1920 के दशक में, भारत में एविएशन पर ज्यादातर ब्रिटिश लोगों का कंट्रोल था। भारतीय आसमान पर ब्रिटिश लोगों के इस एकाधिकार के बीच, एक नौजवान, जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा, यानी जे.ऐर.डी. टाटा एक पायलट लाइसेंस और अपनी खुद की एयरलाइन बनाने के एक बड़े सपने के साथ आगे आया। उन्होंने उस सपने को पूरा करने के लिए लगातार प्रयास किया, 1927 से 1929 के बीच ट्रेनिंग ली और 1929 में, वह भारत का पहला लाइसेंस्ड पायलट बन गए। हालांकि, उन्हें अपने ही ‘टाटा संस’ बोर्ड के अंदर विरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन जे.आर.डी. टाटा पीछे नहीं हटे। आखिरकार, टाटा संस बोर्ड मान गया।
जे.आर.डी. टाटा ने, टाटा संस के साथ मिलकर, ब्रिटिश भारतीय सरकार से परमिशन और एक एयरमेल कॉन्ट्रैक्ट के लिए अप्लाई किया। यह जरूरी था क्योंकि औपनिवेशिक शासन के तहत सिविल एविएशन पर बहुत सख्त नियम थे। यहीं पर कहानी में एक ट्विस्ट आता है!
टाटा के अपनी खुद की एयरलाइन बनाने के प्रस्ताव को देखकर, ब्रिटिश अधिकारियों ने उनका मजाक उड़ाया। उन्होंने एक चुनौती दी, “ठीक है, अगर तुममें हिम्मत है, तो अपना जहाज मुंबई के उस जुहू के कीचड़ वाले मैदान पर उतारो… फिर देखते हैं!”
उस समय जुहू एक बेकार दलदल था। मॉनसून के दौरान, वह एक तालाब में बदल जाता था, और ऊंची लहरों के दौरान, समुद्र का पानी जमीन को निगल लेता था। ब्रिटिश लोगों की योजना यह थी कि वहां जहाज उतारना आत्महत्या करने जैसा होगा।

1932 में, टाटा एयर सर्विसेज़ की स्थापना भारत के पहले कमर्शियल कैरियर के रूप में की गई थी, जो घरेलू स्तर पर डाक और यात्रियों के परिवहन का कार्य संभालती थी। चित्र स्रोत : indiatoday

जे.आर.डी. टाटा अपने ऑफिस में, चित्र स्रोत : madrascourier
चांद के साथ दिमागी खेल : ढाल बना खगोलीय विज्ञान!
जे.आर.डी. टाटा ने अंग्रेजों की चुनौती स्वीकार कर ली। वहां कोई पक्का रनवे नहीं था, और न ही सिग्नल देने के लिए कोई ATC था। तो फिर, विमान को कैसे और कब उतारा जाए?
हमारे पूर्वज चांद की चाल के आधार पर समुद्र के उतार-चढ़ाव (ज्वार-भाटा) का हिसाब लगाते थे। जे आर डी टाटा ने भी उसी ज्ञान का इस्तेमाल किया। उन्होंने चांद की कलाओं और ‘ज्वार-भाटा सारणियों’ (Tide Tables) का बहुत बारीकी से अध्ययन किया। उन्होंने एक-एक सेकंड का हिसाब लगाकर यह पता लगाया कि आसमान में चांद किस स्थिति में होगा, जब रनवे से पानी हट जाएगा और कीचड़ वाली जमीन (mud flat) दिखाई देने लगेगी। उस दिन, चांद ही उनका ‘ट्रैफिक कंट्रोलर’ बना, जिसने उन्हें हरी झंडी दिखाई!
वह ऐतिहासिक पल : कराची से जुहू तक
15 अक्टूबर, 1932। इतिहास रचने का दिन आ गया था। जे.आर.डी. टाटा ने कराची से अपने छोटे से ‘पस मॉथ’ विमान में उड़ान भरी। यह सफर अहमदाबाद होते हुए मुंबई की ओर बढ़ा। विमान में कोई यात्री नहीं था, केवल 25 किलोग्राम डाक (पत्र) थे। जहां ब्रिटिश अधिकारी किसी ‘निश्चित दुर्घटना’ की आशंका में इंतजार कर रहे थे, वहीं जे.आर.डी. टाटा को अपनी गणनाओं पर पूरा भरोसा था।
ठीक उसी सटीक पल पर, जब चंद्रमा की गति के अनुसार समुद्र का पानी पीछे हटा, उन्होंने विमान को जुहू के कीचड़ भरे मैदान (मड फ्लैट) पर सुरक्षित रूप से उतार दिया! वहां उनके स्वागत के लिए कोई बैंड-बाजा नहीं था, केवल उनकी पत्नी थेल्मा और एक छोटा सा कुत्ता मौजूद थे। उसी सन्नाटे में, भारतीय विमानन क्रांति का जन्म हुआ।
जे.आर.डी. टाटा वह महान हस्ती थे, जिन्होंने बिना किसी आधुनिक तकनीक वाले उस दौर में, ब्रिटिशों के इस घमंड को जमींदोज कर दिया कि ‘भारतीय ऐसा नहीं कर सकते’ और इस उपलब्धि के एकमात्र गवाह स्वयं चंद्रमा थे। उस कीचड़ भरे मैदान पर टायरों के जो निशान बने थे, वे ही आज लाखों भारतीयों के आसमान में उड़ान भरने की दिशा में उठाए गए सबसे पहले कदम थे!

