भारत की पहली अदालती फांसी : राजा नंदकुमार की ‘न्यायिक हत्या’! अंग्रेजों का खूनी खेल

Raja Nandakumar

Written by

in

साल 1775। कलकत्ता में हजारों लोग की भीड़ जमा थी। एक प्रतिष्ठित भारतीय अधिकारी को फांसी पर चढ़ाया जाने वाला था। उसका अपराध हत्या, डकैती या देशद्रोह नहीं था। उसका सबसे बड़ा अपराध था, ब्रिटिश भारत के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति, गवर्नर-जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करना।

राजा नंदकुमार बंगाल के एक प्रभावशाली प्रशासक और कर-संग्रह अधिकारी थे। उन्होंने वर्षों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ काम किया था और बंगाल की राजनीति को करीब से देखा था। 1774 में जब रेग्युलेटिंग एक्ट के तहत वॉरेन हेस्टिंग्स ब्रिटिश भारत का पहला गवर्नर-जनरल बना, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि कुछ ही महीनों बाद उसके खिलाफ रिश्वतखोरी के गंभीर आरोप सामने आएंगे।

मार्च 1775 में नंदकुमार ने कलकत्ता की सर्वोच्च परिषद के सामने दस्तावेजी प्रमाण रखे। उन्होंने आरोप लगाया कि हेस्टिंग्स ने मीर जाफर की विधवा मुन्नी बेगम से लगभग 3,54,105 रुपए की रिश्वत ली थी। बदले में मुन्नी बेगम को नवाब के नाबालिग उत्तराधिकारी मुबारक-उद-दौला का संरक्षक बनाया गया था। उस समय यह पद केवल सम्मान का नहीं, बल्कि बंगाल के शाही खजाने और प्रशासनिक नियुक्तियों पर नियंत्रण का प्रतीक था।


Maharaja Nanda Kumar

परिषद के सदस्य फिलिप फ्रांसिस और जनरल क्लैवरिंग ने आरोपों को गंभीरता से लिया। जांच शुरू हुई और हेस्टिंग्स पर भारी जुर्माना भी लगाया गया। पहली बार ऐसा लग रहा था कि ब्रिटिश भारत का सबसे शक्तिशाली अधिकारी अपने ही भ्रष्टाचार के कारण सत्ता खो सकता है।

लेकिन इसके बाद घटनाएं अचानक बदल गईं।

हेस्टिंग्स ने अपने पुराने मित्र और कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सर एलिजाह इम्पे की अदालत का सहारा लिया। तभी एक पुराना मामला सामने लाया गया। मोहन प्रसाद नाम के व्यक्ति ने आरोप लगाया कि नंदकुमार ने 1765 में एक दस्तावेज में जालसाजी की थी। यह मामला लगभग दस साल पुराना था और वर्षों तक किसी ने इसकी परवाह नहीं की थी। लेकिन जैसे ही नंदकुमार ने हेस्टिंग्स के खिलाफ सबूत पेश किए, वही पुराना आरोप अचानक अदालत में पहुंच गया।

मुकदमे की सुनवाई अंग्रेज जूरी के सामने हुई। नंदकुमार पर ब्रिटेन के Forgery Act 1728 के तहत मुकदमा चलाया गया, जबकि यह कानून भारत में लागू होना ही विवादित था। बचाव पक्ष की दलीलों को ज्यादा महत्व नहीं दिया गया। अंततः बारह अंग्रेज जूरी सदस्यों ने उन्हें दोषी ठहरा दिया और फांसी की सजा सुना दी।

5 अगस्त 1775 की सुबह राजा नंदकुमार को कलकत्ता में फांसी पर लटका दिया गया। वह ब्रिटिश अदालत द्वारा फांसी दिए जाने वाले पहले भारतीय बने। उनके साथ भ्रष्टाचार के आरोप भी मानो फांसी के फंदे पर झूल गए। हेस्टिंग्स के खिलाफ चल रही जांच धीरे-धीरे ठंडी पड़ गई।

Warren Hastings, the Governor-General of Bengal, was accused of taking bribes

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

जब वॉरेन हेस्टिंग्स वर्षों बाद इंग्लैंड लौटा, तो ब्रिटिश संसद में उसके खिलाफ महाभियोग चलाया गया। एडमंड बर्क और चार्ल्स जेम्स फॉक्स जैसे नेताओं ने नंदकुमार के मामले को उठाते हुए इसे सीधी “Judicial Murder” यानी “न्यायिक हत्या” बताया। इतिहासकारों ने भी सवाल उठाया कि आखिर एक दस साल पुराने मामले को उसी समय क्यों खोला गया, जब नंदकुमार ने गवर्नर-जनरल के भ्रष्टाचार का खुलासा किया था।

इस कहानी की पृष्ठभूमि में एक और नाम था, मीर जाफर। वही मीर जाफर जिसने 1757 के प्लासी युद्ध में नवाब सिराजुद्दौला को धोखा देकर अंग्रेजों को बंगाल पर नियंत्रण दिलाया था। उसकी गद्दारी ने अंग्रेजों के साम्राज्य की नींव मजबूत की और लगभग दो दशक बाद उसी परिवार से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों ने महाराजा नंदकुमार को अंग्रेजी सत्ता के निशाने पर ला खड़ा किया।

5 अगस्त 1775 की वह फांसी केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं थी। वह एक ऐसा क्षण था, जिसने दिखाया कि औपनिवेशिक शासन में अदालतें भी सत्ता के हथियार में बदल सकती हैं। यही कारण है कि महाराजा नंदकुमार की मृत्यु आज भी भारतीय इतिहास में एक न्यायिक फैसले से अधिक, एक ‘न्यायिक हत्या’ के रूप में याद की जाती है।