2020 गलवान घाटी संघर्ष और आदर्शवाद की सीमाएं : एक खतरनाक पड़ोस में निरस्त्रीकरण पर भारत का दृष्टिकोण

2020 Galwan Valley Clash

15 जून 2020 को, पूर्वी लद्दाख में ऊंचाई वाली गलवान घाटी में भारत और चीन की सेनाओं में झड़प हुई। यह चार दशकों से ज्यादा समय में हुई सबसे भयंकर झड़प थी। सैनिकों ने पत्थरों, रॉड और तात्कालिक उपलब्ध हथियारों से यह लड़ाई लड़ी। पर मुख्य बात यह रही कि दोनों तरफ से भयंकर हथियार होने के बाद भी कोई गोली नहीं चली। यह 1993 और 1996 में हुए कॉन्फिडेंस-बिल्डिंग एग्रीमेंट का नतीजा था, जिसमें लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर हथियारों के प्रयोग न करने पर दोनों देश सहमत हुए थे।

इस टकराव ने एक विचित्र प्रश्न खड़ा किया : क्या विश्व में सभी युद्ध ऐसे ही लड़े जा सकते हैं, संयमित, तात्कालिक और नियंत्रित? गलवान झड़प ने सुझाव दिया कि विशेष स्थिति में भी तनाव को नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन इसने यह भी बताया कि ऐसी स्थितियां कितने कम पर कोमल होती हैं, खासकर परमाणु हथियारों वाले शत्रुओं के बीच।

हर साल 5 मार्च को, दुनिया संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में इंटरनेशनल डे फॉर डिसआर्मामेंट एंड नॉन-प्रोलिफरेशन अवेयरनेस (अंतर्राष्ट्रीय निरस्त्रीकरण और अप्रसार जागरुकता दिवस) मनाती है। संदेश साफ है : ‘शस्त्र कम करें, उसका तेजी से फैलाव या वृद्धि रोकें, शांति की ओर बढ़ें।’ भारत के लिए, गलवान और जिनेवा के बीच की दूरी सिर्फ कहने की बात नहीं है। यह स्ट्रेटेजिक है।

UN हेडक्वार्टर NY के सामने अहिंसा की मूर्ति, फोटो क्रेडिट :disarmsecure.org

ग्लोबल आइडियल (वैश्विक आदर्श)

आज के डिसआर्मामेंट फ्रेमवर्क की जड़ें न्यूक्लियर वेपन्स के नॉन-प्रोलिफरेशन पर ट्रीटी (1968) में हैं, जिसने पांच न्यूक्लियर-वेपन वाले देशों को मान्यता दी और आगे फैलने से रोकने की कोशिश की, साथ ही आखिर में डिसआर्मामेंट को बढ़ावा दिया।

इसके बाद के एग्रीमेंट्स, जिसमें न्यू स्टार्ट (2010) भी शामिल है, ने शक्तिशाली परमाणु हथियार संपन्न देशों के बीच तैनात स्ट्रेटेजिक हथियारों के जखीरे को नियंत्रित करने का प्रयास किया। संयुक्त राष्ट्र का यह वार्षिक आयोजन क्रमिक कमी (धीरे-धीरे कटौती) और जिम्मेदार संरक्षण की भावना को और मजबूत करता है। फिर भी ग्लोबल न्यूक्लियर ऑर्डर में असंतुलन बना हुआ है। 2026 तक, ओपन-सोर्स के अनुमान बताते हैं कि-

यूनाइटेड स्टेट्स: 5,000 से वॉरहेड्स

रूस: 4,300+

चीन: 500+ और बढ़ रहा है

भारत: 160–180

पाकिस्तान: 170

इजराइल : 80–100 (अघोषित) 

अलायंस के तहत काम करने वाले देशों के लिए, निरस्त्रीकरण की बहस अक्सर इंस्टीट्यूशनल सिक्योरिटी गारंटी के अंदर होती है। पर भारत के हालात अलग हैं।

भूगोल और स्ट्रेटेजिक मजबूरी

भारत का सिक्योरिटी माहौल पड़ोसी देशों के कार्यों से तय होता है। इसके उत्तर और पूर्व में चीन है, जिसके साथ इसकी एक अनसुलझी सीमा है और 1962 से लड़ाई का इतिहास रहा है। इसके पश्चिम में पाकिस्तान है, जिसके साथ इसने 1947 से लड़ाइयां लड़ी हैं और सीमा पर तनाव और प्रॉक्सी लड़ाई अब तक चल रही है।

NATO सदस्यों के उलट, भारत किसी कलेक्टिव डिफेंस ट्रीटी के तहत काम नहीं करता है। इसलिए इसका सिद्धांत स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी (राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र विदेश और सुरक्षा नीति) के आसपास बना है, जिसके अनुसार राष्ट्रीय सुरक्षा मुख्य रूप से गठबंधन पर निर्भरता के बजाय स्वदेशी क्षमता पर आधारित होनी चाहिए।

पॉलिसी बातचीत में, इस दृष्टि को कभी-कभी ऑपरेशन सिंदूर जैसे स्ट्रेटेजिक फ्रेमवर्क के सहारे बताया जाता है, जिसमें भरोसेमंद मिनिमम डिटरेंस और स्वतंत्र फैसले लेने पर जोर दिया जाता है। 1998 से 2020 तक : असल में रोकथाम

