गोपीनाथ बोरदोलोई ने कांग्रेस, जिन्ना और अंग्रेजों का विरोध करके असम को पाकिस्तान का हिस्सा बनने से कैसे बचाया

Gopinath Bordoloi

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जब कोई 1947 के बंटवारे के बारे में सोचता है, तो सबसे पहले यही ख्याल आता है कि पंजाब और बंगाल को कितनी बेरहमी से अलग किया गया था। शरणार्थियों से भरी ट्रेनें, दंगे, टूटे हुए परिवार और भारत-पाकिस्तान के जन्म की तस्वीरें आंखों के सामने आ जाती हैं। 

लेकिन, बहुत कम लोगों को याद है कि एक और इलाका भी दांव पर लगा था और पाकिस्तान का हिस्सा बनने की कगार पर था, असम। लेकिन एक इंसान ने ऐसा होने से रोक लिया। वह थे, गोपीनाथ बोरदोलोई। इन्होंने यह पक्का करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी कि असम पाकिस्तान में शामिल न हो, और उन्होंने कांग्रेस, मुस्लिम लीग और ब्रिटिश राज के खिलाफ बहादुरी से मोर्चा संभाला। आज, ‘लोकप्रिय’ या ‘असम के शेर’ के तौर पर याद किए जाने वाले गोपीनाथ बोरदोलोई ही थे, जिन्होंने यह सुनिश्चित किया कि असम भारत के नक्शे में शामिल हो।

ब्रिटिश कैबिनेट मिशन भारत पहुंचा

कहानी दूसरे विश्व युद्ध के बाद, 1945 में शुरू हुई, जब ब्रिटेन को एहसास हुआ कि वह अब भारत पर राज नहीं कर सकता। ऐसे में उसने सत्ता हस्तांतरण की योजना बनाने के लिए ब्रिटिश कैबिनेट मिशन भेजा। 1946 में भारत पहुंचकर, मिशन ने प्रांतों को अलग-अलग वर्गों में बांटने का प्रस्ताव रखा। असम को बंगाल के साथ रखा गया, जिससे उसका एक मुस्लिम-बहुल गुट के भीतर अपनी राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान खोने का डर पैदा हो गया। ये चिंताएं इसलिए और बढ़ गईं क्योंकि बंगाली मुस्लिम किसानों के बड़े पैमाने पर पलायन ने असम की जनसांख्यिकी को पहले ही बदल दिया था। 1901 में मुसलमानों की आबादी लगभग 12–15% थी, जो 1941 तक बढ़कर 25.31% हो गई थी।

इस बदलाव को पहचानते हुए, मुस्लिम लीग असम को पूर्वी पाकिस्तान के भविष्य के लिए बेहद जरूरी मानने लगी। सैयद मुहम्मद सादुल्ला के नेतृत्व में, ‘ग्रो मोर फूड’ (अधिक अन्न उगाओ) अभियान के जरिए पलायन और तेज हो गया। इस अभियान ने प्रवासी किसानों के नए बसाव को बढ़ावा दिया, यहां तक कि आदिवासी इलाकों में भी। आलोचकों का तर्क था कि यह अभियान भोजन के बारे में कम और असम में मुस्लिम प्रभाव बढ़ाने के बारे में ज़्यादा था, जिससे अंततः इस प्रांत को पूर्वी बंगाल से जोड़ने की मांगों को और मजबूती मिली।

गोपीनाथ बोरदोलोई का कड़ा विरोध और कांग्रेस के साथ संघर्ष

हालांकि, जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने असम को बंगाल के साथ ग्रुप में रखने के नतीजों को नहीं समझा और मुस्लिम लीग तथा ब्रिटिश राज को खुश करने में लगी रही। इस तरह, पार्टी ने मिशन के प्रस्ताव को मान लिया। दूसरी ओर, मुस्लिम लीग के लिए यह बात उनके मन की थी, क्योंकि इससे एक अलग मुस्लिम राष्ट्र बनने की राह खुलती थी, इसलिए उन्होंने भी इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

लेकिन यह बात गोपीनाथ बोरदोलोई को मंजूर नहीं थी, जो सर सैयद मुहम्मद सादुल्ला के हटने के बाद असम के प्रीमियर बने थे। 1 अप्रैल, 1946 को बोरदोलोई ने मिशन के सदस्यों से मुलाकात की और असम को ‘ग्रुप C’ में शामिल किए जाने का जोरदार विरोध किया। उन्होंने साफ कहा कि असम को राजनीतिक तौर पर बंगाल के अधीन नहीं किया जा सकता। उन्होंने तर्क दिया कि असम पहले से ही भाषा और संस्कृति के आधार पर बना एक प्रांत है और उसे एक स्वायत्त इकाई के तौर पर ही बने रहने का अधिकार है। हालांकि, मिशन ने ग्रुपिंग में किसी भी तरह का बदलाव करने से साफ इनकार कर दिया।

