स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू दुनिया को गुटनिरपेक्षता का उपदेश दे रहे थे, तभी एक छोटी-सी साप्ताहिक पत्रिका ने उनकी विदेश नीति को निशाना बनाया और विदेश नीति पर सवाल खड़े किए। नेहरू के लिए यह कोई साधारण आलोचना भर नहीं थी, बल्कि यह एक व्यक्तिगत चोट थी, जो इतनी चुभी कि उन्होंने संविधान ही बदल दिया। 1951 का पहला संविधान संशोधन, जो नेहरू की गहरी नाराजगी का नतीजा था, इसकी वजह थी रोमेश थापर की क्रॉस रोड्स मैगजीन, जो उनकी विदेश नीति की कटु आलोचना कर रही थी।
आइए, जानते हैं कि लोकतंत्र की शुरुआत में ही प्रेस की आवाज दबाने की कोशिश क्यों और कैसे शुरू हुई?
क्रॉस रोड्स साप्ताहिक मैगजीन की शुरुआत 29 अप्रैल 1949 को बॉम्बे में हुई। इसे एक बुद्धिजीवी रोमेश थापर ने लॉन्च किया। थापर, जो इंग्लैंड से लौटे थे और उनकी मैगजीन के पहले अंक में ही मुल्क राज आनंद, पाब्लो नेरुदा और बलराज साहनी जैसे लेखकों के लेख छपे, जो नेहरू सरकार की आंतरिक और विदेश नीतियों पर सवाल उठा रहे थे। मैगजीन का फोकस था कोरिया युद्ध पर भारत की तटस्थता, जिसे थापर अमेरिकी साम्राज्यवाद का साथ मानते थे।
नेहरू, जो गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रणेता थे, उनको यह चुभा। लेकिन शुरुआत शांतिपूर्ण लगी। मैगजीन की बिक्री कम थी, फिर भी कुछ सर्कल में यह हिट हो गई। हालांकि इसमें नेहरू को व्यक्तिगत रूप से निशाना नहीं बनाया गया, लेकिन विदेश नीति की आलोचना लगातार हो रही थी। ऐसे में नेहरू की नजरें अब इस पर टिक गईं। इस तरह, एक छोटी पत्रिका ने नेहरू की नीतियों को आईना दिखाना शुरू कर दिया, जो उनकी सहनशीलता की परीक्षा लेने वाली थी।
मार्च 1950 में जब कांग्रेस की मद्रास (अब तमिलनाडु) सरकार ने मद्रास मेंटेनेंस ऑफ पब्लिक ऑर्डर एक्ट, 1949 की धारा 9(1A) के तहत क्रॉस रोड्स मैगजीन का राज्य में प्रवेश और वितरण रोक दिया। कारण? सलेम जेल में 22 कम्युनिस्ट कैदियों पर गोलीबारी की आलोचना, जिसे मैगजीन में पुलिस अत्याचार बताया। सरकारी आदेश में लिखा गया कि सार्वजनिक व्यवस्था के लिए यह प्रतिबंध आवश्यक है। अब थापर ने इसे फासीवादी हमला कहा और पाठकों से फंड जुटाकर सुप्रीम कोर्ट जाने का ऐलान किया। नेहरू पर आरोप लगा कि यह कार्रवाई उनके इशारे पर हुई है। कहा गया कि नेहरू एक तरफ प्रेस फ्रीडम की बात करते हैं, दूसरी तरफ राज्य सरकारें उनके इशारों पर प्रेस का स्वतंत्रता पर अंकुश लगा रही हैं। इस प्रतिबंध ने कहानी को नया मोड़ दिया, जो अब संवैधानिक जंग बन गई।
अब कहानी सुप्रीम कोर्ट पहुंची, जहां थापर ने अनुच्छेद 32 के तहत सीधे याचिका दायर की। इस केस ने नेहरू सरकार को बैकफुट पर ला दिया। 26 मई 1950 को, छह जजों की बेंच (जस्टिस एम. पतंजलि शास्त्री की अगुवाई में) ने 5:1 से फैसला सुनाया कि प्रतिबंध असंवैधानिक है। कोर्ट ने कहा कि प्रतिबंध तभी वैध माना जा सकता है, जब राज्य की नींव हिले। यह फैसला प्रेस के लिए मील का पत्थर बना। हाईकोर्ट्स प्रेस इमरजेंसी पावर्स एक्ट और राजद्रोह धाराओं को रद्द करने लगे।
नेहरू को झटका लगा। उन्होंने संसद में कहा कि संविधान में संशोधन की आवश्यकता है। लेकिन असल में, यह उनकी व्यक्तिगत नाराजगी थी, क्योंकि क्रॉस रोड्स ने कोरिया संकट पर भारत की तटस्थता को ‘साम्राज्यवादी झुकाव’ कहा था, जो नेहरू के वैश्विक सपनों को ठेस पहुंचा रहा था। थापर की यह जीत नेहरू के लिए बड़ी हार थी। अब वह संविधान बदलने की सोचने लगे, ताकि ऐसी आलोचना दोबारा न हो।
संविधान (प्रथम संशोधन) अधिनियम, 1951 भारत के राजपत्र में 10 मई 1951 को प्रकाशित किया गया। यह कोई सामान्य सुधार नहीं था, यह क्रॉस रोड्स को चुप कराने का हथियार था। अनुच्छेद 19(2) में ‘उचित प्रतिबंध’ जोड़े गए। इसमें थे सार्वजनिक व्यवस्था, विदेशी संबंध, अपराध उकसाना, शालीनता आदि। उद्देश्यों में लिखा गया कि कोर्ट ने स्वतंत्रता को इतना व्यापक बना दिया कि हत्या के लिए उकसाने वाला भी बच जाए। संसद में बहस के दौरान श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इसका विरोध किया और कहा कि यह प्रेस फ्रीडम पर हमला है। नेहरू ने दलील दी कि विभाजन के बाद हिंसा रोकने के लिए यह जरूरी है, लेकिन असल में यह थापर पर निशाना था। 18 जून 1951 में विधेयक पारित हो गया।
थापर ने इसे लोकतंत्र का कत्ल कहा, लेकिन नेहरू की जीत हुई। कहा गया कि नेहरू की नाराजगी इतनी गहरी थी कि एक पत्रिका को दबाने के लिए पूरे संविधान को मोड़ा गया। यह वह पल था, जब नेहरू का आधुनिक भारत का सपना प्रेस की स्वतंत्रता पर भारी पड़ गया।
इस प्रकरण को लेकर कहा गया कि लोकतंत्र की शुरुआत में ही सत्ता का अहंकार प्रेस को कुचलने को तैयार था। यह घटना सिखाती है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कोई उपहार नहीं, बल्कि निरंतर संघर्ष है। नेहरू जैसे नेता, जो आजादी के नायक थे, व्यक्तिगत आलोचना से इतने आहत हो सकते थे कि संवैधानिक बदलाव कर दें। नेहरू की यह नाराजगी एक सबक है कि सत्ता का व्यक्तिगत अहंकार संविधान से ऊपर नहीं होना चाहिए।