भारत के न्यूक्लियर रुख ने मई 1998 में अपने टेस्ट के बाद पक्का रूप लिया, जिसके बाद भरोसेमंद न्यूनतम रोकथाम और पहले प्रयोग न करने के वादे पर बने सिद्धांत को बताया गया। 

2020 में गलवान, बैकग्राउंड में चुपचाप काम करने वाली रोकथाम का एक उदाहरण बन गया। जहां पारंपरिक सैनिकों के बीच हिंसक झड़पें हुईं, वहीं न्यूक्लियर हकीकत ने इस लड़ाई को एक हद से ज्यादा बढ़ने से रोक दिया। हथियारों को कमजोरी की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए रोका गया क्योंकि पहले के समझौते, जिनमें खतरनाक नतीजों की आपसी मान्यता थी, ने बड़े संघर्ष को बेमतलब बना दिया था।

फोटो क्रेडिट : hindustantimes.com

फिर भी गलवान ने यह भी साबित कर दिया कि हथियार प्रयोग की मनाही से जोखिम समाप्त नहीं होता। झड़प में मौतें हुईं और लंबे समय तक मिलिट्री स्टैंडऑफ चला। इसने दिखाया कि हथियार के प्रयोग पर रोक संघर्ष पर विराम लगा सकती है लेकिन तैयारी की जगह नहीं ले सकती। ऑपरेशन सिंदूर और स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी

भारत के बदलते डिटरेंस आर्किटेक्चर में अग्नि बैलिस्टिक मिसाइल सीरीज, ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, S-400 और आकाश जैसे कई स्तरों वाली हवाई सुरक्षा व्यवस्था, साथ ही बढ़ती नौसेना क्षमता — ये सब किसी पर हमला करने के लिए नहीं, बल्कि जबरदस्ती या दबाव से बचने के लिए बनाए गए हैं।

ऑपरेशन सिंदूर (7-10 मई, 2025) एक्शन में इस स्व निर्णय लेने की स्वतंत्रता का उदाहरण है : 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 पर्यटक की मौत के बाद, भारत ने पाकिस्तान और PoK में जैश-ए-मोहम्मद कैंप से जुड़े 9 आतंकी जगहों पर SCALP मिसाइलों और हैमर बमों का इस्तेमाल करके राफेल जेट से 14 सटीक हमले किए।

पाकिस्तान की ड्रोन-मिसाइल जवाबी कार्रवाई के बाद, ब्रह्मोस ने 11 एयरबेस पर हमला किया, S-400 ने खतरों को इंटरसेप्ट किया और सिंधु जल संधि के सस्पेंशन के सहारे भारत ने यह सिद्ध किया कि छोटे, स्वदेशी हथियार पूरी लड़ाई या अलायंस पर निर्भरता के बिना निर्णायक जवाब देने में सक्षम हैं।

निशस्त्रीकरण की दुविधा

5 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय निशस्त्रीकरण दिवस एक सदैव रहने वाली चाहत को दिखाता है, वह है न्यूक्लियर हथियारों से मुक्त दुनिया।

भारत भी यही चाहता है। उसके राजनीतिज्ञों ने बार-बार वैश्विक, बिना भेदभाव वाले और सत्यापित किए जा सकने वाले निशस्त्रीकरण की मांग की है। लेकिन नई दिल्ली यह भी खुले शब्दों में बताता है कि थोड़ा-बहुत निशस्त्रीकरण, जिसमें कुछ देश बड़े हथियार रखते हैं जबकि दूसरों देशों को अपनी क्षमता सीमित रखने के लिए कहा जाता है, इससे स्थिरता पक्की नहीं की जा सकती।

भारत स्वयं को बचाने के लिए हथियार रखता है : न्यूक्लियर दुश्मन (चीन बढ़ रहा है, पाकिस्तान प्रॉक्सी-एक्टिव है), कोई गठबंधन नहीं, और गलवान (जहां 20 जवान मरे) या पहलगाम जैसी घटनाओं के लिए विश्वसनीय रोकथाम की जरूरत है, सिर्फ रोक-टोक, कमियों का फायदा उठाने वाले हमले के सामने नाकाम रहती है।

गलवान ने दिखाया कि स्थानीय टकराव कितनी जल्दी रणनीतिक संतुलन की जांच कर सकता है। इसने एक ऐसी सच्चाई को भी दिखाया जिसे अक्सर डिप्लोमैटिक हॉल में कम करके आंका जाता है: विवादित इलाकों में, रोकथाम और रोक-टोक एक साथ मुश्किल से होते हैं।

आइडियलिज्म और सिक्योरिटी के बीच

कई देशों के लिए, निशस्त्रीकरण को एक नैतिक आवश्यकता माना जाता है। भारत के लिए, यह एक शर्त आधारित उद्देश्य है।

गलवान (15 जून 2020) ने पूछा कि क्या सभी युद्धों को बिना तनाव बढ़ाए रोका जा सकता है। 5 मार्च को हर साल मनाया जाने वाला यह दिन दुनिया भर के लोगों की इस उम्मीद को दिखाता है कि वे ऐसा कर सकते हैं।

भारत का अनुभव कुछ और ही बताता है : शांति सिर्फ घोषित नहीं होती — यह अंदरूनी ताकत और पड़ोसी की कमजोरियों के जरिए संतुलित होती है।