18 जुलाई 1948 की वह काली रात…
तिथवाल की पहाड़ियों पर हर तरफ बारूद की गंध फैली हुई थी। ऊपर से दुश्मन की मशीन गनें आग उगल रही थीं और नीचे भारतीय सैनिक मौत से लड़ते हुए पहाड़ी पर चढ़ रहे थे। तभी गोलियों और धमाकों के बीच एक ऐसी गर्जना गूंजी, जिसने दुश्मन की रूह तक हिला दी— “राजा रामचंद्र की जय!”
यह आवाज थी पीरू सिंह शेखावत की।
उस सैनिक की, जिसने अकेले दुश्मन की पूरी पोस्ट को तबाह कर दिया और खुद मिट्टी में मिल गया, लेकिन तिथवाल की रिज पर भारत का मस्तक झुकने नहीं दिया।
1947 में देश आजाद हुआ, लेकिन इसके साथ ही भारत-पाकिस्तान युद्ध आरम्भ हो गया। पाकिस्तान ने कबाइलियों और सैनिकों की मदद से जम्मू-कश्मीर पर हमला बोल दिया। जुलाई 1948 तक लड़ाई तिथवाल सेक्टर तक पहुंच चुकी थी। किशनगंगा नदी के आसपास की चौकियों पर पाकिस्तान लगातार हमले कर रहा था। 8 जुलाई को दुश्मन ने ‘रिंग कंटूर’ नाम की ऊंची पोस्ट पर कब्जा कर लिया। इस पोस्ट से वे भारतीय सेना की हर गतिविधि पर नजर रख सकते थे। अगर यह पोस्ट दुश्मन के कब्जे में रहती, तो भारतीय सेना का आगे बढ़ना लगभग असंभव था।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए 6 राजपूताना राइफल्स को उरी से तिथवाल भेजा गया। उन्हें 163 ब्रिगेड को मजबूत करने और दुश्मन से वह रणनीतिक पोस्ट वापस लेने का आदेश मिला। 11 जुलाई 1948 को भारतीय सेना ने हमला शुरू किया। कई दिनों तक लगातार गोलाबारी होती रही, लेकिन दुश्मन ऊंचाई पर मजबूत बंकरों में बैठा था। टोही रिपोर्टों ने साफ कर दिया कि आगे बढ़ने के लिए उस ऊंची पोस्ट को हर हाल में कब्जे में लेना जरूरी है।

इसके लिए 6 राजपूताना राइफल्स की दो कंपनियां बनाई गईं, ‘सी’ और ‘डी’।
‘डी कंपनी’ को पहला लक्ष्य कब्जाने का आदेश मिला और उसी कंपनी में सेक्शन कमांडर थे, पीरू सिंह।
18 जुलाई 1948 की रात लगभग 1 बजे अंतिम हमला शुरू हुआ। दुश्मन की पोस्ट तक पहुंचने का रास्ता बेहद खतरनाक था। वह मुश्किल से एक मीटर चौड़ा संकरा रास्ता था, जिसके दोनों तरफ गहरी खाइयां थीं। ऊपर पहाड़ी पर बैठे पाकिस्तानी सैनिक मशीन गनों, मोर्टार और ग्रेनेड से लगातार हमला कर रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे मौत खुद पहाड़ी पर बैठी हो।
उन्होंने देखा कि सबसे ज्यादा तबाही दुश्मन की मीडियम मशीन गन पोस्ट मचा रही है। वही पोस्ट भारतीय सैनिकों को आगे बढ़ने से रोक रही थी। तभी पीरू सिंह अचानक उठे और अकेले दुश्मन की ओर दौड़ पड़े।
उनकी यह गर्जना पहाड़ियों में गूंज रही थी।

लाल घेरे में दिख रहा है उरी से तिथवाल तक का रास्ता और वो जगह जहां पर लड़े थे पीरू सिंह. Image Source- Aaj Tak
पीरू सिंह पहली मशीन गन पोस्ट तक पहुंच गए।
उन्होंने अपनी स्टेन गन और खंजर से ऐसा हमला किया कि दुश्मन के सैनिक संभल ही नहीं पाए। कुछ ही मिनटों में उन्होंने पूरी पोस्ट पर कब्जा कर लिया और खतरनाक मशीन गन को हमेशा के लिए खामोश कर दिया।
लेकिन जब उन्होंने पीछे मुड़कर देखा, तो उनके सारे साथी या तो शहीद हो चुके थे या गंभीर रूप से घायल पड़े थे।
