मांगी।
तिरोट सिंह अपनी प्रजा के हितों को सर्वोपरि मानने वाले शासक थे। उन्होंने सोचा कि इस सड़क से व्यापार बढ़ेगा और उनके लोगों को आवागमन में सुविधा होगी। इसी विश्वास के साथ उन्होंने अंग्रेजों को अनुमति दे दी। लेकिन अंग्रेजों की नीयत केवल सड़क निर्माण तक सीमित नहीं थी। वे इस क्षेत्र पर स्थायी नियंत्रण स्थापित करना चाहते थे। जब तिरोट सिंह को यह आभास हुआ कि अंग्रेज उनकी भूमि और स्वतंत्रता पर कब्जा जमाने की योजना बना रहे हैं, तब उनके भीतर प्रतिरोध की ज्वाला भड़क उठी। उन्होंने समझ लिया कि यह केवल सड़क का निर्माण नहीं, बल्कि खासी पहाड़ियों की स्वतंत्रता पर हमला है।
तिरोट सिंह की सबसे बड़ी वीरता इस बात में थी कि उन्होंने अंग्रेजों की शक्ति से भयभीत होने के बजाय उनका सामना करने का निर्णय लिया। अप्रैल 1829 में उन्होंने एक दरबार बुलाकर अंग्रेजों को नोंग्खलो छोड़ने का आदेश दिया, लेकिन जब अंग्रेज नहीं माने, तब उन्होंने युद्ध का बिगुल फूंक दिया।
4 अप्रैल 1829 को तिरोट सिंह के नेतृत्व में खासी योद्धाओं ने गुरिल्ला युद्ध छेड़ते हुए ब्रिटिश सेना के अधिकारी लेफ्टिनेंट बेडिंगफील्ड और बर्लटन का वध कर डाला। यह घटना अंग्रेजों के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं थी। पहाड़ियों में रहने वाले जनजातीय योद्धाओं ने यह साबित कर दिया कि वे अपनी भूमि की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। उनका यह साहस उत्तर-पूर्व भारत में अंग्रेजों के खिलाफ सबसे प्रबल विद्रोहों में गिना जाने लगा।
हालांकि अंग्रेजों के पास आधुनिक बंदूकें, तोपें और प्रशिक्षित सैनिक थे, जबकि खासी योद्धाओं के पास पारंपरिक हथियार धनुष, बाण और तलवारें थीं। फिर भी तिरोट सिंह ने हार नहीं मानी। उन्होंने गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई और पहाड़ियों तथा जंगलों को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया। अंग्रेजों के लिए खासी पहाड़ियों में लड़ना आसान नहीं था। हर मोड़ पर उन्हें तिरोट सिंह और उनके साथियों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ता था। तिरोट सिंह जानते थे कि संसाधनों की कमी के बावजूद यदि मन में स्वतंत्रता की आग जलती रहे, तो सबसे शक्तिशाली साम्राज्य को भी चुनौती दी जा सकती है।
हालांकि समय बीतने के साथ कई खासी सरदारों ने आत्मसमर्पण कर दिया, लेकिन तिरोट सिंह के मन में बस एक बात बसी थी, वह थी अंग्रेजों को खदेड़कर भारत की धरती को स्वतंत्र कराना। कई सरदारों के अलग होने के बाद भी साल 1833 तक उन्होंने पहाडियों और जंगलों में शरण लेते हुए अंग्रेजों के खिलाफ अभियान जारी रखा। अब उनका भय इतना हो गया था कि अंग्रेजों ने अकेले निकलने के बजाए समूहों में निकलना शुरु कर दिया।
अंग्रेज कैसे भी करके तिरोट सिंह को पकड़ना चाहते थे। इसके लिए अंग्रेजों मे छल का सहारा लिया। 13 जनवरी 1833 को ब्रिटिश अधिकारी इंग्लिश ने तिरोट सिंह को समझौते के लिए बुलाया। साथ ही उसने खासी परंपरा के अनुसार तलवार की धार पर नमक रखकर कसम भी खाई कि वह उन्हें गिरफ्तार नहीं करेगा। लेकिन जब तिरोट सिंह मिलयम के लूम मैदान में इंग्लिश से बातचीत के लिए गए। अंग्रेजों ने छल से उन्हें बंदी बनाकर ढाका जेल में कैद कर दिया।
अंग्रेज तिरोत सिंह को बंदी बनाकर गुवाहाटी लाए। यहां से उन्हें ढाका भेजा गया। यहां कैद में अंग्रेजों ने उन्हें अनेकों यातनाएं दीं। लेकिन उन्होंने अंग्रेजों की दासता को स्वीकार नहीं किया। जब यातनाओं ने बात नहीं बनी, तो अंग्रेजों ने उन्हें प्रलोभन दिया कि आप अपने राज्य वापस जा सकते हैं। लेकिन ब्रिटिश सरकार के अधीन रहना होगा। लेकिन तिरोट सिंह ने अंग्रेजों के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उन्होंने साफ कहा कि “गुलाम राजा के जीवन से बेहतर है मैं आजाद रहकर मरूं।” इस प्रकार अंग्रेजों की कैद में प्रताड़ना झेलते हुए तिरोट सिंह सिंह की 17 जुलाई, 1835 को मृत्यु हो गई।
इस प्रकार तिरोट सिंह ने अनेकों यातनाओं को सहा, लेकिन मृत्यु भी उनके साहस को मिटा नहीं सकी। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षण तक यह सिद्ध किया कि एक सच्चा देशभक्त कभी अन्याय के सामने झुकता नहीं। उनका संघर्ष यह संदेश देता है कि स्वतंत्रता केवल तलवारों से नहीं, बल्कि अटूट इच्छाशक्ति और बलिदान से प्राप्त होती है। आज भी मेघालय की पहाड़ियों में तिरोट सिंह का नाम गर्व और सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकी स्मृति में 17 जुलाई को ‘तिरोट सिंह दिवस’ मनाया जाता है। साथ ही उनकी गिनती भारत के महान स्वतंत्रता सेनानियों के रूप में होती है।

