भारत की सभ्यता में मथुरा केवल एक शहर नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र रही है। यही वो भूमि मानी जाती है, जहां भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया, जहां से प्रेम, धर्म और गीता का संदेश पूरी दुनिया तक पहुंचा।
लेकिन इतिहास के पन्नों में एक ऐसा दौर भी दर्ज है, जब इसी पवित्र नगरी की पहचान मिटाने की कोशिश की गई। मंदिरों के शिखर गिराए गए, मूर्तियां तोड़ी गईं, धार्मिक स्थलों पर कब्जे किए गए और यहां तक कि शहरों के नाम तक बदल दिए गए।
औरंगजेब ने मथुरा के भव्य केशवदेव मंदिर को तुड़वाया, तो उसका मकसद सिर्फ इमारत गिराना नहीं था, बल्कि हिंदुओं की सांस्कृतिक रीढ़ को तोड़ना था। लेकिन इस इतिहास का सबसे बड़ा सच यह है कि सत्ता के जोर पर कागजों और सिक्कों के नाम तो बदले जा सकते हैं, पर करोड़ों लोगों के दिलों में बसी आस्था को नहीं मिटाया जा सकता। आज की हमारी कहानी में हम आपको बताएंगे कि कैसे भगवान श्रीकृष्ण की धरा भी मुगल शासकों के अत्याचारों से नहीं बच पाई…..
बात 31 जुलाई 1658 ई. की है, जब औरंगजेब जब मुगल गद्दी पर बैठा। वह खुद को एक कट्टर इस्लामी शासक के रूप में स्थापित करना चाहता था। उसने अपने पिता शाहजहां को कैद किया, 3 भाइयों, बड़ा भाई दारा शिकोह, सबसे छोटा भाई मुराद बख्श और दूसरा बड़ा भाई था शाह शुजा को रास्ते से हटाया और फिर धीरे-धीरे सल्तनत को अपनी धार्मिक सोच के अनुसार ढालना शुरू किया। आरम्भ में वह खुलकर हिंदू मंदिरों के खिलाफ नहीं गया, क्योंकि आमेर के राजा जयसिंह और मारवाड़ के राजा जसवंत सिंह जैसे शक्तिशाली राजपूत उसके साथ थे। लेकिन 28 अगस्त 1667 में जयसिंह और 1678 में जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद उसे लगा कि अब उसके सामने कोई बड़ा राजनीतिक दबाव नहीं बचा है।

Shri Krishna Janmabhoomi Case: सिक्कों पर भी इस्लामाबाद मोमिनाबाद ही अंकित किया जाता था। – Dainik Jagran
यहीं से औरंगजेब की नीति और ज्यादा कठोर होती चली गई। उसने महसूस किया कि भारत में हिंदू धार्मिक स्थल केवल पूजा की जगह नहीं हैं, बल्कि लोगों की सामाजिक और सांस्कृतिक ताकत भी हैं। औरंगजेब को लगता था कि ऐसे बड़े मंदिर मुगल सत्ता के समानांतर एक सांस्कृतिक शक्ति बन रहे हैं। इसी सोच के कारण उसने 9 अप्रैल 1669 को एक फरमान जारी किया, जिसमें बड़े हिंदू मंदिरों और पाठशालाओं को तोड़ने का आदेश दिया गया। इसी नीति के तहत काशी का विश्वनाथ मंदिर और मथुरा का केशवदेव मंदिर निशाने पर आए।
औरंगजेब- livehistoryindia
जनवरी 1670 में जब केशवदेव मंदिर तोड़ा गया, तब केवल इमारत नहीं गिरी, बल्कि मथुरा की पहचान बदलने की कोशिश भी शुरू हो गई। उसने श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर बने भव्य केशवदेव मंदिर को तुड़वाने का आदेश दिया। इतिहासकारों के अनुसार, यह मंदिर इतना विशाल और भव्य था कि उसके ऊंचे शिखर कई किलोमीटर दूर से दिखाई देते थे। बुंदेला शासक राजा वीर सिंह देव ने 17वीं शताब्दी की शुरुआत में लगभग 33 लाख रुपए की लागत से इसका निर्माण करवाया था। उस समय यह उत्तर भारत के सबसे समृद्ध और प्रसिद्ध मंदिरों में गिना जाता था। मुगल दरबार के इतिहासकार मुहम्मद साकी मुस्तइद खां ने अपनी फारसी किताब ‘मआसिर-ए-आलमगीरी’ में लिखा कि मंदिर गिराने के बाद वहां ईदगाह बनवाई गई।