अब उस पहाड़ी पर वे अकेले लड़ रहे थे।
पीरू सिंह के कदम थमे नहीं।
उनकी आंखों के सामने अब दुश्मन की दूसरी मशीन गन पोस्ट थी। पाकिस्तानी मशीन गन बंकर की तरफ वो अकेले ही झपट पड़े। तभी अचानक एक दुश्मनी ग्रेनेड उनके चेहरे के ठीक सामने फटा, जिसने उनके चेहरे को लहूलुहान कर दिया। घावों से बहते खून के कारण आंखों के आगे धुंधलापन छाने लगा था और इसी बीच उनकी स्टेन गन की आखिरी गोली भी चल चुकी थी।
लेकिन यह सैनिक हार मानने वालों में से नहीं था।
वो अगले हमले से बचने के लिए एक गड्ढे में कूदे। वहां से उन्होंने पाकिस्तानी पोस्ट की तरफ अपनी धुंधली दृष्टि के साथ ग्रैनेड्स फेंके। इस दौरान उन्होंने दूसरे गड्ढे में कूदकर दो पाकिस्तानी फौजियों को अपनी खंजर से मौत के घाट उतार दिया। इस गड्ढे से बाहर निकलने ही वाले थे कि एक गोली उनके सिर में लगी। लेकिन उससे पहले उन्होंने एक ग्रैनेड मशीन गन वाली पोस्ट पर फेंक दिया था। उधर से गोली आई, इधर से ग्रैनेड गया। दोनों ने एक साथ काम किया। पीरू सिंह शहीद हो गए, लेकिन दुश्मन की वह अजेय मानी जाने वाली पाकिस्तानी चौकी हमेशा के लिए पाकिस्तानियों के चंगुल से आजाद हो चुकी थी।
18 जुलाई 1948 को पीरू सिंह शेखावत शहीद हो चुके थे, लेकिन उन्होंने मरने से पहले दुश्मन की सबसे खतरनाक चौकी को खत्म कर दिया था। उनकी इस वीरता ने पूरी लड़ाई का रुख बदल दिया। भारतीय सैनिक आगे बढ़े और तिथवाल की रिज पर तिरंगा लहरा दिया।
पीरू सिंह शेखावत ने उस रात केवल एक पोस्ट नहीं जीती थी। उन्होंने यह साबित कर दिया था कि भारतीय सैनिक आखिरी सांस तक लड़ सकता है, लेकिन मातृभूमि का मस्तक कभी झुकने नहीं देगा।
उनकी अद्वितीय वीरता, अकेले दुश्मन पर टूट पड़ने के साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनकी मां जड़ाव कंवर ने यह सम्मान प्राप्त किया। इस तरह पीरू सिंह शेखावत राजस्थान के पहले परमवीर चक्र विजेता बने। परमवीर चक्र की घोषणा 26 जनवरी 1950 को की गई थी और आधिकारिक रूप से यह सम्मान 1952 में प्रदान किया गया
वो सैनिक, जिसकी ‘राजा रामचंद्र की जय’ की गर्जना से दुश्मन कांप उठा था, उनकी वीरता की कहानियां आज भी झुंझुनूं की धरती पर सुनाई जाती हैं। पीरू सिंह के जीवन से प्रेरित होकर राजस्थानी के कवि उदयराज उज्जवल ने कहा है:-
टिथवाल री घाटियां, विकट पहाड़ा जंग।
सेखो कियो अद्भुत समर, रंग पीरूती रंग।।
राजस्थान के झुंझुनूं जिले के रामपुरा बेरी गांव में 20 मई 1918 को जन्मे पीरू सिंह बचपन से ही निडर और जुझारू स्वभाव के थे। वीरों की धरती राजस्थान में पले-बढ़े पीरू सिंह के भीतर युद्ध और देशभक्ति का जुनून बचपन से था। बाद में वह 6 राजपूताना राइफल्स में भर्ती हुए और अपनी बहादुरी के दम पर कंपनी हवलदार मेजर बने। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वह जापान मोर्चे पर भी रहे। लेकिन इतिहास ने उनके लिए जो सबसे बड़ा रणक्षेत्र चुना था, वह था-कश्मीर का तिथवाल सेक्टर।