यह इनकार बोरदोलोई के लिए एक बड़ी चुनौती थी। इसलिए, उन्होंने कांग्रेस का समर्थन हासिल करने की कोशिश की। 19 मई, 1946 को कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) को दिए गए एक ज्ञापन में, उन्होंने अंग्रेजों के ‘ग्रुपिंग प्रस्ताव’ को एक ‘खतरनाक प्रस्ताव’ बताया। उन्होंने कहा कि यदि कांग्रेस इसका समर्थन जारी रखती है, तो यह असम के साथ विश्वासघात होगा। 

हालांकि, नेहरू अपनी बात से पीछे नहीं हटे। इसके विपरीत, उन्होंने असम के ‘अड़ियल’ रवैये की आलोचना की और आशंका जताई कि इससे राष्ट्रीय स्तर पर चल रही बातचीत और अधिक जटिल हो जाएगी। नेहरू ने तो असम विधानसभा की ‘ग्रुपिंग’ मुद्दे’ पर समझ पर भी सवाल उठाए, लेकिन बोरदोलोई ने इसका तीखा जवाब देते हुए कहा कि असम को इस बारे में कोई भ्रम नहीं है, बल्कि असल में नेहरू के भाषण ही लोगों को भ्रमित कर रहे हैं।

नेहरू के मना करने के बाद, बोरदोलोई ने अब मोहनदास करमचंद गांधी का समर्थन चाहा। इसलिए, उन्होंने गांधी से मिलने के लिए असम के दो नेताओं को भेजा, विजय चंद्र भगवती और महेंद्र मोहन चौधरी। इन असमिया नेताओं से बातचीत के बाद, गांधी असम के समर्थन में सामने आए। उन्होंने कहा कि असम को ग्रुपिंग प्लान को पूरी तरह से खारिज कर देना चाहिए और, अगर ज़रूरी हो, तो संविधान सभा से भी हट जाना चाहिए। उन्होंने आगे कहा, “अगर आप अभी सही कदम नहीं उठाते हैं, तो असम खत्म हो जाएगा… असम को अपनी आत्मा नहीं खोनी चाहिए।” गांधी के दखल के बाद, कांग्रेस का नेतृत्व असम की चिंताओं को अब और नज़रअंदाज़ नहीं कर सका।

इसके साथ ही, पूरे असम में बोरदोलोई के नेतृत्व में विरोध आंदोलन शुरू हो गया। 15 जून, 1946 को पूरे असम में ‘एंटी-ग्रुपिंग डे’ मनाया गया। ब्रह्मपुत्र घाटी और यहां तक कि दूर-दराज के अंदरूनी इलाकों में भी सभाएं, रैलियां और जुलूस निकाले गए। यह आंदोलन 16 जुलाई, 1946 को अपने सबसे अहम मोड़ पर पहुंचा, जब असम विधानसभा ने बोरदोलोई द्वारा पेश किया गया एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया। इस प्रस्ताव में कैबिनेट मिशन के प्लान को खारिज कर दिया गया और संविधान सभा में असम के प्रतिनिधियों को निर्देश दिया गया कि वे असम का संविधान बनाने के लिए या किसी भी संयुक्त ‘ग्रुप C’ संविधान को बनाने के लिए बंगाल के साथ न बैठें।

उस समय, जिन्ना ने असम के प्रस्ताव का ज़ोरदार विरोध किया और इस बात पर अड़े रहे कि असम पाकिस्तान का ही हिस्सा है। लेकिन बोरदोलोई अपनी बात पर कायम रहे और कहा, ‘जिन्ना भले ही चांद को जमीन पर उतार लाने का सपना देख लें, लेकिन असम को भारत से अलग करके पाकिस्तान में मिलाना, महज एक सपना ही बनकर रह जाएगा।’ 

इसके साथ ही, कैबिनेट मिशन विफल हो गया, और जब 1947 में देश का बंटवारा हुआ, तो असम भारत का ही हिस्सा बना रहा। अगर गोपीनाथ बोरदोलोई ने कैबिनेट मिशन की ‘ग्रुपिंग योजना’ का विरोध न किया होता, तो भारत का राजनीतिक भूगोल आज से बिल्कुल अलग हो सकता था। हो सकता है कि पूरा पूर्वोत्तर भारत से पूरी तरह कटकर अलग हो गया होता, जिससे देश का रणनीतिक, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय भविष्य मौलिक रूप से बदल जाता।