मथुरा में हिंदू मंदिर को ध्वस्त करके निर्मित शाही ईदगाह, तस्वीर साभार: पीटीआई
कई ऐतिहासिक स्रोतों में यह भी उल्लेख मिलता है कि मंदिर की मूर्तियों को आगरा ले जाकर जामा मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे दबाया गया था। लेकिन औरंगजेब यहीं नहीं रुका। उसने मथुरा का नाम बदलकर ‘इस्लामाबाद’ और वृंदावन का नाम ‘मोमिनाबाद’ रख दिया। फारसी दस्तावेजों, मुगलकालीन सिक्कों और सरकारी रिकॉर्ड में लंबे समय तक यही नाम दर्ज रहे। हालांकि मुस्लिम आक्रमणों के दौरान कई शहरों के नाम बदले गए थे, लेकिन मथुरा और वृंदावन का मामला इसलिए अलग माना जाता है क्योंकि ये दोनों शहर सीधे भगवान श्रीकृष्ण की आस्था से जुड़े हुए थे।
यही कारण था कि औरंगजेब के शासनकाल में जाट, मराठा, राजपूत और सिख विद्रोह तेजी से बढ़ने लगे। मथुरा क्षेत्र में जाट नेता गोकुला ने मुगल सत्ता के खिलाफ विद्रोह किया, जबकि बाद में मराठों ने उत्तर भारत में मुगल शक्ति को बड़ी चुनौती दी।
मथुरा और वृंदावन के नाम बदलना केवल प्रशासनिक फैसला नहीं था, बल्कि यह सांस्कृतिक पहचान बदलने की कोशिश थी। औरंगजेब चाहता था कि आने वाली पीढ़ियां इन शहरों को हिंदू तीर्थस्थलों के रूप में नहीं, बल्कि मुगल इस्लामी शासन की पहचान के रूप में याद रखें। इसलिए सरकारी फरमानों, राजस्व रिकॉर्ड और टकसालों में ‘इस्लामाबाद’ और ‘मोमिनाबाद’ नाम लिखवाए गए। बाद में जब जाट शासकों ने इस क्षेत्र पर अधिकार किया, तब भी कई सिक्कों पर फारसी में यही नाम अंकित मिलता है। वृंदावन शोध संस्थान और कई इतिहासकारों के अनुसार, ऐसे दस्तावेज आज भी सुरक्षित हैं, जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह केवल लोककथा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक तथ्य है।
लेकिन सदियों बाद भी एक सच नहीं बदला, लोगों की आस्था। औरंगजेब फरमान जारी कर सकता था, शहरों के नाम बदल सकता था, मंदिर गिरा सकता था, लेकिन वह लोगों के दिलों से मथुरा और वृंदावन की पहचान नहीं मिटा सकता था। तीर्थयात्री ‘मथुरा जी’ ही कहते रहे, संत ‘वृंदावन धाम’ का नाम ही लेते रहे। भजनों, कथाओं और धार्मिक यात्राओं में वही नाम जीवित रहे। यही कारण है कि 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके दिए हुए नाम धीरे-धीरे सरकारी रिकॉर्ड से भी गायब हो गए।
मथुरा और उसका कृष्ण जन्मभूमि विवाद : livehistoryindia
आज भी यह इतिहास केवल अतीत की कहानी नहीं है। मथुरा-वृंदावन विवाद को लेकर अदालतों में आज भी वही मुगलकालीन सिक्के और फारसी दस्तावेज़ सबूत के तौर पर पेश किए जा रहे हैं, जिनमें इन्हें ‘इस्लामाबाद’ और ‘मोमिनाबाद’ लिखा गया था। लेकिन सबसे बड़ा सच यही है कि औरंगजेब सत्ता के जोर पर शहरों के नाम तो बदल सका, पर हमारी सांस्कृतिक पहचान और आस्था को कभी नहीं बदल पाया।
यही कारण है कि सदियों बाद आज भी उसके थोपे हुए नाम इतिहास में दफन हो चुके हैं और दुनिया इस पावन धरा को केवल मथुरा और वृंदावन के नाम से ही जानती और पूजती है।

